बी के झा
पटना, 19 नवंबर
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने कई राजनीतिक समीकरण बदल दिए, लेकिन सबसे बड़ी चर्चा में रही प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी—
जो पहले संसदीय राजनीति में अपनी ‘वैचारिक जनभागीदारी’ की बात करती रही, और अब मैदान में उतरते ही शून्य पर सिमट गई।कई दिनों की चुप्पी के बाद अब प्रशांत किशोर (पीके) सामने आए हैं और उन्होंने पहली बार माना है कि चुनाव में एक रणनीतिक भूल उनसे हुई, जिसका परिणाम उन्हें भारी पड़ा।
मेरी गलती… मैं खुद चुनाव नहीं लड़ा”पीके ने स्वीकार किया रणनीतिक चूक सोशल इंजीनियरिंग और चुनावी रणनीति के मास्टरमाइंड कहे जाने वाले पीके ने एक इंटरव्यू में कहा—“यह माना जा सकता है कि मेरी गलती थी कि मैंने खुद चुनाव मैदान में उतरने का फैसला नहीं किया। शायद इससे नतीजा कुछ और होता।”उनके इस बयान ने राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है, क्योंकि जनसुराज पार्टी को जहाँ शुरुआती अनुमान 5–7% वोट मिलने का था,
वहीं परिणाम 4% से भी नीचे आकर रुका।पीके ने साफ तौर पर कहा कि वे उम्मीद कर रहे थे कि उनकी ‘जमीनी राजनीति और पदयात्रा’ जनसमर्थन में तब्दील होगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।“हमने सोचा भी नहीं था कि जनसुराज को 4% से कम वोट मिलेगा”
प्रशांत किशोर का कहना है कि वे इस परिणाम से चकित भी हैं और सीख भी ले रहे हैं—“हमें लगता था कि मेहनत काफी है, पर शायद और मेहनत की जरूरत थी।”“हमने अनुमान भी नहीं लगाया था कि वोट शेयर 4% से नीचे रह जाएगा।”यह स्वीकारोक्ति इस बात का संकेत है कि पीके अब राजनीतिक ज़मीन को नई दृष्टि से देख रहे हैं और स्वीकार कर रहे हैं कि चुनाव केवल रणनीति का खेल नहीं, जनभावनाओं का विज्ञान भी है।लोगों का दिल जीते बिना मैं पीछे नहीं हट सकता”
पीके ने किया नया संकल्प**हार के बाद आलोचकों ने सवाल उठाया था कि क्या पीके अब राजनीति छोड़ देंगे?इस पर उन्होंने दो टूक जवाब दिया—“मैं किस पद पर हूं कि छोड़ दूं? मैं संकल्प लेकर आया हूं और बिहार की समस्याओं का समाधान किए बिना पीछे नहीं हट सकता।”उन्होंने यह भी कहा कि बिहार की वास्तविक समस्याएँ—
बेरोज़गारी शिक्षा की गुणवत्ता स्वास्थ्य सेवाएं पलायन इन सबका समाधान ही उनकी राजनीति का मूल लक्ष्य है।पीके का यह बयान हार को स्वीकारने के साथ-साथ संघर्ष जारी रखने के संदेश के रूप में देखा जा रहा है। नीतीश सरकार को चुनौती: ‘अगर 6 महीने में वादा पूरा हुआ तो राजनीति छोड़ दूंगा’इंटरव्यू में पीके ने नीतीश सरकार की ‘लुभावनी योजनाओं’ को लेकर भी बड़ा दावा किया—“अगर चुनाव से पहले 10 हजार रुपये वाली स्कीम नहीं आती, तो जेडीयू 25 सीट भी नहीं जीतती।”
“सरकार ने 6 महीने में 2 लाख रुपये स्वरोजगार सहायता देने की घोषणा की है।”“अगर नीतीश कुमार की सरकार 6 महीने में यह वादा पूरा कर दे, तो मैं राजनीति छोड़ दूंगा।”यह बयान एक राजनीतिक चुनौती भी है और जनसुराज की अगली रणनीति का संकेत भी।2022 में शुरू हुआ सफर, 2025 में पहली बड़ी परीक्षा प्रशांत
किशोर ने2 अक्टूबर 2022 को ‘जनसुराज’ अभियान की शुरुआत की थी।उनका उद्देश्य था—जनता से सीधी बातचीत पदयात्रा राजनीतिक शिक्षण सिस्टम में आम लोगों की भागीदारी पीके कभी पदयात्रा में दिखे, कभी युवाओं के साथ संवाद में, कभी विकास और भ्रष्टाचार पर विरोध प्रदर्शनों में।लेकिन इतनी मेहनत के बावजूद चुनावी वास्तविकता उम्मीद से दूर रही।आगे क्या? पीके कौन सा रास्ता चुनेंगे?हार के बाद पहली बार सामने आए पीके के बयान से तीन बातें स्पष्ट होती हैं—
1. वह हार से पीछे हटने वाले नहीं हैं।
2. जमीनी स्तर पर और गहराई से काम करने की तैयारी है।
3. अगले चुनाव तक वे बिहार में वैकल्पिक नेतृत्व का पहला नाम बनना चाहते हैं।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि पीके अब आक्रामक विपक्षी चेहरा बनने की कोशिश कर सकते हैं।अंत में…प्रशांत किशोर की यह स्वीकारोक्ति केवल एक ‘गलती’ की नहीं, एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत है*
*एक रणनीतिकार से नेता बनने की यात्रा आसान नहीं होती।और शायद ये हार उनके लिए सीख का वही पहला अध्याय है जो आगे उन्हें एक मजबूत राजनीतिक व्यक्तित्व में ढाल सकता है।
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