बी के झा
मुंबई (नागपुर), नई दिल्ली, 14 दिसंबर
महाराष्ट्र की सियासत में एक बार फिर वैचारिक रेखाएं साफ़ दिखाई देने लगी हैं। महायुति सरकार में शामिल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार गुट) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच बनी दूरी ने गठबंधन की अंदरूनी संरचना पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रविवार को नागपुर में आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के स्मारक पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की मौजूदगी ने जहां भाजपा–शिवसेना के वैचारिक जुड़ाव को रेखांकित किया, वहीं इस कार्यक्रम से एनसीपी नेताओं की अनुपस्थिति ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी।यह अनुपस्थिति केवल एक कार्यक्रम से दूरी नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे अजित पवार की ‘वैचारिक स्वायत्तता’ के सियासी संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
एनसीपी का पक्ष: सत्ता नहीं, सिद्धांत पहले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ताओं ने इस दूरी को स्पष्ट रूप से वैचारिक बताया है। पार्टी प्रवक्ता आनंद परांजपे ने कहा कि एनसीपी की वैचारिक जड़ें छत्रपति शाहू महाराज, महात्मा ज्योतिराव फुले और डॉ. भीमराव आंबेडकर की सामाजिक न्याय और प्रगतिशील सोच में निहित हैं। उनका कहना है कि महायुति में एनसीपी की भागीदारी केवल राज्य के विकास और प्रशासनिक स्थिरता के लिए है, न कि किसी वैचारिक समर्पण के लिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अजित पवार यह संदेश देना चाहते हैं कि सत्ता में रहते हुए भी उनकी पार्टी की पहचान ‘ग़ैर-संघीय’ रहेगी, जिससे उनका पारंपरिक वोट बैंक—विशेषकर ओबीसी और मराठा वर्ग—असहज न हो।कांग्रेस का हमला: गठबंधन की मजबूरी या वैचारिक भ्रम?इस घटनाक्रम पर कांग्रेस ने तुरंत हमला बोला। पार्टी प्रवक्ता सचिन सावंत ने आरोप लगाया कि महायुति सरकार के भीतर आरएसएस की विचारधारा प्रभावी है और यदि एनसीपी उससे सहमत नहीं है तो उसके लिए सत्ता में बने रहना मुश्किल होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा और शिंदे गुट की शिवसेना का संघ से निकटता रखना इस बात का प्रमाण है कि सरकार की दिशा संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों से भटक रही है।कांग्रेस नेताओं ने इसे ‘दोहरे चरित्र की राजनीति’ बताते हुए कहा कि एनसीपी एक ओर सत्ता का हिस्सा है और दूसरी ओर वैचारिक असहमति का दिखावा कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय:
संतुलन की सियासत
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह दूरी महायुति के भीतर शक्ति संतुलन को साधने की कोशिश है। भाजपा और शिवसेना जहां खुले तौर पर संघ की वैचारिक धारा के साथ खड़ी हैं, वहीं अजित पवार अपनी पार्टी को पूरी तरह उस धारा में विलय होने से बचा रहे हैं।
एक विश्लेषक के अनुसार, “अजित पवार जानते हैं कि महाराष्ट्र की राजनीति में केवल सत्ता समीकरण नहीं, सामाजिक और वैचारिक संतुलन भी उतना ही अहम है। संघ से दूरी बनाकर वे अपने समर्थकों को यह भरोसा देना चाहते हैं कि एनसीपी की मूल पहचान सुरक्षित है।”
महायुति के लिए संदेश और चुनौती नागपुर में विधानमंडल का शीतकालीन सत्र चल रहा है और हर साल इस दौरान भाजपा के नेता संघ स्मृति मंदिर जाते रहे हैं। ऐसे समय में एनसीपी की गैर-मौजूदगी यह संकेत देती है कि महायुति एक ‘साझा सरकार’ है, लेकिन ‘साझा विचारधारा’ नहीं।
यह घटनाक्रम आने वाले समय में महायुति की राजनीति को और जटिल बना सकता है—खासकर तब, जब चुनावी मौसम नज़दीक आएगा और वैचारिक रेखाएं और तीखी होंगी।
निष्कर्ष
अजित पवार की यह दूरी न तो आकस्मिक है और न ही प्रतीकात्मक भर। यह सत्ता और सिद्धांत के बीच संतुलन साधने की एक सोची-समझी रणनीति मानी जा रही है। सवाल यह नहीं कि एनसीपी संघ कार्यक्रम में क्यों नहीं गई, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या महायुति लंबे समय तक इस वैचारिक भिन्नता के साथ स्थिर रह पाएगी।
महाराष्ट्र की राजनीति में इसका जवाब आने वाले दिनों में और स्पष्ट होगा।
NSK

