बी के झा
NSK

पटना / न ई दिल्ली, 1 नवम्बर 2025
बिहार की सियासत में ‘जनसुराज’ अब सिर्फ एक अभियान नहीं, बल्कि एक विचार बन चुका है — और इस विचार के जनक प्रशांत किशोर (PK) ने शुक्रवार को चुनावी हवा में ऐसा बयान दिया जिसने सभी राजनीतिक खेमों में हलचल मचा दी। NDTV को दिए अपने इंटरव्यू में पीके ने साफ कहा — “न चुनाव से पहले गठबंधन करेंगे, न नतीजों के बाद। अगर जनता जनादेश देगी तो सेवा करेंगे, नहीं तो अपना काम जारी रखेंगे।”
‘दो ही संभावनाएं — या 10 से कम सीटें, या 150 से ज़्यादा’जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने अपने अंदाज में बिहार चुनाव 2025 की तस्वीर खींचते हुए कहा, “मुझे दो ही संभावनाएं दिख रही हैं — या तो जनसुराज 10 से कम सीटें जीतेगा, या 150 से ज़्यादा। बीच का कोई रास्ता नहीं होगा।”उनके इस बयान को सियासी विश्लेषक ‘अंडरडॉग की आत्मविश्वासी चुनौती’ मान रहे हैं, जबकि विरोधी दलों में इसे ‘अहंकार’ कहा जा रहा है।
‘जनादेश नहीं मिला तो भी रुकेंगे नहीं’पीके ने कहा कि उनका मकसद सिर्फ चुनाव जीतना नहीं, बल्कि बिहार में “सिस्टम को रीसेट” करना है। उन्होंने कहा, “अगर जनता हमें मौका नहीं देती, तो भी हम बिहार की गलियों और गांवों में जाकर अपना काम करते रहेंगे। हमारा आंदोलन किसी कुर्सी के लिए नहीं, बल्कि सुधार के लिए है।”
‘न खरीदेंगे, न बिकेंगे —
लेकिन डर या लालच से लोग पाला बदल सकते हैं’जब इंटरव्यू में पूछा गया कि अगर चुनाव बाद जनसुराज “किंगमेकर” की भूमिका में आता है, तो क्या वह किसी पक्ष के साथ गठबंधन करेंगे?
इस पर पीके ने साफ कहा —हम इस पार या उस पार की राजनीति नहीं करते। अगर जनता हमें स्पष्ट जनादेश नहीं देती, तो हम विपक्ष में बैठेंगे, लेकिन सौदेबाज़ी नहीं करेंगे।”उन्होंने स्वीकार किया कि राजनीति में ‘लक्ष्मी और सीबीआई’ दो बड़े हथियार हैं जिनसे कई विधायक पाला बदलते हैं। पीके ने कहा, “अगर जनसुराज के पास 30 विधायक भी हों, और सरकार उन्हीं पर टिकी हो, तो मैं गारंटी नहीं दे सकता कि सब मेरे साथ रहेंगे। लेकिन मैं खुद ईमानदार रहूंगा।”
भाजपा पर परोक्ष हमला करते हुए उन्होंने कहा —अमित शाह से लिखवा लीजिए कि अगर एनडीए बहुमत से पीछे रह जाए, तो वे किसी विधायक को न खरीदेंगे और न दबाव डालेंगे। सवाल हमसे नहीं, उनसे पूछिए जो खरीदते हैं।
‘रणनीतिकार से जननेता तक का सफर’इंटरव्यू में प्रशांत किशोर से पूछा गया कि चुनावी रणनीतिकार से नेता बनने की यात्रा कितनी अलग है? इस पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा —यहाँ भी मैं लोगों को लड़वा रहा हूँ, बस फर्क इतना है कि अब मैं मंच के पीछे नहीं, सामने हूँ। पहले मैं तैयार रणनीति पर काम करता था, अब मैं खुद रणनीति बना रहा हूँ।
उन्होंने कहा कि जनसुराज अभियान एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि लोगों की चेतना का आंदोलन है — “यह बिहार की जनता का विश्वास पुनः अर्जित करने की लड़ाई है।”
‘मैं केजरीवाल नहीं हूँ, मेरी राजनीति अलग है’जब उनसे पूछा गया कि क्या वह अरविंद केजरीवाल की राह पर हैं, जिन्होंने दिल्ली में शीला दीक्षित को हराकर इतिहास रचा था, तो पीके ने जवाब दिया —अरविंद और मैं अलग हैं। उनकी राजनीति अलग थी, मेरी अलग है। वहाँ मुख्यमंत्री चुनाव लड़ रही थीं, यहाँ नीतीश कुमार खुद मैदान में नहीं हैं। मैं किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, एक व्यवस्था के खिलाफ चुनाव लड़ रहा हूँ।
जनसुराज अब बिहार की चर्चा का केंद्र’विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर ने बिहार की चुनावी चर्चा को फिर से अपने इर्द-गिर्द केंद्रित कर दिया है।एक ओर जहां राजद और जदयू जातीय समीकरणों पर भरोसा कर रहे हैं, वहीं जनसुराज “शिक्षा, रोजगार और शासन सुधार” को चुनावी मुद्दा बना रहा है।
जनता का मूड क्या कहता है?गांव-गांव तक पहुँच चुके ‘जनसंवाद यात्रा’ के जरिए पीके ने पिछले दो वर्षों में संगठन की जड़ें मजबूत की हैं। उनकी साफगोई और आत्मविश्वास लोगों के बीच आकर्षण तो पैदा कर रहा है,
लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि “जमीन पर संगठन और जातीय समीकरणों की परीक्षा अभी बाकी है।
निष्कर्ष
प्रशांत किशोर का यह बयान बिहार की राजनीति में न केवल एक नई बहस की शुरुआत करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि वह गठबंधन की पारंपरिक राजनीति को चुनौती देने के मूड में हैं।जनसुराज अब केवल एक पार्टी नहीं, बल्कि बिहार के बदलाव का एक प्रयोग बन चुका है — जो या तो इतिहास रचेगा, या इतिहास से सीख लेकर आगे बढ़ेगा।
