निकाय चुनाव में अद्भुत उलटफेर: कट्टर विरोधी उद्धव–शिंदे और अजित–शरद गुट आए एक मंच पर, क्या महाराष्ट्र की राजनीति बड़े बदलाव की ओर?

बी के झा

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मुंबई / नई दिल्ली, 1 दिसंबर

महाराष्ट्र की निकाय राजनीति इस बार वह रंग दिखा रही है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। यह चुनाव सिर्फ स्थानीय प्रतिनिधियों का चयन नहीं, बल्कि भविष्य की राज्य राजनीति की दिशा तय करने वाला ‘लिटमस टेस्ट’ बन चुका है।साल 2022 में शिवसेना का विभाजन —

उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे का आमने-सामने होना — महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा राजनीतिक भूचाल था। एक ओर शिंदे ने एनडीए का दामन थामा, वहीं उद्धव ठाकरे महा-विकास आघाड़ी में बने रहे। विचारधारा, नेतृत्व और विरासत—सब पर तीखे आरोप-प्रत्यारोप चले।लेकिन 2025 के स्थानीय निकाय चुनाव ने चौंकाने वाला मोड़ ला दिया है।जहाँ कल तक कट्टर विरोधी थे, आज कई सीटों पर एक-दूसरे के कंधे से कंधा मिलाकर मैदान में उतर रहे हैं।

उद्धव–शिंदे साथ, अजित–शरद भी एक मंच पर — महाराष्ट्र में ‘राजनीतिक रीमिक्स’ शुरू स्थानीय समीकरणों की मजबूरी या बड़े उलटफेर का संकेत?राज्य के कई जिलों में यह नए जमाने के गठबंधन बनते दिख रहे हैं—

उद्धव ठाकरे गुट + एकनाथ शिंदे गुट कांग्रेस + शिंदे गुट एनसीपी (शरद पवार) + शिंदे गुट एनसीपी के अजित पवार और शरद पवार गुट—कई सीटों पर साथ“

शहर विकास आघाड़ी” जैसे नए स्थानीय मोर्चे राजनीति के जानकार मानते हैं कि यह गठबंधन सिर्फ चुनावी मजबूरी नहीं बल्कि आने वाले बड़े फेरबदल का सूचक भी हो सकता है।उद्धव गुट की नाराज़गी, शिंदे की चतुराई —

BJP को रोकना हुई प्राथमिकता?सूत्रों के अनुसार:उद्धव ठाकरे इन स्थानीय गठबंधनों से खुश नहींकई बार आपत्ति भी जता चुके हैं मगर स्थानीय इकाइयों का दावा — “प्राथमिकता भाजपा को रोकना है”दूसरी ओर शिंदे गुट भी यही तर्क दे रहा है—यह सिर्फ लोकल एडजस्टमेंट है, विचारधारा में बदलाव नहीं।”

राजनीतिक विश्लेषक इसे प्रेसर पॉलिटिक्स बता रहे हैं।वरना कल तक बालासाहेब की विरासत को लेकर तलवारें खींचे ये दोनों गुट आज साथ कैसे दिखाई दे रहे हैं?जमीनी सच: भाजपा को चुनौती देने के लिए ‘हितों का संगम’चाकन म्युनिसिपल काउंसिल (पुणे)शिंदे गुट की उम्मीदवार मनीषा सुरेश गोरे के साथ उद्धव गुट के विधायक बाबाजी काले मंच परकाले का बचाव —

“ये सिर्फ चाकन के सम्मान का मामला है कणकवली (सिंधुदुर्ग)उद्धव + शिंदे गुट ने बनाया “शहर विकास आघाडी”लक्ष्य: भाजपा के प्रभाव को सीमित करना उभरेगा (धराशिव)कांग्रेस + शिंदे गुटभाजपा उम्मीदवार हर्षवर्धन चौलक्या को रोकने की रणनीति चोपड़ा कांग्रेस + शिंदे गुट भाजपा पर आरोप — “

समर्थन छीनने की कोशिश”नासिक (यावल परिषद)शिंदे गुट के रूपेश दर्दे को शरद पवार गुट का समर्थनमुकाबला भाजपा व अजित पवार गुट से सीधा कोल्हापुर (कागल)एनसीपी के शरद और अजित दोनों गुट एक साथ यह दृश्य 2023 के विभाजन को पूरी तरह चुनौती देता है क्या ये गठबंधन केवल लोकल है? या संकेत है कि बड़ा “घरेलू मिलन” होने वाला है?

शिंदे द्वारा घर वापसी की चर्चाएँ तेज़ हैं।राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है—क्या एकनाथ शिंदे 2026 से पहले शिवसेना में घर वापसी की तैयारी कर रहे हैं?

कारण:कई सीटों पर उद्धव गुट का उनके प्रति नरम रुख स्थानीय नेताओं का बार-बार ‘एकता’ का के भीतर भी शिंदे के भविष्य को लेकर खामोश असंतोष विश्लेषकों का कहना है कि महाराष्ट्र में राजनीति पहले भी कई यूटर्न ले चुकी है —और वर्तमान संकेत किसी बड़े आने वाले बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय:

1. भाजपा को रोकने की एक बड़ी रणनीति?यदि विपक्षी गुट एकजुट होते हैं तो भाजपा की शहरी निकायों में मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

2. स्थानीय स्तर के गठबंधन भविष्य का माहौल तय करेंगेयदि इन गठबंधनों को सफलता मिलती है, तो विधानसभा चुनावों में भी यही पैटर्न दोहराया जा सकता है।

3. शिवसेना में फिर से एक होने की संभावना?शिवसेना की ‘विरासत लड़ाई’ अभी खत्म नहीं हुई है।परंतु जमीनी स्तर पर बढ़ती नजदीकियाँ एक संकेत जरूर देती हैं।अगला सवाल: महाराष्ट्र में सबसे बड़ा उलट-फेर क्या वाकई आने वाला है?

क्या उद्धव–शिंदे फिर एक होंगे?

क्या शरद–अजित की दूसरी मुलाकात भी संभव है?

क्या महायुति बनाम महाविकास, दोनों की रेखाएं धुंधली पड़ रही हैं?

निकाय चुनाव के नतीजे इन सवालों का पहला संकेत बनेंगे।

स्थिति स्पष्ट है —महाराष्ट्र में राजनीति अब सिर्फ विचारधारा नहीं, बल्कि स्थानीय हितों और शक्ति-राजनीति का जटिल खेल बन गई है।

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