बी.के. झा
NSK
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कोलकाता/मुर्शिदाबाद, 28 दिसंबर
पश्चिम बंगाल की राजनीति में विवादों से घिरे नेता हुमायूं कबीर एक बार फिर सुर्खियों के केंद्र में हैं, लेकिन इस बार वजह उनका कोई बयान या धार्मिक–राजनीतिक कदम नहीं, बल्कि उनके बेटे गुलाम नबी आज़ाद पर लगा गंभीर आरोप है। कोलकाता में एक पुलिसकर्मी को थप्पड़ मारने के आरोप में आज़ाद को हिरासत में लिया गया है, जिसके बाद यह मामला अब केवल कानून–व्यवस्था तक सीमित न रहकर सत्ता, सुरक्षा और राजनीतिक दबदबे की बहस में बदलता जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, हुमायूं कबीर की सुरक्षा में तैनात एक कांस्टेबल ने शिकायत दर्ज कराई है कि गुलाम नबी आज़ाद ने उसके साथ गाली-गलौज की,और कथित तौर पर उसे थप्पड़ मारा।शिकायत के आधार पर पुलिस आज़ाद के आवास पर पहुंची, उनसे पूछताछ की और फिर उन्हें शक्तिपुर पुलिस थाने ले जाया गया। घटना के वक्त हुमायूं कबीर घर पर मौजूद नहीं थे।यह वही हुमायूं कबीर हैं, जो हाल ही में बाबरी मस्जिद की नींव रखने के बयान और कदम के बाद भारी विवाद में आए थे। वे भरतपुर से टीएमसी विधायक चुने गए थे, लेकिन पार्टी लाइन से हटकर गतिविधियों के चलते उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने जनता उन्नयन पार्टी बनाई और लगातार प्रशासन व सत्तारूढ़ दल पर हमलावर रहे हैं।
हुमायूं कबीर का पलटवार:
‘मेरे बेटे ने आत्मरक्षा की’अपने बेटे की हिरासत पर प्रतिक्रिया देते हुए हुमायूं कबीर ने पूरे घटनाक्रम को एकतरफा और साजिशपूर्ण करार दिया।उनका दावा है कि—कांस्टेबल बिना सूचना उनके निजी कमरे में घुसा,उनके साथ मारपीट करने की कोशिश की,और उनके बेटे ने केवल उन्हें बचाने के लिए हस्तक्षेप किया।
कबीर ने कहा:“अगर पुलिस कार्रवाई करना चाहती है तो करे, लेकिन यह याद रखे कि सीसीटीवी फुटेज मौजूद है। सच्चाई सामने आ जाएगी। मेरे बेटे ने किसी पर हमला नहीं किया, उसने मुझे बचाया।”इतना ही नहीं, कबीर ने गुरुवार दोपहर 12 बजे एसपी कार्यालय के घेराव की चेतावनी भी दे दी है। उनका सवाल है कि पुलिस बिना पूर्व सूचना उनके आवास पर क्यों आई और पहले से विवादित कांस्टेबल को दोबारा उनकी सुरक्षा में क्यों तैनात किया गया।
घटना की पृष्ठभूमि:
छुट्टी का अनुरोध बना विवाद की जड़
सूत्रों के अनुसार, घटना की शुरुआत आज सुबह हुई, जब हुमायूं कबीर अपने बेटे और कुछ पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ अपने विधायक कार्यालय में बैठक कर रहे थे।इसी दौरान एक कांस्टेबल वहां पहुंचा और छुट्टी का अनुरोध किया।कबीर ने छुट्टी देने से इनकार किया,दोनों के बीच कहासुनी हुई,और आरोप है कि इसी विवाद के दौरान गुलाम नबी आज़ाद ने कांस्टेबल को थप्पड़ मार दिया।पुलिस का कहना है कि वह मामले की तटस्थ जांच कर रही है और सभी पक्षों के बयान लिए जा रहे हैं।
बड़ा सवाल:
कानून से ऊपर कोई है क्या?
यह मामला एक बार फिर बंगाल की राजनीति में पुराने सवाल को जिंदा करता है—क्या राजनीतिक परिवारों के सदस्य खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं?
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के मुताबिक,“अगर पुलिसकर्मी के साथ मारपीट हुई है, तो आरोपी चाहे कोई भी हो, कानून अपना काम करेगा।”वहीं दूसरी ओर, हुमायूं कबीर समर्थकों का कहना है कि यह मामला राजनीतिक प्रतिशोध का है और असहज नेता को दबाने की कोशिश की जा रही है।
राजनीतिक संदेश और प्रशासनिक चुनौती
विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रकरण सिर्फ एक थप्पड़ का मामला नहीं है।यह दर्शाता है—सुरक्षा व्यवस्था और नेताओं के बीच बढ़ता टकराव,सत्ता से बाहर हुए नेताओं की प्रशासन से सीधी भिड़ंत,और कानून–व्यवस्था पर राजनीतिक दबाव की जटिल स्थिति।
हुमायूं कबीर पहले ही खुद को सिस्टम से लड़ने वाला नेता के रूप में पेश कर रहे हैं। बेटे की हिरासत और एसपी ऑफिस घेराव की चेतावनी इस संघर्ष को और तीखा बना सकती है।
निष्कर्ष:
मामला अदालत से पहले सियासत में फिलहाल गुलाम नबी आज़ाद हिरासत में हैं, जांच जारी है और दोनों पक्ष अपने-अपने दावे कर रहे हैं।लेकिन इतना तय है कि यह मामला अब केवल पुलिस थाने तक सीमित नहीं रहेगा—
यह सड़कों, मीडिया और राजनीति—तीनों मोर्चों पर लड़ा जाएगा।
आने वाले दिनों में सीसीटीवी फुटेज,पुलिस की कार्रवाई,और कबीर के प्रस्तावित आंदोलन यह तय करेंगे कि यह मामला कानूनी अपराध साबित होता है या राजनीतिक टकराव का एक और अध्याय बनकर रह जाता है।बंगाल की राजनीति में फिलहाल एक बात साफ है—
यह थप्पड़ सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं, पूरे सिस्टम को चुनौती देता नजर आ रहा है।
