बी के झा
NSK


नई दिल्ली/ मुंबई, 23 जनवरी
23 जनवरी केवल एक तारीख नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रचेतना, सांस्कृतिक स्वाभिमान और राजनीतिक विमर्श के इतिहास में विशेष महत्व रखती है। इसी दिन जहां एक ओर नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे महान स्वतंत्रता सेनानी का स्मरण होता है, वहीं दूसरी ओर शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे की जन्म शताब्दी देश की राजनीति को आत्ममंथन का अवसर प्रदान करती है।बालासाहेब: केवल नेता नहीं, एक विचारधारा बालासाहेब ठाकरे को महज़ एक राजनीतिक नेता के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। वे एक ऐसे वैचारिक योद्धा थे जिन्होंने महाराष्ट्र की अस्मिता, हिंदू स्वाभिमान और मराठी मानुष के आत्मसम्मान को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में स्थापित किया।एक कार्टूनिस्ट से जननायक बनने की उनकी यात्रा यह सिद्ध करती है कि विचार जब जनभावना से जुड़ते हैं, तो वे सत्ता से भी अधिक प्रभावशाली हो जाते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी की श्रद्धांजलि: वैचारिक सम्मान या राजनीतिक संकेत?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बालासाहेब ठाकरे की जन्म शताब्दी पर दिया गया संदेश केवल औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं था, बल्कि उसमें एक गहरा वैचारिक संकेत भी निहित है।पीएम मोदी ने बालासाहेब को—तेज़ बुद्धि का धनीओजस्वी वक्ताअडिग विश्वास वाला नेताबताते हुए उनके संस्कृति, साहित्य और पत्रकारिता से जुड़ाव को भी रेखांकित किया।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह संदेश उस वैचारिक सेतु को दर्शाता है जो हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक चेतना के साझा धरातल पर भाजपा और बालासाहेब की सोच को जोड़ता है। यह संयोग नहीं कि पीएम मोदी ने बालासाहेब के विज़न को महाराष्ट्र की प्रगति से जोड़ते हुए भविष्य की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की।
उद्धव ठाकरे गुट: विरासत पर अधिकार या विचारों की दूरी?
दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाला शिवसेना (यूबीटी) गुट बालासाहेब की विरासत को अपना नैतिक अधिकार मानता है।हालांकि राजनीतिक यथार्थ यह है कि—बालासाहेब का हिंदुत्व सांस्कृतिक और मुखर थाजबकि वर्तमान उद्धव गुट की राजनीति समझौतावादी और गठबंधन-केंद्रित मानी जा रही है यही कारण है कि भाजपा खेमे और कई शिक्षाविद यह प्रश्न उठा रहे हैं कि क्या केवल नाम और स्मृति से विरासत जीवित रहती है, या विचारों के पालन से?
हिंदू धर्मगुरु की दृष्टि से बालासाहेब
एक हिंदू धर्मगुरु और शिक्षाविद की दृष्टि से बालासाहेब ठाकरे उस परंपरा के प्रतिनिधि थे जहां—धर्म राजनीति का उपकरण नहीं, बल्कि राजनीति धर्म की रक्षा का साधन होती है।उनका हिंदुत्व किसी ग्रंथीय कट्टरता में नहीं, बल्कि सभ्यता, संस्कृति और स्वाभिमान में निहित था। यही कारण है कि वे मुस्लिम समाज के भीतर भी उन लोगों का सम्मान करते थे जो राष्ट्र और संविधान के प्रति निष्ठावान थे।बसंत पंचमी और नेताजी बोस: राष्ट्रचेतना का त्रिकोण पीएम मोदी द्वारा बसंत पंचमी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस को साथ-साथ स्मरण करना भी प्रतीकात्मक है।
मां सरस्वती – ज्ञान और विवेक नेताजी बोस – पराक्रम और बलिदान बालासाहेब ठाकरे – सांस्कृतिक आत्मविश्वास में तीनों मिलकर आधुनिक भारत की राष्ट्रचेतना का त्रिकोण बनाते हैं।
नेताजी को लेकर पीएम मोदी का यह श्लोक—एतदेव परं शौर्यं यत् परप्राणरक्षणम्…यह स्पष्ट करता है कि वर्तमान सत्ता स्वयं को उसी परंपरा से जोड़कर देखती है जहां राष्ट्र सर्वोपरि है।
निष्कर्ष:
स्मरण नहीं, मूल्यांकन का समय बालासाहेब ठाकरे की जन्म शताब्दी केवल पुष्पांजलि का अवसर नहीं, बल्कि यह प्रश्न करने का समय है कि—क्या हम उनके विचारों को समझ रहे हैं?
या केवल उनकी तस्वीरों और नामों का उपयोग कर रहे हैं?राजनीति में स्मृतियां तब तक जीवित रहती हैं, जब तक उनके मूल्य आचरण में दिखें।बालासाहेब ठाकरे इस दृष्टि से आज भी प्रासंगिक हैं—
एक चेतावनी के रूप में, एक प्रेरणा के रूप में, और एक मापदंड के रूप में।
