बी के झा
NSK

कोलकाता/ न ई दिल्ली, 20 नवंबर
उत्तर 24 परगना (पश्चिम बंगाल)।हाकिमपुर बॉर्डर चौकी पर इन दिनों एक अजीब और चिंताजनक दृश्य देखने को मिल रहा है—सैकड़ों महिलाएँ, पुरुष और मासूम बच्चे सड़क के किनारे तिरपाल के नीचे बैठे हैं। चेहरों पर भय, बेचैनी और अगला कदम क्या होगा—
इस अनिश्चितता की गहरी रेखाएँ। इन लोगों के पास सिर्फ कुछ बैग, कंबल और जल्दी में जुटाया गया सामान है।इन सभी का एक ही लक्ष्य है—भारत से निकलकर किसी तरह वापस बांग्लादेश पहुंच जाना।यह दृश्य किसी प्राकृतिक आपदा या दंगे के बाद पलायन जैसा लगता है, लेकिन हकीकत इससे ज्यादा जटिल है। ये वही लोग हैं जो सालों पहले अवैध तरीके से भारत आए थे, यहाँ बस गए, काम-धंधा किया—और अब डर के कारण भारत से ही भाग रहे हैं।
सीमा सुरक्षा बल (BSF) इसे “रिवर्स एक्सोडस”—उलटा पलायन कह रहा है।
SIR अभियान और NRC की आशंकाओं ने बढ़ाया भय उत्तर 24 परगना से लेकर कोलकाता उपनगरों तक, इन दिनों सबसे तेजी से फैल रही चीज है—डर।
चुनाव आयोग द्वारा शुरू किए गए विशेष गहन संशोधन (SIR) अभियान के बाद दस्तावेजों की जांच, घर-घर सत्यापन, और संदिग्ध प्रवासियों पर निगरानी ने इन अवैध नागरिकों में खलबली मचा दी।“BSF पकड़कर वापस भेज देगी… इसलिए आ गए” —
अब्दुल मोमिन, सतखीरा से आया परिवारअब्दुल मोमिन, जो 5 साल से हावड़ा के डोमजूड़ में रह रहे थे, कहते हैं—हम दलाल के जरिए आए थे। SIR शुरू हुआ तो डर लगने लगा। सुना कि BSF पकड़कर वापस भेज रही है। इसलिए सब सामान उठाया और परिवार के साथ यहां आ गए।ऐसे ही कई परिवारों के पास कोई वैध भारतीय दस्तावेज नहीं हैं।कई महिलाएँ घरेलू सहायिका थीं, पुरुष मैनुअल मजदूर, कई छोटे दुकानदार—
लेकिन दस्तावेज़ी पहचान किसी के पास भी नहीं।
जीरो लाइन पर फंसे लोग—दोनों देशों ने दी ‘ना’स्थिति और भी गंभीर हो गई है।BSF उन्हें भारत में वापस नहीं आने दे रहीBGB (बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश) उन्हें बांग्लादेश में घुसने नहीं दे रहीदो देशों की सीमा सुरक्षा एजेंसियों के बीच फंसे इन 500 से ज्यादा लोगों के लिए यह मानवीय संकट में बदल चुका है।
स्थानीय लोग तिरपाल, पानी और खाना देकर मदद कर रहे हैं, लेकिन भीड़ बढ़ती जा रही है।यह भीड़ किन इलाकों से आई?इनमें से अधिकांश लोग मूल रूप से सतखीरा और जशोर जिलों के निवासी हैं जो कई वर्षों से कोलकाता और आसपास के क्षेत्रों—बिराटी मध्यम ग्राम राजार हाटन्यू टाउनसॉल्ट लेक—में घरेलू कामगार, डे-लेबर और छोटे व्यवसायों में काम कर रहे थे।
उनमें से कई महिलाओं के पास भारतीय मोबाइल नंबर, राशन कार्ड तक हैं, लेकिन फिर भी वे चिंता में हैं।“NRC आ रहा है…
हम पकड़े जाएंगे” —
महिलाओं में गहरी आशंका एक महिला, जो 10 वर्षों से न्यू टाउन में घरेलू सहायक के रूप में काम कर रही थी, कहती है
—NRC की बात सुनते ही डर लगा।
मेरे पास कुछ कागज नहीं है। इसलिए वापस जा रही हूँ… चाहे जीरो लाइन पर ही क्यों न फंस जाऊं।”दु:खद यह है कि उसके पति के पास आधार और वोटर कार्ड दोनों हैं—लेकिन वह स्वयं बिना दस्तावेजों के है।
BSF का दावा: “यह इस साल का सबसे बड़ा रिवर्स एक्सोडस”
BSF का कहना है कि—पहले रोज 10–20 लोग लौटने की कोशिश करते थे
SIR शुरू होने के बाद रोज 150–200 लोग सीमा की ओर भाग रहे हैंसीमा पर बायोमेट्रिक जांच की जा रही है और संदिग्ध लोगों को पुलिस के हवाले किया जा रहा है।
BSF अधिकारी बताते हैं—यह भीड़ अफवाहों, डर और दस्तावेजी असुरक्षा की देन है। यह एक मानवीय संकट जैसा दिख रहा है।
”TMC बनाम BJP: ‘SIR और NRC’ पर जमकर राजनीति शुरू
सीमा पर संकट के असल कारण पर राजनीतिक युद्ध छिड़ चुका है।
BJP का आरोप> “ये लोग अवैध घुसपैठिए हैं।SIR अभियान बिल्कुल सही है।पश्चिम बंगाल को अवैध घुसपैठ से मुक्त करना जरूरी है।”TMC का पलटवारSIR, NRC का पिछला दरवाजा है।चुनाव आयोग और केंद्रीय एजेंसियां राजनीतिक एजेंडे पर काम कर रही हैं।यह भय फैलाकर वोटर लिस्ट में छेड़छाड़ है।”दलाल भी निकले मौके पर छोड़कर भागकई फंसे लोगों ने बताया कि वे दलालों को 10,000–20,000 रुपये तक दे चुके थे, जिन्होंने सीमा पार कराने का दावा किया था। भीड़ बढ़ते ही दलाल मौके से भाग गए और लोगों को असहाय छोड़ दिया।
स्थानीय लोग भी असमंजस में—लेकिन मानवता की मिसालहाकिमपुर के स्थानीय निवासी तिरपाल, पानी और चावल दाल का इंतजाम कर रहे हैं।एक व्यवसायी ने कहा—हम राजनीति नहीं समझते… लेकिन महिलाएँ और बच्चे हैं। मदद तो करनी ही होगी।
”निष्कर्ष:
बंगाल की सीमा पर संकट गहराया, केंद्र–राज्य टकराव और बढ़ाजीरो लाइन पर फंसे इन 500 लोगों की त्रासदी सिर्फ सीमा का मुद्दा नहीं—यह घुसपैठ, राजनीतिक संघर्ष, भय, अफवाहों और प्रशासनिक सख्ती का मिला-जुला परिणाम है।जहाँ एक ओर BSF इसे सुरक्षा की कार्रवाई बताती है, वहीं दूसरी ओर TMC इसे मानवता बनाम राजनीति का प्रश्न बता रही है।
लेकिन सच्चाई यह है कि—सीमा पर बैठे इन 500 लोगों की रातें जस की तस बीत रही हैं। न भारत स्वीकार कर रहा, न बांग्लादेश।और यह उलटा पलायन आने वाले दिनों में और बड़ा संकट बन सकता है।
