बी के झा
NSK

पटना, 18 दिसंबर
बिहार की राजनीति एक बार फिर जातीय पहचान के संवेदनशील प्रश्न पर आ खड़ी हुई है। सवर्ण वर्ग में शामिल भूमिहार समाज द्वारा अपने नाम के साथ ‘ब्राह्मण’ शब्द जोड़े जाने की मांग ने न सिर्फ़ राज्य सवर्ण आयोग को असमंजस में डाला है, बल्कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार के सामने भी एक नाज़ुक सामाजिक–राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। सवाल केवल नाम का नहीं, बल्कि इतिहास, प्रशासनिक अभिलेख, सामाजिक सम्मान और सियासी संतुलन का है।मुद्दा क्या है?
भूमिहार संगठनों की मांग है कि सरकारी दस्तावेजों में उनकी जाति को ‘भूमिहार’ के बजाय ‘भूमिहार–ब्राह्मण’ लिखा जाए। उनका तर्क है कि 1931 की जनगणना, पुराने खातियान और भूमि राजस्व अभिलेखों में यही नाम दर्ज रहा है। 2023 की जाति आधारित गणना में केवल ‘भूमिहार’ लिखे जाने से भ्रम पैदा हुआ है, जिसका असर ज़मीन के स्वामित्व और प्रशासनिक रिकॉर्ड पर पड़ सकता है।इसी प्रश्न पर सामान्य प्रशासन विभाग ने अक्टूबर 2025 में राज्य सवर्ण आयोग से मार्गदर्शन मांगा। बीते एक महीने में आयोग की तीन बैठकें हुईं, लेकिन सहमति नहीं बन सकी। कुछ सदस्य इसे ऐतिहासिक सच्चाई मानते हैं, तो कुछ इसे अनावश्यक विवाद बताकर असहमति जता रहे हैं।सवर्ण आयोग की आयोग के अध्यक्ष महाचंद्र प्रसाद सिंह का कहना है कि1931 का सरकारी रिकॉर्ड हमारे लिए महत्वपूर्ण आधार है। हर समाज में ऐसे प्रश्न उठते हैं, इसे विवाद नहीं कहा जा सकता।”वहीं आयोग के कुछ सदस्यों का मत है कि किसी समुदाय को खुद को किस नाम से परिभाषित करना है, यह उसका सामाजिक अधिकार है, लेकिन ऐसे मामलों में प्रशासनिक स्तर पर जल्दबाज़ी से सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है। इसी असहमति के चलते आयोग ने अंतिम निर्णय सरकार पर छोड़ दिया है।
भूमिहार–ब्राह्मण समाज की आवाज़
राष्ट्रीय भूमिहार ब्राह्मण परिषद का आरोप है कि जातियों की सूची में ‘भूमिहार ब्राह्मण’ नाम हटने से भू–अभिलेखों में कथित फर्जीवाड़े के रास्ते खुले हैं। परिषद के सचिव केशव कुमार का कहना है,यह केवल सम्मान का नहीं, बल्कि संपत्ति अधिकार और कानूनी सुरक्षा का सवाल है। नाम में बदलाव से ज़मीनों के मालिकाना हक पर असर पड़ सकता है।”ब्राह्मण समाज के संगठनों ने अपेक्षाकृत संतुलित रुख अपनाया है। ऑल बिहार ब्राह्मण फेडरेशन के अध्यक्ष व रिटायर्ड आईपीएस एस.के. झा कहते हैं,परंपरागत रूप से भूमिहारों को भूमिहार–ब्राह्मण कहा जाता रहा है। इससे ब्राह्मण समाज की सांस्कृतिक पहचान पर कोई आंच नहीं आती।”
दरभंगा के शिक्षाविद डॉ. उद्भत्त मिश्रा भी मानते हैं कि यह नामकरण सांस्कृतिक एकता को तोड़ने वाला नहीं है। हमारी संस्कृति सदियों से मज़बूत रही है।”
कानूनी नजरिया
कानून विशेषज्ञों के अनुसार, यदि ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और पूर्ववर्ती राजस्व रिकॉर्ड में ‘भूमिहार–ब्राह्मण’ दर्ज है, तो सरकार के लिए उसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं होगा।
वरिष्ठ अधिवक्ता रवि शंकर पांडेय के मुताबिक,जाति नाम में प्रशासनिक बदलाव का असर भूमि, आरक्षण से इतर सामाजिक पहचान और सरकारी सेवाओं के रिकॉर्ड पर पड़ता है। इसलिए सरकार को ठोस कानूनी आधार पर फैसला लेना होगा।”राजनीतिक मायने और विपक्ष की प्रतिक्रिया राजनीतिक
विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद ऐसे समय उठा है, जब बिहार में जातीय समीकरण पहले से ही बेहद संवेदनशील हैं।
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. (डॉ.) संजय कुमार कहते हैं,नीतीश सरकार के लिए यह ‘नो–विन सिचुएशन’ है। एक पक्ष को संतुष्ट करने पर दूसरा नाराज़ हो सकता है।
विपक्षी दलों ने सरकार पर जातीय मुद्दों को लटकाने का आरोप लगाया है।
राजद नेताओं का कहना है कि सरकार सामाजिक न्याय और विकास के मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे विवादों को हवा दे रही है, जबकि कांग्रेस का मत है कि सरकार को स्पष्ट नीति बनाकर भ्रम खत्म करना चाहिए।अब गेंद नीतीश सरकार के पाले में
भूमिहार–ब्राह्मण विवाद अब केवल आयोग की फाइलों तक सीमित नहीं रहा। यह सामाजिक पहचान, कानूनी अधिकार और राजनीतिक संतुलन का प्रश्न बन चुका है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने चुनौती यह है कि वे इतिहास और कानून के बीच संतुलन बनाते हुए ऐसा निर्णय लें, जो न तो सामाजिक तनाव बढ़ाए और न ही प्रशासनिक उलझनें पैदा करे।
फिलहाल, बिहार की राजनीति यह देख रही है कि सरकार इतिहास की किताबों और वर्तमान की सियासत के बीच कौन-सा रास्ता चुनती है—और क्या यह फैसला किसी नए जातीय विमर्श की शुरुआत करेगा या एक पुराने प्रश्न का शांत समाधान बनेगा।
