निजी अहं बनाम राष्ट्रीय हित: ट्रंप की ‘नोबेल कूटनीति’ और भारत –अमेरिका संबंधों की दरार

बी के झा

नई दिल्ली, 26 दिसंबर

भारत और अमेरिका के रिश्ते दशकों से रणनीतिक साझेदारी, साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और चीन को संतुलित करने की भू-राजनीतिक जरूरतों पर टिके रहे हैं। लेकिन बीते छह महीनों में यह रिश्ता जिस तेजी से तनावपूर्ण हुआ है, उसने वॉशिंगटन से लेकर नई दिल्ली तक कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अब इस पूरे घटनाक्रम पर अमेरिका के ही प्रसिद्ध वैश्विक मामलों के विशेषज्ञ, लेखक और प्रोफेसर फ्रांसिस फुकुयामा का बयान सामने आया है, जिसने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति को कठघरे में खड़ा कर दिया है।

फुकुयामा के अनुसार, यह गिरावट किसी रणनीतिक असहमति का नतीजा नहीं, बल्कि राष्ट्रपति ट्रंप के निजी अहं और व्यक्तिगत अपेक्षाओं का परिणाम है।* फुकुयामा का तीखा आरोप: ‘अमेरिकी हितों की बलि’एक साक्षात्कार में प्रोफेसर फुकुयामा ने ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति को लेकर कहा,“ट्रंप की कोई स्पष्ट वैश्विक नीति नहीं है। उनकी विदेश नीति निजी लाभ और व्यक्तिगत संतुष्टि पर आधारित है।”उन्होंने भारत का उदाहरण देते हुए कहा कि पिछले 20–30 वर्षों में चाहे अमेरिका में डेमोक्रेट सरकार रही हो या रिपब्लिकन, भारत के साथ संबंध मजबूत करना

अमेरिकी रणनीति का स्थायी हिस्सा रहा है, क्योंकि दक्षिण एशिया में चीन को संतुलित करने के लिए भारत सबसे अहम साझेदार है।लेकिन फुकुयामा के मुताबिक,“ट्रंप ने भारत के साथ रिश्ते सिर्फ इसलिए खराब कर दिए क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए समर्थन नहीं दिया।”

यह टिप्पणी अपने आप में अमेरिकी सत्ता तंत्र पर एक गंभीर सवाल खड़ा करती है—क्या विश्व की सबसे बड़ी शक्ति की विदेश नीति व्यक्तिगत प्रशंसा और पुरस्कार की अपेक्षा से संचालित हो सकती है?

ऑपरेशन सिंदूर और रिश्तों में आया मोड़ जनवरी में ट्रंप के सत्ता में लौटने के बाद भारत में आम धारणा यह थी कि ट्रंप–मोदी की व्यक्तिगत मित्रता दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊंचाई देगी। शुरुआती महीनों में ऐसा संकेत भी मिला। लेकिन मई आते-आते सबकुछ बदल गया।पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने जब निर्णायक जवाब देते हुए ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम दिया, तो ट्रंप प्रशासन का रुख भारत के लिए अप्रत्याशित और असहज करने वाला रहा।

भारत सरकार की औपचारिक घोषणा से पहले ही राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर सीजफायर का ऐलान कर दिया।भारत के लिए यह केवल कूटनीतिक असहजता नहीं थी, बल्कि उसकी सार्वभौमिकता और निर्णय-स्वतंत्रता से जुड़ा मामला था।सीजफायर श्रेय की राजनीति इसके बाद ट्रंप लगातार यह दावा करते रहे कि“

भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर उन्होंने करवाया।”जबकि भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सीजफायर पाकिस्तान के डीजीएमओ के फोन कॉल के बाद द्विपक्षीय सैन्य संवाद के जरिए हुआ था। भारत की इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया।

यहीं से रिश्तों में अविश्वास की खाई गहरी होने लगी।पाकिस्तान की ‘नोबेल कूटनीति’इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा लाभ पाकिस्तान ने उठाया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने न केवल खुले तौर पर ट्रंप को सीजफायर के लिए धन्यवाद दिया, बल्कि उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए समर्थन देने का भी ऐलान कर दिया।

कूटनीतिक जानकारों के मुताबिक,“यहीं से ट्रंप के निजी असंतोष और भारत के प्रति नाराजगी को दिशा मिली।”

आर्थिक दबाव और बयानबाज़ी इसके बाद हालात तेजी से बिगड़े। अमेरिका ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया। ट्रंप और उनकी टीम की ओर से लगातार भारत-विरोधी बयान सामने आने लगे। जवाब में भारत ने भी स्पष्ट कर दिया कि वह किसी दबाव की राजनीति के आगे नहीं झुकेगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टकराव इस बात का संकेत है कि भारत अब अपनी विदेश नीति को व्यक्तियों नहीं, सिद्धांतों पर आधारित रखेगा।कश्मीर पर भारत का अडिग रुखइस पूरे विवाद की जड़ में कश्मीर भी है। भारत की नीति दशकों से स्पष्ट रही है—

कश्मीर भारत और पाकिस्तान का द्विपक्षीय मुद्दा है, इसमें किसी तीसरे देश की भूमिका स्वीकार नहीं।शिमला समझौते में पाकिस्तान ने भी इस सिद्धांत को स्वीकार किया है, लेकिन व्यवहार में वह हमेशा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तीसरे पक्ष को शामिल करने की कोशिश करता रहा है।ऐसे में अगर प्रधानमंत्री मोदी ट्रंप को नोबेल के लिए समर्थन देते, तो यह न केवल भारत की कूटनीतिक साख के खिलाफ होता, बल्कि उसके घोषित राष्ट्रीय रुख से भी समझौता माना जाता।

बड़ा सवाल:

क्या दोस्ती नीति से ऊपर हो सकती है?

फ्रांसिस फुकुयामा की टिप्पणी ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है—क्या व्यक्तिगत प्रशंसा न मिलने पर कोई राष्ट्राध्यक्ष दशकों पुरानी रणनीतिक साझेदारी को दांव पर लगा सकता है?विशेषज्ञों का मानना है कि भारत–अमेरिका संबंधों में आई यह दरार अस्थायी हो सकती है, लेकिन इसने यह साफ कर दिया है कि भारत अब किसी भी ‘नोबेल कूटनीति’ का हिस्सा बनने को तैयार नहीं है।

निष्कर्ष

यह पूरा घटनाक्रम केवल दो देशों के रिश्तों की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताता है कि वैश्विक राजनीति में जब व्यक्तिगत अहं राष्ट्रीय हितों पर हावी हो जाए, तो रणनीतिक संतुलन भी डगमगा सकता है।भारत ने इस संकट में अपना संदेश स्पष्ट कर दिया है—

दोस्ती सम्मान पर टिकी होती है, दबाव या पुरस्कार की अपेक्षा पर नहीं।

NSK

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