बी के झा
NSK


नई दिल्ली/मॉस्को, 20 अप्रैल
बदलती वैश्विक भू-राजनीति, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और समुद्री आपूर्ति मार्गों पर संकट के बीच भारत और Russia के बीच एक नया रक्षा समझौता लागू होने की खबर ने अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। इस व्यवस्था के तहत दोनों देश एक-दूसरे की धरती, बंदरगाहों और एयरबेस का उपयोग कर सकेंगे तथा सीमित संख्या में सैनिक, युद्धपोत और सैन्य विमान तैनात कर पाएंगे।रिपोर्टों के अनुसार, समझौते के तहत एक समय में अधिकतम 3000 सैनिक, 5 युद्धपोत और 10 सैन्य विमान तैनात किए जा सकेंगे। इसे भारत-रूस रक्षा संबंधों में नए चरण के रूप में देखा जा रहा है।
क्या है इस समझौते का रणनीतिक अर्थ?
यह केवल सैन्य आवागमन की सुविधा नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक इंटरऑपरेबिलिटी का ढांचा है। इसका मतलब है कि दोनों देशों की सेनाएं आवश्यकता पड़ने पर एक-दूसरे के संसाधनों का उपयोग कर सकेंगी।इससे संभावित लाभ:लंबी दूरी के सैन्य अभियानों में सहूलियतयुद्धपोतों को ईंधन, मरम्मत और पुनःपूर्ति सुविधासैन्य विमानों को तकनीकी और नेविगेशन सहायता
संयुक्त अभ्यासों की क्षमता में वृद्धि मानवीय राहत और आपदा मिशनों में तेजी
भारत को आर्कटिक तक पहुंच?
विशेषज्ञों के अनुसार इस समझौते का एक बड़ा आयाम यह है कि भारत को रूस के दूरस्थ ठिकानों, यहां तक कि आर्कटिक क्षेत्र के कुछ सैन्य-सुविधा नेटवर्क तक पहुंच का अवसर मिल सकता है।Arctic भविष्य का ऊर्जा, समुद्री मार्ग और संसाधन क्षेत्र माना जा रहा है। ऐसे में भारत की उपस्थिति वहां केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक महत्व रखती है।रूस को भारत में क्या मिलेगा?
रूस को भारतीय बंदरगाहों और चयनित सैन्य अवसंरचना तक पहुंच मिलने की संभावना है, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी परिचालन क्षमता बेहतर हो सकती है।यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि हिंद महासागर अब विश्व व्यापार, ऊर्जा परिवहन और सामरिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन चुका है।भारतीय सेना का समानांतर ऊर्जा प्लानइसी बीच पश्चिम एशिया तनाव और तेल-गैस आपूर्ति संकट की आशंकाओं के बीच भारतीय सेना वैकल्पिक ऊर्जा रणनीति पर भी काम कर रही है।सूत्रों के अनुसार:ईंधन खपत कम करने की योजना सीमित दूरी में वाहन मूवमेंटवाहन पूलिंग व्यवस्था इलेक्ट्रिक और CNG वाहनों का बढ़ा उपयोग बायोगैस स्टोव की खरीद बड़े पैमाने पर सोलर प्लांट और पवन ऊर्जा परियोजनाएं यह संकेत देता है कि भारत अब रक्षा तैयारी को केवल हथियारों से नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा से भी जोड़कर देख रहा है।
होर्मुज संकट और भारत की चिंता
Strait of Hormuz में बढ़ते तनाव ने भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों की चिंता बढ़ाई है। इसी परिप्रेक्ष्य में भारतीय ध्वज वाले तेल टैंकर के सुरक्षित मार्ग पार करने की खबर महत्वपूर्ण मानी जा रही है।भारत की अर्थव्यवस्था ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता पर निर्भर है, इसलिए समुद्री मार्गों की सुरक्षा अब राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह समझौता भारत की बहुध्रुवीय विदेश नीति का उदाहरण है।उनके अनुसार:भारत अमेरिका, यूरोप, रूस और पश्चिम एशिया—सभी के साथ संतुलित संबंध रखना चाहता है।रक्षा खरीद और लॉजिस्टिक सहयोग में विविधता भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करती है।घरेलू राजनीति में इसे मजबूत नेतृत्व और वैश्विक सक्रियता के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा।कुछ विश्लेषकों ने यह भी कहा कि भारत अब “किसी एक खेमे” की नीति से आगे बढ़ चुका है।
शिक्षाविदों का दृष्टिकोण
अंतरराष्ट्रीय संबंध और रणनीतिक अध्ययन से जुड़े शिक्षाविदों ने कहा कि यह समझौता भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा सोच को दर्शाता है।वे मानते हैं कि आने वाले दशक में तीन क्षेत्र निर्णायक होंगे:समुद्री सुरक्षाऊर्जा सुरक्षाप्रौद्योगिकी आधारित युद्ध क्षमताउनके अनुसार भारत यदि सैन्य अवसंरचना, अनुसंधान और घरेलू रक्षा उत्पादन को साथ लेकर चले, तो ऐसी संधियां और प्रभावी होंगी।
अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विश्लेषकों की प्रतिक्रिया
वैश्विक विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता कई देशों द्वारा ध्यान से देखा जाएगा।
पश्चिमी देश इसे भारत-रूस संबंधों की निरंतरता के रूप में देखेंगे।
एशियाई शक्तियां इसे हिंद महासागर संतुलन से जोड़कर देखेंगी।
ऊर्जा बाजार इसे क्षेत्रीय तनाव के संदर्भ में समझेगा।
कुछ विशेषज्ञों के अनुसार भारत का संदेश स्पष्ट है—वह वैश्विक शक्ति समीकरण में स्वतंत्र खिलाड़ी बना रहेगा।
कानूनविदों की राय
कानून विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसे समझौते केवल राजनीतिक घोषणाएं नहीं होते, इनमें संप्रभुता, अधिकार-क्षेत्र और सैन्य कर्मियों की कानूनी स्थिति जैसे गंभीर प्रश्न शामिल होते हैं।मुख्य बिंदु:
विदेशी सैनिकों की कानूनी स्थिति आपराधिक मामलों में अधिकार क्षेत्र बंदरगाह और एयरबेस उपयोग की शर्तें सुरक्षा गोपनीयताअंतरराष्ट्रीय दायित्व उनका कहना है कि स्पष्ट प्रोटोकॉल और पारदर्शी नियम आवश्यक होंगे।
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया
विपक्षी दलों की ओर से मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
समर्थन
कुछ नेताओं ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर सरकार के हर सकारात्मक कदम का स्वागत होना चाहिए।
सवाल
कुछ दलों ने संसद में विस्तृत जानकारी, शर्तों की पारदर्शिता और रणनीतिक लागत-लाभ विश्लेषण की मांग की।ऊर्जा नीति पर बहस विपक्ष ने यह भी कहा कि यदि सेना को ईंधन बचत मिशन चलाना पड़ रहा है, तो सरकार को व्यापक ऊर्जा आत्मनिर्भरता पर और तेज कदम उठाने चाहिए।
विदेश मंत्रालय और भारत सरकार का संभावित रुख
सरकारी दृष्टिकोण के अनुसार भारत की विदेश नीति का आधार रणनीतिक स्वायत्तता, राष्ट्रीय हित और बहुपक्षीय सहयोग है।नीतिगत संकेत यह हैं:भारत सभी प्रमुख शक्तियों से संबंध मजबूत रखेगा
रक्षा साझेदारी राष्ट्रीय सुरक्षा जरूरतों के अनुसार होगी ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है संकट काल में भारत अपनी आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षित रखने पर केंद्रित रहेगा
बड़ा संदेश क्या है?
यह घटनाक्रम बताता है कि आधुनिक युद्ध केवल सीमा पर नहीं लड़े जाते। आज संघर्ष के मोर्चे हैं:
समुद्री मा
र्गऊर्जा आपूर्ति
सैन्य लॉजिस्टिक्स वैश्विक साझेदारियां
तकनीकी श्रेष्ठता भारत इन सभी मोर्चों पर तैयारी का संकेत दे रहा है।
निष्कर्ष
भारत-रूस रक्षा समझौता, सेना की ऊर्जा बचत रणनीति और होर्मुज संकट के बीच सुरक्षित टैंकर आवाजाही—ये तीनों घटनाएं मिलकर एक बड़ा चित्र प्रस्तुत करती हैं: भारत केवल प्रतिक्रिया नहीं दे रहा, बल्कि बदलती दुनिया के लिए खुद को पुनर्संगठित कर रहा है।यह नई नीति का संकेत है—
जहां कूटनीति, रक्षा और ऊर्जा सुरक्षा एक ही राष्ट्रीय रणनीति के तीन स्तंभ बन चुके हैं।
