बी के झा
बेगूसराय/पटना, 23 दिसंबर
बिहार के बेगूसराय जिले के मंसूरचक बाजार में मंगलवार सुबह एक दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे इलाके को स्तब्ध कर दिया। असम पुलिस में कार्यरत 57 वर्षीय जवान जंगली मल्लिक की कथित तौर पर संपत्ति विवाद में पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। इस सनसनीखेज वारदात में मृतक की पहली पत्नी सुमित्रा देवी और बेटे संजय मल्लिक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है, जबकि बेटी को हिरासत में रखा गया है।
जिस बेटे को पिता ने जन्म दिया, वही बेटे पर हत्या का आरोप—यह घटना केवल एक पारिवारिक विवाद नहीं, बल्कि बिहार में बढ़ती हिंसा और कमजोर कानून-व्यवस्था का प्रतीक बनती जा रही है।छुट्टी पर आए थे जवान, मौत बनकर सामने आया घर मृतक जंगली मल्लिक असम पुलिस में कार्यरत थे और छुट्टी लेकर अपने पैतृक गांव आए हुए थे। जानकारी के अनुसार, उन्होंने दो शादियां की थीं।दूसरी पत्नी के साथ वे असम में रहते थे पहली पत्नी और उसके दो बेटे पिछले दस वर्षों से समस्तीपुर जिले में अलग रह रहे थे दूसरी शादी के बाद से ही संपत्ति और घर में रहने को लेकर विवाद चल रहा था।
स्थानीय लोगों के मुताबिक,“शनिवार की शाम संजय मल्लिक अपने कुछ सहयोगियों के साथ आया था और पिता से तीखी बहस हुई थी। धमकी भी दी गई थी।”मंगलवार सुबह जब बाजार में हत्या की खबर फैली, तो पूरे मंसूरचक में अफरा-तफरी मच गई।
पुलिस कार्रवाई:
गिरफ्तारी, लेकिन सवाल कायममं
सूरचक थानाध्यक्ष गोविंद कुमार पाण्डेय ने बताया कि मामले को गंभीरता से लेते हुए छापेमारी की गई और पत्नी सुमित्रा देवी (37 वर्ष)पुत्र संजय मल्लिकको गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस का कहना है कि“मामले की हर एंगल से जांच की जा रही है।”हालांकि, स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या पहले दी गई धमकियों को गंभीरता से लिया गया होता, तो क्या यह हत्या टाली जा सकती थी?
समाजशास्त्रीय दृष्टि:
टूटते परिवार, बढ़ती हिंसा
शिक्षाविद और समाजशास्त्री इस घटना को पारिवारिक विघटन और आर्थिक तनाव से जोड़कर देख रहे हैं।
एक वरिष्ठ शिक्षाविद के अनुसार—“जब संपत्ति विवाद न्यायिक प्रक्रिया के बजाय हिंसा की ओर मुड़ जाए, तो समाज के लिए यह बेहद खतरनाक संकेत होता है।”उनका मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में पारिवारिक विवाद पुलिस तक पहुंच की कमी और स्थानीय दबंगई हिंसा को जन्म देती है।
कानूनी नजरिया:
‘निवारक कार्रवाई की कमी’
सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद कुमार सिंह का कहना है कि यह मामला निवारक पुलिसिंग की विफलता को भी उजागर करता है।
वहीं आपराधिक कानून विशेषज्ञ कहते हैं—“जब किसी व्यक्ति को जान से मारने की धमकी दी जाती है और पुलिस सतर्क नहीं होती, तो बाद में हुई घटना केवल अपराध नहीं, सिस्टम की चूक भी होती है।”उन्होंने कहा कि इस केस में“फैमिली डिस्प्यूट से जुड़े मामलों में त्वरित कानूनी हस्तक्षेप जरूरी है।
”राजनीतिक आरोप–प्रत्यारोप: सुशासन बनाम सच्चाई इस घटना के बाद बिहार की राजनीति भी गरमा गई है।
विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर सीधा हमला बोला है।
एक विपक्षी नेता ने कहा—“नीतीश कुमार अब सिर्फ नाम के ‘सुशासन बाबू’ रह गए हैं। ज़मीनी हकीकत यह है कि बिहार में गुंडागर्दी, लूट और हत्या बढ़ रही है।”उन्होंने आरोप लगाया कि“आज कानून-व्यवस्था मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि सत्ता के दूसरे केंद्रों के इशारों पर चल रही है।”वहीं सत्तारूढ़ दल के नेताओं का कहना है कि“घटना दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की है। इसे राजनीतिक रंग देना गलत है।”
स्थानीय समाजसेवियों की पीड़ा: ‘
डर के साये में लोग’स्थानीय समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों का कहना है कि ऐसी घटनाओं से आम लोग भयभीत हैं।
एक समाजसेवी ने कहा—“जब एक पुलिस जवान अपने घर में सुरक्षित नहीं है, तो आम आदमी की सुरक्षा की क्या गारंटी?”
उनका कहना है कि प्रशासन को घरेलू विवादों में मध्यस्थताऔर समय रहते हस्तक्षेप पर ज़ोर देना चाहिए।
निष्कर्ष
: हत्या से बड़ा सवाल—बिहार कहां जा रहा है?
बेगूसराय की यह घटना केवल एक पिता की हत्या या एक बेटे का अपराध भर नहीं है। यह बिहार की कानून-व्यवस्था, सामाजिक ताने-बाने और प्रशासनिक सजगता पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।आज सवाल यह नहीं है कि कौन दोषी है,सवाल यह है कि
क्या ऐसी घटनाएं रोकी जा सकती थीं?
और अगर हां, तो क्यों नहीं रोकी गईं?जब तक इन सवालों के ईमानदार जवाब नहीं मिलेंगे,तब तक हर अगली घटना सिर्फ एक और खबर बनकर रह जाएगी।
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