बाबरी मस्जिद के लिए नेहरू चाहते थे सरकारी धन, पर पटेल ने रोका”—राजनाथ*सिंह के बयान से गूंज उठा राजनीतिक गलियारा —एकता मार्च में सरदार पटेल की विरासत पर ‘राजनीतिक पुनर्पाठ’

बी के झा

वडोदरा/नई दिल्ली, 2 दिसंबर

सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में साधली गांव में आयोजित ‘एकता मार्च’ के मंच से रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को एक ऐसा दावा किया, जिसने देश की राजनीति, इतिहास और विचारधारात्मक विमर्श को नए सिरे से झकझोर दिया।राजनाथ ने खुलकर कहा कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू सार्वजनिक धन से बाबरी मस्जिद का निर्माण कराना चाहते थे, परंतु सरदार पटेल ने इसे स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया।

“सेक्युलरिज़्म बनाम तुष्टीकरण”—

राजनाथ ने खोला पुराना अध्यायसभा को संबोधित करते हुए राजनाथ सिंह ने पटेल को “सच्चा उदारवादी और निष्पक्ष धर्मनिरपेक्ष नेता” बताते हुए कहा कि—“

नेहरू बाबरी मस्जिद निर्माण के लिए सरकारी कोष का उपयोग करना चाहते थे, लेकिन पटेल ने साफ कह दिया कि सार्वजनिक धन से धार्मिक संरचना का निर्माण स्वीकार्य नहीं है।”उन्होंने कहा कि पटेल का तर्क था—धार्मिक स्थलों का निर्माण जनता के दान से होसरकार का पैसा जनसेवा पर खर्च हो राजनाथ के शब्दों में—“सरकार ने न सोमनाथ मंदिर पर पैसा दिया था, न ही राम मंदिर पर। जनता ने दिया, जनता ने बनाया—यही वास्तविक धर्मनिरपेक्षता है।

”सोमनाथ मंदिर का उदाहरण—“तीस लाख जनता ने दिए, सरकार ने नहीं”राजनाथ सिंह ने कहा कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के समय जब नेहरू ने मुद्दा उठाया, तब पटेल ने स्पष्ट कर दिया:तीस लाख रुपये जनता ने दान किए हैं, सरकार का पैसा इसमें नहीं लगेगा।राजनाथ ने कहा कि इसी सिद्धांत का पालन आज राम मंदिर निर्माण में भी किया गया

—“अयोध्या का भव्य मंदिर पूरी तरह जनता के दान से बना—सरकार ने एक रुपया नहीं दिया।”“कुछ लोग पटेल की विरासत मिटाना चाहते थे”—राजनाथ का आरोप राजनाथ ने बिना नाम लिए कहा कि दशकों तक कुछ शक्तियां सरदार पटेल के योगदान को “पर्दे के पीछे धकेलने” की कोशिश करती रहीं।उन्होंने दावा किया कि:पटेल को भारत रत्न देने में देर की गई उनकी भूमिका को कम करके दिखाया गया

नेहरू ने खुद को भारत रत्न दे दिया, पर पटेल को नहीं दिया राजनाथ सिंह ने कहा—

“प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्टैच्यू ऑफ यूनिटी बनाकर पटेल को वह सम्मान दिलाया, जो उन्हें दशकों पहले मिल जाना चाहिए था।”1946 की कहानी—‘पटेल अध्यक्ष बन सकते थे, पर गांधी के कहने पर हट गए’राजनाथ ने उस ऐतिहासिक प्रसंग का भी उल्लेख किया, जिसमें 1946 के कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव में अधिकांश प्रांतीय समितियों ने पटेल के नाम का प्रस्ताव रखा था।लेकिन—

गांधी ने पटेल से नाम वापस लेने का अनुरोध कियापटेल ने तत्काल नामांकन वापस ले दिया परिणामस्वरूप नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बनेऔर इसी कारण भारत के पहले प्रधानमंत्री राजनाथ ने इसे “पटेल की निस्वार्थता” का सर्वोच्च उदाहरण बताया।

कश्मीर मुद्दा—“अगर पटेल की बात मानी होती, समस्या नहीं रहती”कश्मीर पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि—“कश्मीर के विलय के समय पटेल की सलाह को न मानने की भारी कीमत देश ने चुकाई। यदि फैसला उनके अनुसार होता, कश्मीर आज की समस्या न होता।”राजनाथ ने पटेल की दृढ़ता के उदाहरण देते हुए कहा—

हैदराबाद के विलय में पटेल ने कठोर रुख अपनायायदि वह न करते, तो आज हैदराबाद भारत का हिस्सा नहीं शक्ति राजनाथ ने कहा कि मोदी सरकार ने भी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और अनुच्छेद 370 हटाकर वही दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाई।“भारत किसी को छेड़ता नहीं, लेकिन यदि कोई हमें छेड़े…”राजनाथ सिंह ने कहा कि—“भारत शांतिप्रिय है। लेकिन अगर कोई हमें उकसाता है, तो भारत उसे नहीं छोड़ेगा।”उन्होंने कहा कि आज भारत “दूसरों के नियम नहीं, अपने नियमों पर बात करने की स्थिति” में है।नेहरू-पटेल विमर्श का राजनीतिक अर्थ

राजनाथ सिंह के इस बयान से तीन प्रमुख राजनीतिक संदेश निकलते हैं—

1. इतिहास के विवादित अध्यायों का नया पुनर्पाठनेहरू बनाम पटेल की बहस एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में।

2. भाजपा द्वारा पटेल की छवि को ‘राष्ट्र निर्माता’ के रूप में पुनर्स्थापित करने की रणनीतिमोदी सरकार की लगातार कोशिश रही है कि पटेल की विरासत को अधिक व्यापक रूप में सामने रखा जाए।

3. कांग्रेस पर विचारधारात्मक हमलानेहरू पर उठाए गए सवाल प्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस नेतृत्व पर राजनीतिक दबाव बनाते हैं।एकता मार्च का महत्व—पटेल की विचारधारा के पुनरुत्थान की कोशिश गुजरात सरकार द्वारा आयोजित एकता पदयात्रा—

26 नवंबर को करमसद से शुरू6 दिसंबर को स्टैच्यू ऑफ यूनिटी पर समापन इस पूरी यात्रा का उद्देश्य है—“पटेल के राष्ट्र निर्माण के योगदान को जन-जन तक पहुंचाना।

”रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का यह भाषण केवल एक कार्यक्रम का संबोधन नहीं था—यह स्वतंत्र भारत के इतिहास, नेतृत्व और राष्ट्र-निर्माण के सिद्धांतों की एक नई व्याख्या थी।

चाहे बाबरी मस्जिद–सोमनाथ मंदिर बहस हो, नेहरू–पटेल समीकरण हो या कश्मीर इतिहास की जटिलता—

राजनाथ ने इन सभी मुद्दों को जोड़कर एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया:“सरदार पटेल की विरासत को न दबाया जा सकता है, न छिपाया जा सकता है—वह जितनी मजबूत थी, उतनी ही प्रासंगिक आज भी है।

NSK

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