बी के झा
NSK


नई दिल्ली, 2 जुन
देश की राजनीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति इन दिनों दो ऐसे घटनाक्रमों के इर्द-गिर्द घूम रही है, जिन्होंने लोकतंत्र, कानून व्यवस्था और वैश्विक सुरक्षा पर नई बहस छेड़ दी है। एक ओर पश्चिम बंगाल में विपक्षी सांसदों पर कथित हमलों को लेकर राष्ट्रपति शासन की मांग तेज हो गई है, तो दूसरी ओर मध्य पूर्व में ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने की धमकी ने पूरी दुनिया की धड़कनें बढ़ा दी हैं।
महाराष्ट्र में बैठी विपक्षी पार्टी शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने पश्चिम बंगाल की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है। वहीं हजारों किलोमीटर दूर खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने भारत समेत दुनिया की अर्थव्यवस्था के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।
बंगाल की राजनीति में बढ़ा तापमान
तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी पर कथित हमलों को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। शिवसेना (उद्धव गुट) के मुखपत्र सामना ने तीखे संपादकीय में आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है और राज्य सरकार विपक्षी नेताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रही है।संपादकीय में यह भी सवाल उठाया गया कि यदि ऐसी घटनाएं किसी अन्य राजनीतिक व्यवस्था में होतीं, तो क्या राज्यपाल तत्काल हस्तक्षेप की सिफारिश नहीं करते?
राष्ट्रपति शासन की मांग: राजनीति या संवैधानिक चिंता?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रपति शासन की मांग केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं बल्कि व्यापक राजनीतिक संदेश भी है।राजनीतिक मामलों के विश्लेषक प्रो. अरविंद मिश्रा कहते हैं,”जब किसी राज्य की घटनाओं पर दूसरे राज्य की प्रमुख राजनीतिक पार्टी प्रतिक्रिया देती है, तो यह केवल सहानुभूति नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने की कोशिश भी होती है। बंगाल अब केवल एक राज्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा रणक्षेत्र बन चुका है।”उनके अनुसार आगामी राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए बंगाल की हर घटना राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन रही है।
कानूनविदों की राय: राष्ट्रपति शासन अंतिम विकल्प
संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ अधिवक्ता राजीव शुक्ला का कहना है,”भारतीय संविधान का अनुच्छेद 356 किसी राजनीतिक विवाद का समाधान नहीं, बल्कि असाधारण परिस्थितियों के लिए बनाया गया प्रावधान है। केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप या छिटपुट हिंसक घटनाएं राष्ट्रपति शासन का स्वतः आधार नहीं बन सकतीं।”उनके अनुसार राष्ट्रपति शासन लागू करने के लिए यह साबित होना आवश्यक है कि राज्य की संवैधानिक व्यवस्था पूरी तरह विफल हो चुकी है।
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया
विपक्षी दलों के एक वर्ग का कहना है कि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों पर हमले किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हैं और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।दूसरी ओर सत्तापक्ष से जुड़े नेताओं का तर्क है कि घटनाओं की जांच पूरी होने से पहले राजनीतिक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।यानी राजनीतिक बयानबाजी अपने चरम पर है और वास्तविक तथ्य जांच एजेंसियों की रिपोर्ट के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे।
उधर खाड़ी में नया संकट
जब देश की राजनीति बंगाल पर बहस कर रही है, उसी समय मध्य पूर्व में ऐसा संकट खड़ा हो गया है जिसका असर सीधे भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।ईरान ने एक बार फिर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने की धमकी देकर वैश्विक ऊर्जा बाजार को चिंता में डाल दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है।ईरान का आरोप है कि लेबनान और गाजा में जारी सैन्य कार्रवाइयों के कारण क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ रहा है और ऐसी स्थिति में वार्ता आगे नहीं बढ़ सकती।
रक्षा विशेषज्ञों की चेतावनी
रक्षा मामलों के जानकार लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) आर. के. सिंह कहते हैं,”यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही बाधित होती है तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं और वैश्विक व्यापार प्रभावित हो सकता है।”उनके अनुसार समुद्री सुरक्षा अब केवल सैन्य मुद्दा नहीं बल्कि आर्थिक स्थिरता का भी प्रश्न बन चुकी है।
शिक्षाविदों का आकलन
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ डॉ. विनोद कुमार का कहना है,”मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष अब क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर निकल चुके हैं। आज लेबनान में होने वाली घटना का प्रभाव दिल्ली, टोक्यो, लंदन और वाशिंगटन तक महसूस किया जा सकता है।”उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण के दौर में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते, बल्कि उनके आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव पूरी दुनिया झेलती है।
भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती?
भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। यदि होर्मुज मार्ग प्रभावित होता है तो तेल की कीमतों में उछाल, परिवहन लागत में वृद्धि और महंगाई का दबाव बढ़ सकता है।अर्थशास्त्रियों का मानना है कि लंबे समय तक संकट बने रहने पर इसका असर आम उपभोक्ताओं से लेकर उद्योग जगत तक महसूस किया जाएगा।
निष्कर्ष
एक ओर पश्चिम बंगाल की राजनीति राष्ट्रपति शासन की मांग को लेकर गरमा रही है, तो दूसरी ओर खाड़ी क्षेत्र का संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोरने की क्षमता रखता है। दोनों घटनाएं अलग-अलग जरूर हैं, लेकिन एक समान संदेश देती हैं—राजनीतिक अस्थिरता और संघर्ष का प्रभाव सीमाओं तक सीमित नहीं रहता।बंगाल में लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और मध्य पूर्व में कूटनीतिक समाधान, दोनों ही आने वाले दिनों में बेहद महत्वपूर्ण होंगे।
क्योंकि एक तरफ देश की राजनीतिक स्थिरता का सवाल है, तो दूसरी तरफ दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक अर्थव्यवस्था का भविष्य।
