बी के झा
पटना / नई दिल्ली, 23 अक्टूबर
बिहार की सियासत अपने उफान पर है। महागठबंधन ने आखिरकार तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिया है। इस ऐलान के साथ ही सूबे की राजनीति में बयानबाज़ी का दौर शुरू हो गया है। जहां राजद और कांग्रेस के नेता तेजस्वी को “युवा बिहार की उम्मीद” बता रहे हैं, वहीं एनडीए ने इस घोषणा पर तीखा हमला बोला है।
राजद बोली — “बिहार में तेजस्वी ही तेजस्वी है”महागठबंधन की प्रेस कॉन्फ्रेंस में राजद प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने जोरदार अंदाज़ में कहा —बिहार में तेजस्वी ही तेजस्वी है।
जनता ने उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में पहले ही स्वीकार कर लिया है।
243 सीटों पर जनता तेजस्वी यादव के वादों, इरादों और संकल्पों पर वोट देगी। अब सिर्फ औपचारिकताएं बाकी हैं।राजद नेताओं का दावा है कि बिहार की जनता इस बार जाति नहीं, काम और उम्मीद के नाम पर वोट करेगी, और तेजस्वी यादव ही इस नई राजनीति का चेहरा होंगे।
जेडीयू का पलटवार — “महागठबंधन का कुछ नहीं हो सकता”वहीं, जदयू नेता राजीव रंजन प्रसाद ने महागठबंधन की घोषणा पर कटाक्ष करते हुए कहा —महागठबंधन की हालत सुधारने से रही। चाहे वे जितनी भी कोशिश कर लें, एनडीए का विजय रथ बहुत आगे बढ़ चुका है।
तेजस्वी यादव सीएम फेस बनें या कोई और, नतीजा वही रहेगा — हार।राजीव रंजन ने कहा कि बिहार की जनता “विकास बनाम परिवारवाद” के फर्क को समझ चुकी है।
भाजपा का वार — “जो सीटें नहीं बांट सके, वो सरकार कैसे चलाएंगे?”प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने महागठबंधन पर करारा प्रहार करते हुए कहा —बिहार की जनता सब देख रही है। महागठबंधन एकजुट नहीं है। जो दल आपस में सीटों का बंटवारा तय नहीं कर सके, वे राज्य की सरकार कैसे चलाएंगे?
उन्होंने यह भी जोड़ा कि तेजस्वी यादव और कांग्रेस के बीच मतभेद किसी से छिपे नहीं हैं —जब तेजस्वी दिल्ली में राहुल गांधी से मिले थे, तब जो ठंडा व्यवहार हुआ, वही दोनों पार्टियों की हकीकत दिखाता है। कांग्रेस नहीं चाहती कि राजद उससे आगे निकले।”
कांग्रेस का रुख — “थोड़ा इंतजार कीजिए, देखिए क्या होता है”कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा —थोड़ा इंतज़ार कीजिए, सब कुछ प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ़ हो जाएगा। जो भी होगा, बिहार की जनता के हित में होगा।”
हालांकि, बघेल ने मौके का फायदा उठाते हुए भारत निर्वाचन आयोग पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा —चुनाव आयोग अपनी विश्वसनीयता खो चुका है। उसे सभी राजनीतिक दलों के साथ बैठकर पारदर्शी प्रक्रिया पर चर्चा करनी चाहिए थी। आज वह केंद्र सरकार का विभाग बनकर रह गया है।”
बिहार में सियासी जंग अपने चरम पर तेजस्वी यादव के नाम की घोषणा के साथ ही बिहार का चुनावी मौसम पूरी तरह गर्मा गया है।
एक तरफ महागठबंधन “परिवर्तन” का नारा दे रहा है, तो दूसरी ओर एनडीए “विकास और स्थिरता” की बात कर रहा है।इसी बीच, तीसरे मोर्चे की भूमिका निभा रहे प्रशांत किशोर (PK) ने भी दोनों गठबंधनों की नींद उड़ाई हुई है। जनसुराज यात्रा के जरिए PK लगातार जनता के बीच जा रहे हैं और पारंपरिक राजनीति को “बनावटी” बताते हुए नया विकल्प पेश कर रहे हैं।
14 नवंबर को होगा फैसला — किसके हाथ आएगी सत्ता की चाबी?अब सारी निगाहें 14 नवंबर पर टिकी हैं, जब बिहार के मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे।एक ओर तेजस्वी यादव की “नौजवान नीति और नौकरी” का वादा है, तो दूसरी ओर एनडीए की “विकास यात्रा” और “नीतीश मॉडल” की विरासत।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि “राजनीतिक दिशा परिवर्तन” का चुनाव है।
विश्लेषण — “युवा बनाम अनुभव की जंग”इस बार बिहार की राजनीति दो ध्रुवों में बंटती दिख रही है —तेजस्वी यादव, जो युवा ऊर्जा, रोजगार और बदलाव की बात कर रहे हैं।
नीतीश कुमार और एनडीए, जो स्थिरता, अनुभव और प्रशासनिक भरोसे की दुहाई दे रहे हैं।
राजनीतिक पंडितों का कहना है कि “बिहार में इस बार मुकाबला सिर्फ दो गठबंधनों के बीच नहीं, बल्कि दो पीढ़ियों की सोच के बीच है।”
निष्कर्ष
बिहार की राजनीति में इस वक्त एक ही नाम गूंज रहा है — तेजस्वी यादव।लेकिन सवाल यह है कि क्या यह गूंज वोटों में बदलेगी, या फिर एनडीए एक बार फिर अपने ‘डबल इंजन’ के दम पर सत्ता की चाबी संभाल लेगा?फैसला अब जनता के दरबार में है।
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