बी के झा
NSK

पटना / न ई दिल्ली, 3 नवंब
बिहार चुनाव 2025 का माहौल अपने चरम पर है। रैलियों की गूंज, नारों की तड़प और वादों की बाढ़ के बीच अब सारा खेल वोटों की बारीक़ गिनती पर टिक गया है। 6 नवंबर को पहले चरण और 11 नवंबर को दूसरे चरण की वोटिंग होगी। मगर दिलचस्प यह है कि 2020 के चुनाव में कई ऐसी सीटें थीं जहां हार-जीत का अंतर इतना मामूली था कि एक-एक वोट की अहमियत लोकतंत्र की धड़कन बन गई थी।कहीं कोई उम्मीदवार सिर्फ 12 वोट से हारा, तो कहीं 113 वोटों से जीत का स्वाद चख लिया गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बिहार की जनता का रुझान अक्सर बेहद नज़दीकी मुकाबलों से तय होता है — और यही वजह है कि इस बार भी हर सीट पर सियासी तापमान चरम पर है।
कुढ़नी में कांटे की टक्कर — 712 वोट से बना राजद का किलामुजफ्फरपुर की कुढ़नी विधानसभा सीट ने 2020 में चुनावी रोमांच का नया अध्याय लिखा था।यहाँ राजद के अनिल कुमार सहनी ने भाजपा के केदार प्रसाद गुप्ता को सिर्फ 712 वोटों से शिकस्त दी थी।यह जीत जितनी छोटी थी, उतनी ही निर्णायक साबित हुई —
क्योंकि इसी सीट ने पूरे जिले के राजनीतिक समीकरणों को हिला दिया था।
12 वोट से जीत — हिलसा में ‘भाग्य’ ने बदल दिया इतिहासहिलसा विधानसभा सीट ने उस वक्त पूरे बिहार में सुर्खियाँ बटोरी थीं जब जेडीयू के कृष्णमुरारी शरण ने राजद के अतरी मुनि को सिर्फ 12 वोटों से हराया था।यह अंतर इतना कम था कि गिनती पूरी होने के बाद घंटों तक पुनर्गणना की मांग होती रही।
आख़िरकार ‘12 वोट’ बिहार की राजनीति के इतिहास में लोकतांत्रिक बारीकी का प्रतीक बन गए।📉 113 वोट से कांग्रेस की हार, बरबीघा में थमी सांसें बरबीघा विधानसभा में जेडीयू के सुदर्शन कुमार ने कांग्रेस के गजानंद सहनी को महज 113 वोटों के फासले पर रोक दिया।
गिनती के दौरान स्थिति इतनी रोमांचक थी कि कभी कांग्रेस आगे निकलती, तो कभी जेडीयू।अंततः सुदर्शन कुमार ने मामूली अंतर से जीत दर्ज की, लेकिन यह हार कांग्रेस के लिए ‘सबक’ बन गई कि हर वोट की कीमत सोने के बराबर होती है।
रामगढ़, डेहरी, भोरे और बछवाड़ा — सियासी नतीजों ने कराई ‘सांसें अटका देने’ वाली गिनतीरामगढ़: राजद के सुधाकर सिंह ने बीएसपी के अंबिका सिंह को 189 वोटों से मात दी।डेहरी: राजद के फते बहादुर सिंह ने बीजेपी के सत्यनारायण सिंह को 464 वोटों से हराया।भोरे: जेडीयू के सुनील कुमार ने सीपीआई (एमएल) के जीतेंद्र पासवान को 462 वोटों से हराया।
बछवाड़ा: बीजेपी के सुरेंद्र मेहता ने सीपीआई के अवधेश राय को सिर्फ 484 वोटों से मात दी।हर सीट पर तस्वीर आख़िरी राउंड की गिनती तक साफ़ नहीं हुई थी। राजनीतिक पंडितों ने कहा था — “यह हार-जीत नहीं, लोकतंत्र का नज़दीकी रोमांच है।”
बखरी, परबत्ता और चकाई — जहाँ जीत की पतली रेखा ने तय किया ‘भाग्य’बखरी: सीपीआई के सूर्यकांत पासवान ने बीजेपी के रामशंकर पासवान को 777 वोटों से हराया।परबत्ता: जेडीयू के डॉ. संजीव कुमार ने राजद के दिगंबर प्रसाद तिवारी को 951 वोटों से शिकस्त दी।चकाई: निर्दलीय उम्मीदवार सुमित कुमार सिंह ने राजद की सावित्री देवी को 581 वोटों से मात दी।चकाई की जीत ने इस धारणा को भी तोड़ा कि “निर्दलीय उम्मीदवारों की कोई संभावना नहीं होती” — क्योंकि वहां जनता ने संगठन से ज़्यादा चेहरे पर भरोसा जताया।
2025 में फिर दोहराएंगे बिहारवासी वही ‘करीबी मुकाबले’?राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस बार का चुनाव भी उतना ही रोमांचक और करीबी हो सकता है जितना 2020 का रहा था।बदलते समीकरण, गठबंधन की उलझनें और जनता की चुप्पी संकेत दे रही हैं कि 14 नवंबर को वोटों की गिनती में कई सीटों पर ‘जीत का जश्न और हार का सदमा’ दोनों कुछ ही सौ वोटों के भीतर तय होंगे।बिहार की राजनीति में यह कहावत एक बार फिर जीवंत होती दिख रही है —यहाँ एक वोट भी राजा बना देता है, और एक वोट ही सिंहासन छीन लेता है।
