बी.के. झा
NSK News

पटना, 21 जुलाई
बिहार विधानसभा के मानसून सत्र के पहले ही दिन सरकार ने कई ऐसे महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक सदन में प्रस्तुत किए, जिनका सीधा असर आम नागरिकों, किसानों, चिकित्सकों, शिक्षण संस्थानों और प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ने वाला है। जमीन के दाखिल-खारिज पर पहली बार शुल्क लगाने, दूसरे राज्यों के पंजीकृत डॉक्टरों और नर्सों को बिहार में स्व-प्रमाणन के आधार पर प्रैक्टिस की अनुमति देने तथा निजी विश्वविद्यालयों को अस्थायी संचालन की मंजूरी जैसे प्रस्तावों ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में व्यापक बहस छेड़ दी है।
दाखिल-खारिज पर पहली बार लगेगा 200 रुपये शुल्क
सरकार द्वारा सदन में प्रस्तुत ‘बिहार भूमि दाखिल-खारिज (संशोधन) विधेयक, 2026’ के अनुसार अब भूमि अथवा भू-खंड के दाखिल-खारिज के लिए प्रत्येक आवेदन, अपील अथवा पुनरीक्षण याचिका पर 200 रुपये शुल्क देना होगा।अब तक दाखिल-खारिज की प्रक्रिया में रैयतों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। हालांकि अधिनियम में न्यायालय शुल्क स्टांप का प्रावधान था, लेकिन व्यवहारिक रूप से यह व्यवस्था लागू नहीं थी। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग का तर्क है कि बिहार एक लोककल्याणकारी राज्य है और विकास योजनाओं तथा प्रशासनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए राजस्व बढ़ाना समय की आवश्यकता है।
हालांकि विपक्ष का कहना है कि सरकार जनता पर एक और आर्थिक बोझ डाल रही है। विपक्षी दलों का आरोप है कि पहले से ही दाखिल-खारिज की प्रक्रिया में देरी, बिचौलियों की भूमिका और भ्रष्टाचार की शिकायतें आम हैं। ऐसे में शुल्क लगाने से आम किसानों और गरीब परिवारों की परेशानियां बढ़ सकती हैं।
दूसरे राज्यों के डॉक्टरों को मिलेगी बड़ी राहत
सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण संशोधन प्रस्तावित किया है। प्रस्तावित बिहार चिकित्सा (संशोधन) विधेयक, 2026 तथा बिहार नर्सेज पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 के अनुसार अब दूसरे राज्यों में पंजीकृत डॉक्टर, नर्स, स्वास्थ्य आगंतुक और प्रशिक्षित दाइयां स्व-प्रमाणन प्रमाणपत्र के आधार पर बिहार में चिकित्सा सेवा दे सकेंगी।अब तक उन्हें पूर्व राज्य से अनापत्ति प्रमाण-पत्र (एनओसी) लेकर बिहार में पुनः पंजीकरण कराना पड़ता था।स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि इससे डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ेगी और ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सकीय सेवाओं की कमी दूर करने में मदद मिलेगी।
निजी विश्वविद्यालयों को मिलेगी प्रोविजनल मंजूरी
सरकार ने शिक्षा क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव प्रस्तावित किया है। बिहार निजी विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक, 2026 के तहत अब निजी विश्वविद्यालयों को एक शैक्षणिक सत्र के लिए अस्थायी (प्रोविजनल) संचालन की अनुमति दी जा सकेगी।यदि प्रायोजक संस्था भवन, आधारभूत संरचना और अन्य आवश्यक सुविधाएं विकसित करने का आश्वासन देती है तो सरकार उसे एक सत्र तक संचालन की अनुमति दे सकती है। यदि निर्धारित अवधि में सभी शर्तें पूरी नहीं होतीं तो अनुमति स्वतः समाप्त हो जाएगी।सरकार का दावा है कि इससे उच्च शिक्षा में निवेश बढ़ेगा और विद्यार्थियों को नए अवसर मिलेंगे।
विधानसभा और विधान परिषद में अध्याशी सदस्य मनोनीत
विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने मानसून सत्र के लिए राम नारायण मंडल, श्याम रजक, आलोक मेहता और ज्योति देवी को अध्याशी सदस्य मनोनीत किया है। वहीं विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह ने डॉ. संजीव कुमार सिंह, प्रो. नवल किशोर यादव, मदन मोहन झा तथा महेश्वर सिंह को अध्याशी सदस्य नामित किया।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव से पहले सरकार प्रशासनिक सुधारों और व्यवस्था में बदलाव का संदेश देना चाहती है। दाखिल-खारिज शुल्क के माध्यम से राजस्व बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि डॉक्टरों को प्रैक्टिस की छूट देकर स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार का संदेश देने की कोशिश है।विश्लेषकों के अनुसार विपक्ष इन प्रस्तावों को जनता पर अतिरिक्त बोझ और चुनावी प्रबंधन के नजरिए से देख रहा है। आने वाले दिनों में इन विधेयकों पर सदन के भीतर तीखी बहस होने की संभावना है।
कानूनविदों की प्रतिक्रिया
संवैधानिक मामलों के जानकारों का कहना है कि राज्य सरकार को शुल्क निर्धारित करने का अधिकार है, लेकिन यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यह शुल्क नागरिकों के अधिकारों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न बने। उन्होंने कहा कि निजी विश्वविद्यालयों को अस्थायी अनुमति देने की व्यवस्था तभी सफल होगी, जब गुणवत्ता और यूजीसी मानकों का सख्ती से पालन कराया जाए।
शिक्षाविदों की राय
शिक्षाविदों का कहना है कि यदि निजी विश्वविद्यालयों को पर्याप्त आधारभूत संरचना विकसित किए बिना संचालन की अनुमति दी जाती है तो शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। हालांकि यदि सरकार प्रभावी निगरानी रखे तो इससे उच्च शिक्षा में निवेश और नए संस्थानों की स्थापना को बढ़ावा मिल सकता है।
समाजसेवी संगठनों की प्रतिक्रिया
कई सामाजिक संगठनों ने दाखिल-खारिज शुल्क को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि किसानों, भूमिहीनों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए रियायत या शुल्क माफी का प्रावधान होना चाहिए। उनका कहना है कि राजस्व बढ़ाने के साथ-साथ गरीब नागरिकों के हितों का भी ध्यान रखना आवश्यक है।
विपक्ष का हमला
विपक्षी दलों ने सरकार पर आरोप लगाया कि जनता पहले से महंगाई, बेरोजगारी और प्रशासनिक जटिलताओं से जूझ रही है। ऐसे समय में दाखिल-खारिज पर शुल्क लगाना जनविरोधी निर्णय है। विपक्ष ने यह भी कहा कि सरकार पहले भूमि संबंधी विवादों के त्वरित निस्तारण, भ्रष्टाचार पर अंकुश और ऑनलाइन व्यवस्था को पूरी तरह पारदर्शी बनाए, उसके बाद नए शुल्क लागू करे।
सरकार का पक्ष
सरकार का कहना है कि सभी संशोधन जनता की सुविधा, प्रशासनिक पारदर्शिता, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और उच्च शिक्षा के विस्तार को ध्यान में रखकर लाए गए हैं। सरकार का दावा है कि इन सुधारों से राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था अधिक प्रभावी होगी और विकास कार्यों को नई गति मिलेगी।
संपादकीय दृष्टि
मानसून सत्र में प्रस्तुत ये विधेयक केवल कानूनी संशोधन नहीं, बल्कि बिहार की राजस्व व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और उच्च शिक्षा की दिशा तय करने वाले महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं। अब निगाहें विधानसभा की बहस और इन विधेयकों के अंतिम स्वरूप पर टिकी हैं।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार विपक्ष की आपत्तियों का किस प्रकार जवाब देती है और क्या इन प्रस्तावों में जनता की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए कोई संशोधन किया जाता है।
