बी के झा
NSK

पटना / नई दिल्ली 26 अक्टूबर
बिहार की सियासत इस वक्त चुनावी उबाल पर है। एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह “जंगलराज” का पुराना राग छेड़े हुए हैं, तो दूसरी ओर महागठबंधन के युवा नेता तेजस्वी यादव ने भावनात्मक और तीखे तेवरों के साथ जनता के दिल में जगह बनाने की कोशिश शुरू कर दी है।
रविवार को पटना में आयोजित जनसभा में तेजस्वी यादव ने बीजेपी और जेडीयू पर करारा हमला बोलते हुए कहा —बिहार की जनता ने बीजेपी और नीतीश कुमार को पूरे 20 साल दिए हैं। अब हम सिर्फ 20 महीने मांग रहे हैं। अगर हमने जनता के भरोसे को तोड़ा, तो हमें कान पकड़कर सत्ता से बाहर फेंक दीजिए, क्योंकि असली मालिक बिहार की जनता है।
अमित शाह पर तीखा हमला:
“इडी-सीबीआई ही हैं इनके चुनावी एजेंट”तेजस्वी ने गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधते हुए कहा कि “शाह जी को बिहार की मिट्टी से नहीं, गुजरात की फ़ैक्ट्रियों से लगाव है। उन्हें बिहार के किसानों, बेरोजगार युवाओं या मजदूरों से कोई मतलब नहीं।
उन्हें तो बस बिहार से सस्ता मज़दूर चाहिए — ताकि गुजरात की मिलों में काम चल सके।”उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी नेताओं ने अपनी हार के डर से चुनाव के दौरान ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स जैसी एजेंसियों को राजनीतिक हथियार बना लिया है।
अब चुनाव आयोग की जगह जांच एजेंसियां प्रचार कर रही हैं, और बीजेपी ‘विकास’ की जगह ‘विवाद’ बेच रही है,”
तेजस्वी ने कहा।“
चाचा जी को किडनैप कर लिया गया है” —
नीतीश पर व्यंग्य तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर भी तीखा तंज कसते हुए कहा —
चाचा जी को अब अपने ही लोग किडनैप कर चुके हैं। जेडीयू के तीन-चार नेता और अमित शाह उन्हें रिमोट से चला रहे हैं।
चुनाव के बाद इनका भी वही हाल होगा जो दूध से मक्खी निकालने जैसा होता है —
निकाल फेंक दिया जाएगा।”उनकी यह टिप्पणी सुनकर भीड़ ने ठहाकों और तालियों से स्वागत किया।
छोटे सहयोगी, बड़ा तालमेल — साथ दिखे तेजस्वी और मुकेश सहनी सभा में विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के संस्थापक और पूर्व मंत्री मुकेश सहनी भी मंच पर मौजूद थे। तेजस्वी और सहनी ने एक साथ कटिहार, किशनगंज और अररिया में जनसभाएं कीं।मुकेश सहनी ने कहा कि “महागठबंधन बिहार के आम इंसान का गठबंधन है, जबकि एनडीए उद्योगपतियों का।”
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि तेजस्वी यादव इस बार “भावनात्मक अपील + आक्रामक टोन” की रणनीति पर काम कर रहे हैं। उनके भाषण में नवजवानों की उम्मीद, किसानों की तकलीफ और बिहार के सम्मान की झलक साफ दिख रही है।
वहीं विश्लेषकों का कहना है कि एनडीए जहां “जंगलराज” का डर दिखा रहा है, वहीं तेजस्वी “भरोसे की राजनीति” की बात कर रहे हैं।
14 नवंबर को फैसला जनता के दरबार में
अब सबकी निगाहें 14 नवंबर पर टिक गई हैं — जब बिहार की जनता तय करेगी कि 20 साल के अनुभव भारी पड़ेंगे या 20 महीने का भरोसा।
तेजस्वी यादव और मुकेश सहनी की साझा रैली में उमड़ा जनसैलाब —
मंच से गूंजा नारा:
“बिहार मांगे बदलाव, अबकी बार तेजस्वी सरकार
