बी के झा
NSK

कोलकाता/मुर्शिदाबाद / नई दिल्ली, 7 दिसंबर
पश्चिम बंगाल में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले धार्मिक प्रतीकों और सामूहिक आस्था-आयोजनों की राजनीति एक बार फिर तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने रविवार को घोषणा की कि वह फरवरी में एक लाख लोगों की सहभागिता के साथ एक बड़े पैमाने पर ‘कुरान ख्वानी’ (कुरान पाठ) का आयोजन करेंगे।यह घोषणा उस समय आई है जब राज्य में हिंदू धार्मिक संगठनों का एक समूह—सनातन संस्कृति संसद—
कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में पांच लाख लोगों के साथ गीता पाठ कार्यक्रम कर रहा है।कबीर ने दावा किया कि उनका आयोजन “धार्मिक अधिकार” की अभिव्यक्ति है और इसके बाद “बाबरी मस्जिद निर्माण कार्य” शुरू किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि कार्यक्रम में शामिल होने वाले सभी लोगों को मांस-चावल का सामुदायिक भोज दिया जाएगा।6 दिसंबर की तारीख और राजनीतिक संदेश हंगामा तब बढ़ा जब कबीर ने मुर्शिदाबाद के रेजिनगर में 6 दिसंबर, बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की बरसी के दिन, एक नई मस्जिद की प्रतीकात्मक नींव रखी।कार्यक्रम के दौरान मौलवियों के साथ मंच पर रिबन काटा गया, और भीड़ में मौजूद लोगों ने “नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर” के नारे लगाए।
गौर करने वाली बात यह रही कि वास्तविक निर्माण स्थल आयोजन स्थल से लगभग एक किलोमीटर दूर था, लेकिन वहां भीड़ में बड़ी संख्या में लोग ईंट लेकर पहुंचे।इस कदम ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी—टीएमसी ने कबीर को “सांप्रदायिक राजनीति” का आरोप लगाते हुए पहले ही निलंबित कर दिया था।विपक्षी दलों ने भी इस घटना को “चुनावी ध्रुवीकरण की कोशिश” करार दिया।सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतज़ाम राज्य पुलिस, रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) और केंद्रीय सुरक्षाबलों की भारी तैनाती के बीच यह कार्यक्रम हुआ।
प्रशासन ने रेजिनगर और पास के बेलडांगा इलाके को“संवेदनशील हाई-सेक्योरिटी ज़ोन”घोषित कर दिया था क्योंकि भीड़ बढ़ने और साम्प्रदायिक तनाव की आशंका बनी हुई थी।स्थानीय प्रशासन ने कहा कि यह तैनाती किसी भी अप्रिय स्थिति को रोकने के लिए “सावधानीपूर्ण कदम” थी।हुमायूं कबीर का तर्क:
“उपासना स्थल बनाना संवैधानिक अधिकार”निलंबन के बाद अधिक मुखर हुए कबीर ने कहा—मैं कुछ भी असंवैधानिक नहीं कर रहा हूँ। उपासना स्थल बनाना संविधान का दिया अधिकार है। बाबरी मस्जिद बनाई जाएगी।उन्होंने आरोप लगाया कि उनके कदमों को “गलत तरीके से राजनीतिक रंग” दिया जा रहा है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों की राय
1. चुनावी वर्ष में धार्मिक प्रतीकवाद की बढ़ती भूमिका राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि हिन्दू और मुस्लिम समुदायों में बड़े पैमाने पर धार्मिक आयोजनों का बढ़ना कोई संयोग नहीं है, बल्कि यह चुनाव से पहले दोनों पक्षों में “भावनात्मक लामबंदी” का संकेत है।
2. टीएमसी की मुश्किलें और विपक्ष का मौकाकबीर के कदम ने टीएमसी को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया है।विशेषज्ञों का कहना है कि—टीएमसी मुस्लिम वोटों को खोने का जोखिम नहीं ले सकतीपर अतिवादी छवि से भी बचना चाहती हैयह संतुलन साधना उसके लिए चुनौती बन सकता है।
3. संवेदनशील तारीख पर आयोजन से विवाद और गहराया6 दिसंबर की तारीख, जो स्वयं में देश के इतिहास में अत्यंत संवेदनशील है, पर मस्जिद नींव-पूजन का कार्यक्रम घोषित करना “बहुत प्रतीकात्मक और जानबूझकर चुना गया कदम” माना जा रहा है।सामाजिक तानाबाना और प्रशासनिक सतर्कता
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि धार्मिक आयोजनों का चुनावी उपयोग सामाजिक सद्भाव के लिए चुनौती बन सकता है।सरकारी संस्थान फिलहाल“कानून व्यवस्था सर्वोपरि”की नीति पर काम कर रहे हैं और मुर्शिदाबाद से लेकर कोलकाता तक सुरक्षा एजेंसियाँ अलर्ट पर हैं।
निष्कर्ष:
बंगाल की राजनीति में धर्म की बढ़ती छाया हुमायूं कबीर का प्रस्तावित कुरान ख्वानी,गीता पाठ का भव्य आयोजन,और मस्जिद नींव-पूजन—तीनों मिलकर संकेत देते हैं कि आने वाला चुनाव पहचान, भावना और धार्मिक प्रतीकवाद के इर्द-गिर्द घूम सकता है।
राजनीतिक दल इसे “मतदाता संदेश” की भाषा में देख रहे हैं,जबकि प्रशासन “कानून व्यवस्था और सामाजिक शांति” को दांव पर नहीं लगाने देना चाहता।
