बी के झा
NSK

पटना, 22 नवंबर
बिहार में नीतीश कुमार दसवीं बार मुख्यमंत्री तो बन गए, लेकिन इस बार सत्ता की असली चाबी किसी और के पास है—भारतीय जनता पार्टी (BJP) के। 20 साल बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि बिहार का सबसे ताकतवर मंत्रालय गृह विभाग बीजेपी के हाथों में है। डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी अब राज्य की कानून–व्यवस्था, पुलिस प्रशासन और सुरक्षा तंत्र के मुखिया होंगे।
राजनीति के वरिष्ठ विश्लेषकों का सीधा-सा निष्कर्ष है—
“सरकार नीतीश की है, पर नियंत्रण बीजेपी का।”
बीजेपी को गृह मंत्रालय: बिहार की राजनीति में ‘गेम-चेंजर’ क्षणनीतीश कुमार वर्षों तक गृह विभाग अपने पास रखते आए—यह उनके शासन शैली का आधार था। पुलिस उनके सीधे नियंत्रण में रहती थी और प्रशासनिक तंत्र पर उनकी पकड़ अभेद्य थी।लेकिन इस बार परिदृश्य बदला हुआ है—शपथ समारोह में 26 मंत्रियों में 14 बीजेपी केजेडीयू के सिर्फ 8 मंत्रीगृह विभाग, मद्य निषेध, निबंधन, आपदा प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय बीजेपी के पास
नीतीश कुमार ने अपने पास सिर्फ वे विभाग रखे जो नौकरशाही और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जुड़े माने जाते हैं—जैसे सामान्य प्रशासन, कैबिनेट सचिवालय, सतर्कता विभागवरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार डॉ. अनिल कुमार कहते हैं—“यह पहली बार है जब नीतीश कुमार को शासन की रील और स्टीयरिंग दोनों छोड़कर सिर्फ ड्राइविंग सीट दी गई है।”
101–101 सीट फॉर्मूला: पहले ही हो गया था संकेतइस बार चुनाव में बीजेपी और जेडीयू दोनों ने बराबर सीटों पर लड़ाई लड़ी—101–101। यह कदम ही रणनीतिक संकेत था कि अब ‘बड़े भाई–छोटे भाई’ वाला समीकरण खत्म हो चुका है।बीजेपी ने नीतीश को मुख्यमंत्री बनाकर अपना वादा निभाया, पर सत्ता का असली टेक्निकल कंट्रोल अपने पास कर लिया।
बीजेपी चाहती थी कि—क़ानून-व्यवस्था में सीधा हस्तक्षेप सीमांचल में अवैध घुसपैठ पर कड़ी निगरानी पुलिसिंग पर सख्त नियंत्रणI B-NIA के साथ राज्य की समन्वित कार्रवाई लव जिहाद, भूमि विवाद, चरमपंथ, और आपराधिक गिरोहों पर आक्रामक नीति अब ये सब संभव है, क्योंकि गृह मंत्रालय बीजेपी के पास है।
9 नए चेहरे—बीजेपी ने किया युवा और आक्रामक टीम का गठन बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने रात भर मंत्रियों की सूची पर काम किया और 9 नए चेहरों को सरकार में भेजा। यह बदलाव बताता है कि बीजेपी अब बिहार में—अपना भविष्य नेतृत्व तैयार कर रही हैसंगठन से जुड़े मेहनती चेहरों को आगे ला रही है जातीय समीकरणों से ज्यादा ‘परफॉर्मेंस मॉडल’ पर जोर दे रही है इसके उलट जेडीयू ने अपने पुराने 8 चेहरों को बनाए रखा, जिससे उनका दायरा सीमित दिख रहा है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया:
“नीतीश कुमार अब एक प्रतीक मात्र हैं”आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने पहले ही कहा—“नीतीश जी अब बीजेपी के मुखिया नहीं, मुखौटा हैं।”
कांग्रेस ने इसे “नीतीश का राजनीतिक समर्पण” बताया है।
वाम दल कहते हैं—“नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति को बीजेपी की गोद में बैठा दिया है।”
राजनीति विशेषज्ञों की राय भी लगभग इसी दिशा में है।प्रोफेसर सुरेश मिश्र का कहना है—“
नीतीश कुमार का कद अब प्रतीकात्मक हो गया है। सत्ता में वे जरूर हैं, पर सत्ता पर उनकी पकड़ अब सीमित है।”
क्या नीतीश कुमार का 20 साल का दबदबा खत्म?
नीतीश कुमार का पूरा शासन मॉडल—कानून–व्यवस्था जनता दरबारअपराध नियंत्रण पुलिस सुधार प्रशासनिक अनुशासन इन सभी की धुरी गृह विभाग रहा है।अब यह विभाग नहीं होने का सीधा अर्थ है कि—अपराध पर सख्ती की रणनीति बीजेपी तय करेगी पुलिस अधिकारियों के ट्रांसफर–पोस्टिंग में बीजेपी की प्राथमिकता चलेगी कानून-व्यवस्था पर विपक्ष के सवालों का जवाब बीजेपी को देना होगा
सुरक्षा एजेंसियों और केंद्र का सीधा तालमेल बीजेपी संभालेंगी
राजनीति का एक अनुभवी सूत्र कहता है—“गृह विभाग जाते ही नीतीश कुमार के शासन का केंद्रीय स्तंभ ढह गया। यह सत्ता हस्तांतरण का सबसे बड़ा संकेत है।
आगे बिहार की राजनीति किस दिशा में जाएगी?
1. बीजेपी का लक्ष्य—2029 का रोडमैप गृह विभाग के जरिए प्रशासनिक पकड़ संगठन की मजबूती नये चेहरों का राष्ट्रीय स्तर पर निर्माण
2. जेडीयू का भविष्य—धीरे-धीरे हाशिये पर?जेडीयू को अब विभाग भी कम मिले हैं और राजनीतिक स्पेस भी।
3. नीतीश की भूमिका—संयोजक, संचालक या सिर्फ नाममात्र CM?
उनकी वास्तविक शक्ति अब सीमित है।वे शासन चलाएंगे, शासन नियंत्रित नहीं करेंगे।
4. विपक्ष—और अधिक आक्रामक होगाखासतौर पर आरजेडी, जो जानती है कि बीजेपी अब उनके विरुद्ध सख्त कदम उठा सकती है।
निष्कर्ष:
बिहार में सत्ता का केंद्र बदल चुका है बिहार की राजनीति हमेशा से गठबंधन और संतुलन की राजनीति रही है, लेकिन इस बार संतुलन टूट गया है।
नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं,पर सरकार की कमान अब बीजेपी के हाथों में मजबूती से पकड़ ली गई है।
बीजेपी ने साफ़ संदेश दे दिया है—“बिहार अब नए राजनीतिक युग में प्रवेश कर चुका है।
