बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 28 नवंबर
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अगले महीने 4 और 5 दिसंबर को भारत की दो दिवसीय राजकीय यात्रा पर आ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विशेष आमंत्रण पर हो रही यह मुलाकात ऐसे समय में हो रही है जब विश्व की राजनीति यूक्रेन युद्ध, तेल आपूर्ति, पश्चिम–रूस तनाव और एशिया की नई सामरिक चुनौतियों के बीच तेजी से बदल रही है।क्रेमलिन और भारत के विदेश मंत्रालय, दोनों ने इस यात्रा की तारीखों की आधिकारिक पुष्टि कर दी है।क्रेमलिन के विदेश नीति सलाहकार यूरी उशाकोव ने साफ कहा—“
यह यात्रा हर दृष्टि से भव्य और सार्थक होगी। दोनों नेता द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर गहन चर्चा करेंगे।”क्यों अहम है यह यात्रा?फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस–भारत संबंधों ने नया आयाम लिया।भारत ने प्रतिबंधों की परवाह किए बिना रूस से रियायती दरों पर तेल खरीद जारी रखा, जबकि पश्चिमी देशों ने इसे “मॉस्को को आर्थिक ऑक्सीजन” देने के रूप में देखा।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत से आयातित सामान पर 50% शुल्क बढ़ाना इसी तनाव का प्रत्यक्ष संकेत माना जा रहा है।
कूटनीतिक हलकों में पुतिन की यह यात्रा कई मायनों से “रणनीतिक रीसेट” की तरह देखी जा रही है—
भारत–रूस ऊर्जा सहयोग रक्षा खरीदआर्कटिक और फार ईस्ट में निवेश वैश्विक दक्षिण की नई राजनीतिक धुरी एशिया में चीन की बढ़ती सक्रियता इन सभी विषयों पर निर्णायक बातचीत की उम्मीद है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय:
“यह यात्रा भारत की विदेश नीति की स्वायत्तता का संकेत
”दिल्ली–स्थित विदेश नीति विश्लेषक डॉ. अनुज देवगन कहते हैं—“भारत ने बीते वर्षों में स्पष्ट कर दिया है कि उसकी विदेश नीति ‘गुटनिरपेक्ष 2.0’ की दिशा में आगे बढ़ रही है। पुतिन की यह यात्रा दिखाती है कि भारत पश्चिम और रूस—दोनों के साथ अपनी संतुलित कूटनीति को बनाए रखना चाहता है।”
वरिष्ठ सामरिक विशेषज्ञ आर.के. त्रिपाठी का कहना है—“रूस अभी भी भारत का सबसे बड़ा रक्षा साझेदार है। ऐसे में यह दौरा न केवल सैन्य सहयोग बल्कि तकनीक के नए आयामों को खोल सकता है। ट्रंप प्रशासन के साथ तनावपूर्ण माहौल में यह यात्रा भारत की भू-राजनीतिक हैसियत को और मजबूत करती है।
भारतीय राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं
BJP भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा—“प्रधानमंत्री मोदी का वैश्विक नेतृत्व एक बार फिर प्रमाणित हुआ है। पुतिन की यात्रा भारत की रणनीतिक शक्ति का प्रतीक है।”
कांग्रेस
कांग्रेस प्रवक्ता ने सावधानी भरा बयान दिया—“हम रूस के साथ मजबूत संबंध चाहते हैं, लेकिन सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि पश्चिमी देशों के साथ बिगड़े संबंधों का भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा।”JDU और बिहार की राजनीति जेडीयू नेता ने टिप्पणी की—“यह भारत के लिए गौरव की बात है। परन्तु सरकार को तेल कीमतों, डॉलर की मजबूती और वैश्विक मंदी से निपटने पर भी पुतिन से ठोस बातचीत करनी चाहिए।
”वाम दल (Left Parties)लेफ्ट ने स्वागत किया—“रूस भारत का प्राकृतिक मित्र है। अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियों से अलग होकर भारत को रूस के साथ अपने संबंध और मजबूत करने चाहिए।”भारत–रूस एजेंडा: किन मुद्दों पर मोहर लगेगी?1. लंबी अवधि का तेल–ऊर्जा समझौता2. S-400 और अन्य रक्षा तकनीकों पर प्रगति3. व्लादिवोस्तोक–चेन्नई समुद्री गलियारे पर चर्चा4. रुपये–रूबल व्यापार तंत्र को मजबूत करना5. अंतरिक्ष, क्वांटम टेक्नोलॉजी और न्यूक्लियर एनर्जी सहयोग6. यूक्रेन युद्ध पर भारत की “शांतिपूर्ण समाधान” की पहल
भारत की कूटनीतिक परिभाषा बदलनेबी के झा की मॉस्को यात्रा को भी इसी दौरे की “भूमि तैयार करने वाली यात्रा” माना जा रहा है।इस दौरे से पहले रूस ने सार्वजनिक रूप से कहा—“हम भारत को एक विश्वसनीय, स्थिर और मित्र राष्ट्र मानते हैं。”
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार,“यह यात्रा भारत–रूस संबंधों को 21वीं सदी के नए वैश्विक ढांचे में परिभाषित कर सकती है।”
निष्कर्ष:
दिसंबर में ‘मोदी–पुतिन शिखर वार्ता’ वैश्विक ध्यान का केंद्रपुतिन की यह यात्रा केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि उस नई वैश्विक राजनीति की आहट है जिसमें भारत अब निर्णायक भूमिका निभा रहा है।चीन का उदय, अमेरिका की आर्थिक नीति, और रूस का पूर्व–पश्चिम तनाव—इन सबके बीच भारत वह धुरी बन चुका है जिसके बिना एशिया और विश्व की किसी भी रणनीति की कल्पना अधूरी है।दिसंबर की यह मुलाक़ात न केवल भारत–रूस रिश्तों को नई दिशा देगी, बल्कि विश्व राजनीति में भारत की स्थिति को और दृढ़ करेगी।
