बी के झा
NSK


* नई दिल्ली, 26 दिसंबर
भारतीय न्याय व्यवस्था लंबे समय से एक ही बड़ी चुनौती से जूझ रही है—न्याय में देरी। इसी पृष्ठभूमि में देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने न्याय के स्वरूप को नए सिरे से परिभाषित करने की एक दूरदर्शी परिकल्पना सामने रखी है—‘मल्टी-डोर कोर्टहाउस’। यह विचार न सिर्फ अदालतों के कामकाज को बदलने का संकेत देता है, बल्कि यह भी बताता है कि आने वाले समय में न्याय केवल फैसला सुनाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि विवाद समाधान की समग्र व्यवस्था होगा।दक्षिण गोवा में बार काउंसिल ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय सम्मेलन और मध्यस्थता संगोष्ठी में CJI ने स्पष्ट शब्दों में कहा—“अदालत वह जगह नहीं होनी चाहिए जहां व्यक्ति मजबूरी में जाए, बल्कि वह ऐसा केंद्र बने जहां उसे उसकी प्रकृति और जरूरत के मुताबिक समाधान का रास्ता मिले।”तीन दरवाज़े, एक न्याय
CJI सूर्यकांत की परिकल्पना के अनुसार, जब कोई फरियादी अदालत पहुंचे तो उसके सामने तीन विकल्प खुले हों—मेडिएशन (मध्यस्थता)आर्बिट्रेशन (पंचाट/निर्णायक प्रक्रिया)मुकदमा (पारंपरिक न्यायिक प्रक्रिया)उन्होंने साफ किया कि यह कोई “मुकदमों से बचने की नीति” नहीं है।“हर मामला मेडिएशन या आर्बिट्रेशन से हल नहीं हो सकता। जहां जरूरत होगी, अदालत पूरी मजबूती से मुकदमा सुनेगी।”उनके शब्दों में,“मेडिएशन कानून की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे मानवीय और उन्नत अवस्था है।
राजनीतिक विश्लेषकों की दृष्टि:
न्यायपालिका का सॉफ्ट पावर मॉडल राजनीतिक विश्लेषक इस अवधारणा को न्यायपालिका के ‘सॉफ्ट पावर’ विस्तार के रूप में देख रहे हैं।एक वरिष्ठ विश्लेषक के अनुसार,“यह विचार बताता है कि राज्य अब केवल दंडात्मक नहीं, बल्कि समाधान-उन्मुख भूमिका में आना चाहता है। इससे न्यायपालिका और आम नागरिक के बीच भरोसे की दूरी कम होगी।”उनका मानना है कि यदि यह मॉडल सफल हुआ, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को भी मजबूत करेगा।
कानूनविदों की राय:
केस बैकलॉग पर निर्णायक वार कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि देश में 5 करोड़ से अधिक लंबित मामलों के दौर में यह पहल संरचनात्मक सुधार की दिशा में बड़ा कदम है।एक वरिष्ठ अधिवक्ता के मुताबिक,“मुकदमा अक्सर टूट चुके रिश्ते का पोस्टमार्टम होता है, जबकि मेडिएशन उस रिश्ते को बचाने की कोशिश है—
CJI का यह कथन न्याय दर्शन का सार है।”
हालांकि, कुछ कानूनविद यह भी चेतावनी देते हैं कि“मेडिएशन की सफलता तभी संभव है जब वह स्वैच्छिक, निष्पक्ष और दबाव-मुक्त हो।”2.5 लाख मध्यस्थों की जरूरत: आंकड़ा नहीं, चेतावनी CJI सूर्यकांत ने बताया कि देश में फिलहाल लगभग 39 हजार प्रशिक्षित मध्यस्थ हैं, जबकि जरूरत 2.5 लाख से अधिक की है।उन्होंने स्पष्ट किया कि मध्यस्थ बनना केवल प्रशिक्षण का विषय नहीं, बल्कि—संवेदनशीलता धैर्य व्यवहारिक समझ करुणाऔर सामाजिक-सांस्कृतिक ज्ञानइन सबका संतुलन जरूरी है।
शिक्षाविदों के अनुसार,“यह एक नया करियर पाथ भी खोलता है, जहां कानून की पढ़ाई सिर्फ कोर्ट तक सीमित नहीं रहेगी।”
‘मेडिएशन फॉर नेशन’:
शुरुआती सफलता CJI ने बताया कि जुलाई में शुरू किया गया ‘मेडिएशन फॉर नेशन’ अभियान खासतौर पर—वैवाहिक विवाद व्यावसायिक टकराव सड़क दुर्घटना मामलों में सकारात्मक नतीजे दे रहा है। इससे न केवल अदालतों का बोझ कम हुआ है, बल्कि पक्षकारों में संतोष भी बढ़ा है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया:
समर्थन के साथ सावधानी सरकार विरोधी दलों ने इस पहल का स्वागत करते हुए कुछ सवाल भी उठाए।एक विपक्षी नेता ने कहा,“हम मध्यस्थता के पक्ष में हैं, लेकिन यह सुनिश्चित करना होगा कि गरीब और कमजोर वर्ग पर समझौते का दबाव न बने। मुकदमे का अधिकार पूरी मजबूती से सुरक्षित रहना चाहिए।”उनका कहना है कि यह व्यवस्था तभी सफल होगी जब न्याय तक समान पहुंच सुनिश्चित की जाए।
गोवा से संदेश: न्याय केवल कानून नहीं, संवाद भी है
CJI द्वारा ‘मध्यस्थता की शपथ’ दिलाना और प्रतीकात्मक पदयात्रा में हिस्सा लेना इस बात का संकेत है कि यह पहल केवल भाषणों तक सीमित नहीं, बल्कि जन-आंदोलन का रूप ले सकती है।गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत और न्यायिक जगत की मौजूदगी ने इसे संस्थागत समर्थन भी दिया।
निष्कर्ष‘
मल्टी-डोर कोर्ट’ की परिकल्पना भारतीय न्याय व्यवस्था को एक नए युग में ले जाने का संकेत है—
जहां न्याय सिर्फ फैसला नहीं, बल्कि समाधान, संवेदना और संतुलन का नाम होगा।अगर यह सोच जमीनी स्तर पर सही ढंग से लागू हुई, तो आने वाले वर्षों में अदालतें डर का नहीं, संवाद और समाधान का प्रतीक बन सकती हैं।
