मुसलमानों ने छोड़ा साथ, यादव भी हुए नाराज़; RJD के ‘पारंपरिक किले’ में सेंध— महागठबंधन की यह हार इतिहास में दर्ज हो जाएगी

बी. के. झा

NSK

पटना/ न ई दिल्ली, 14 नवंबर

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में महागठबंधन और RJD को मिली करारी शिकस्त ने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को बदलकर रख दिया है।जहाँ एनडीए अभूतपूर्व बहुमत के साथ 200 सीटों के पार निकल गया, वहीं कभी बिहार की सत्ता की धुरी माने जाने वाली आरजेडी 30 सीटों से नीचे सिमट गई।

इस खराब प्रदर्शन की गहराई में जाएँ तो साफ दिखता है—इस बार RJD से ‘M-Y (Muslim-Yadav)’ समीकरण ने ही मुँह मोड़ लिया।यानी वह फ़ॉर्मूला जिसने 30 साल तक पार्टी को मजबूत रखा, इसी बार पूरी तरह ध्वस्त हो गया।*

“M” भी छूटा और “Y” भी…RJD की नींव ही हिल गई

तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाली आरजेडी ने एक बार फिर अपनी चुनावी रणनीति को मुस्लिम–यादव फार्मूले पर टिका दिया था।RJD का जातिगत टिकट वितरण:यादव प्रत्याशी:

50 मुस्लिम प्रत्याशी:

18उम्मीद थी कि इन दोनों समुदायों का ‘ब्लॉक वोट’ एकमुश्त पार्टी के पक्ष में आएगा।लेकिन नतीजों ने यह दावा पूरी तरह गलत साबित कर दिया।**मुसलमानों ने RJD की जगह Owaisi को चुनासीमांचल में एआईएमआईएम का तूफ़ानी प्रदर्शन**आरजेडी के मुस्लिम उम्मीदवार जहाँ केवल 3 सीटें जीतते दिखाई दे रहे हैं,

वहीं असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM पहली बार बिहार में छह सीटों पर कब्ज़ा जमाती नजर आ रही है।यह वही सीटें हैं जहाँ RJD अपने ‘M’ फैक्टर को सबसे सुरक्षित मानती थी।सीमांचल का संदेश साफ है:मुस्लिम मतदाता अब RJD को अपना “स्वाभाविक विकल्प” नहीं मान रहा।

विश्लेषकों का कहना है कि—“2025 का यह ट्रेंड उसी तरह का है, जैसा 1940 के दशक में जिन्ना के पक्ष में मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव हुआ था।”आज के भारतीय मुस्लिम की राजनीतिक आकांक्षा में Owaisi की भूमिका बढ़ती दिख रही है और यह RJD के लिए भविष्य का सबसे बड़ा खतरा है।**अब यादव भी RJD से टूटे50 उम्मीदवारों में सिर्फ 3 को जीत—लालटेन की लौ मंद क्यों पड़ी?*

*यादव बहुल सीटों पर RJD का प्रदर्शन ऐतिहासिक रूप से सबसे खराब रहा।50 यादव उम्मीदवारों में केवल 3 को ही जीत मिली।यह बदलाव क्यों?

मोदी फैक्टर—केंद्र की योजनाओं से लाभार्थी वर्ग में यादवों की बड़ी संख्या शामिल हुई।

नीतीश का ‘साइलेंट परफॉर्मेंस’—कानून-व्यवस्था, पंचायत स्तर की विकास योजनाएँ और सामाजिक संतुलन ने यादव वोटों को विभाजित किया।

जातीय राजनीति से ऊबन—युवाओं में जाति-आधारित राजनीति के बजाय रोजगार/विकास पर भरोसा बढ़ा

। तेजस्वी की राजनीतिक चूक—उन्होंने मान लिया था कि यादव वोट स्वतः और 100% उनके पक्ष में आएगा; यह अति-आत्मविश्वास उनकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई।हिंदू समुदाय का ‘मूड’ गलत पढ़ गई RJDतेजस्वी फिर पुराने फॉर्मूले में फँसे2025 के चुनावों में पूरा बिहार नए मूड में था—युवा, महिला, लाभार्थी वर्ग, और मजबूत हिंदू वोट थिंकिंग।

यह वही ‘नया MY’ था, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परिभाषित किया—M = महिला, Y = युथलेकिन तेजस्वी यादव अभी भी 1990 के दशक वाले ‘M-Y मुस्लिम–यादव’ कार्ड के सहारे सत्ता का सपना बुन रहे थे।उन्होंने यह नहीं समझा कि:हिंदू समाज अब 90 के दशक का नहीं रहासामाजिक समीकरण बदल चुके हैंविकास के पैमाने ने जातीय गणित को कमजोर कर दिया हैइन बदलते संकेतों को पढ़ने में RJD पूरी तरह विफल रही।*

*मुसलमानों का ओवैसी की ओर रुख—RJD के लिए दीर्घकालीन खतरे की घंटी**मुस्लिम मतदाता अब अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर आक्रामक और स्वतंत्र विकल्प चाहता है।ओवैसी का उभार उसी राजनीतिक असंतोष का परिणाम है, जिसे RJD ने वर्षों तक हल्के में लिया।सीमांचल में AIMIM ने जिस तरह की सफलता पाई है, वह केवल चुनावी घटना नहीं,बल्कि भविष्य के बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है।**महागठबंधन के लिए अंतिम चेतावनी:‘मुस्लिम प्रेम’ की राजनीति अब पर्याप्त नहीं*

*यदि RJD और महागठबंधन ने अपनी राजनीति को केवल अल्पसंख्यक तुष्टिकरण जातीय समीकरण पुराने सामाजिक फॉर्मूलोंतक सीमित रखा तो आने वाले चुनावों में उनका अस्तित्व संकट और भी गहरा जाएगा।

आज की परिस्थिति में उन्हें चाहिए कि वे—

विकास आधारित राजनीति अपनाएँ

नए सामाजिक समूहों को जोड़ें

युवाओं, महिलाओं, और लाभार्थियों की आकांक्षाओं को समझें

ओवैसी फैक्टर को गंभीरता से लें

निष्कर्ष

:RJD की यह हार केवल हार नहीं—चेतावनी है, इतिहास का मोड़ है**

2025 का यह चुनाव साबित करता है कि—अब बिहार में राजनीति जाति से आगे बढ़ चुकी है।अब जनता उस पार्टी को चुन रही है, जो काम करती है, वादों पर खरी उतरती है।RJD के लिए यह हार केवल एक चुनावी पराजय नहीं,बल्कि एक गहरी वैचारिक असफलता है।यह हारM भी ले गईY भी ले गईऔर भविष्य की जमीन भी खिसका गईइस चुनाव को RJD आने वाली कई पीढ़ियों तक भूल नहीं पाएगी।

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