मेडिकल लापरवाही पर दो दशक की चुप्पी, सुप्रीम कोर्ट की सख़्ती “ कब बनाओगे नियम?”—भावी CJI ने केंद्र से पूछा जवाब, मरीजों की सुरक्षा और डॉक्टरों की गरिमा दोनों दांव पर

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 2 दिसंबर

भारत की न्यायपालिका एक बार फिर उस मुद्दे पर कठोर हो गई है, जिसे देश के लाखों मरीज और हजारों डॉक्टर पिछले 20 वर्षों से झेल रहे हैं—मेडिकल लापरवाही पर स्पष्ट और प्रभावी कानूनी ढांचा।सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों की पीठ—भावी मुख्य न्यायाधीश जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता—ने केंद्र सरकार से पूछा है:“जब 2005 में ही नियम बनाने का आदेश दे दिया गया था, तो 20 साल बाद भी दिशा-निर्देश क्यों नहीं?”

यह सख़्त टिप्पणी एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जो समीक्षा फाउंडेशन नामक NGO ने दायर की है।2005 का आदेश, 2025 की हकीकत—किसका इंतजार?इस पूरे मामले की जड़ है सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला—जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य (2005)जिसमें अदालत ने साफ कहा था:किसी डॉक्टर पर बिना स्वतंत्र मेडिकल राय के आपराधिक मामला दर्ज न किया जाएडॉक्टरों की अनुचित गिरफ्तारियों पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार उचित कानूनी फ्रेमवर्क बनाएमेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (अब NMC) इससे जुड़े गाइडलाइंस तैयार करेलेकिन 20 साल बाद स्थिति यह है कि—

न केंद्र ने नियम बनाएन राज्यों ने दिशा-निर्देश जारी किएऔर NMC ने हाल ही की RTI में स्वीकार किया कि“गाइडलाइंस बनाने की प्रक्रिया अभी भी जारी है।”“भयंकर उदासीनता”—NGO ने कोर्ट में उठाई गंभीर बात NGO ने कोर्ट को बताया कि20 वर्षों की देरी ने मरीजों के अधिकारों का हनन किया हैऔर डॉक्टरों को भी कानूनी सुरक्षा से वंचित रखा हैन तो पीड़ितों के पास न्याय पाने का स्पष्ट रास्ता हैन डॉक्टरों के पास किसी भी आरोप से बचने की प्रोसीजरल शील्ड याचिकाकर्ता ने इस स्थिति को कहा—“न्यायिक निर्देशों की घोर उपेक्षा, जिससे अराजक खालीपन पैदा हुआ।”जांच समितियों पर सवाल—“

डॉक्टर डॉक्टरों का ही फैसला करते हैं”याचिका में यह भी जोरदार तर्क दिया गया कि—मेडिकल लापरवाही की जांच अक्सर डॉक्टरों की एकतरफा कमेटी करती हैऐसी कमेटियां अक्सर एक जैसी राय देती हैंजिससे पीड़ित परिवारों के सामने कोई निष्पक्ष मंच नहीं बचता याचिका में साफ लिखा गया:“डॉक्टर डॉक्टरों का न्याय करते हैं—यह मॉडल अब अप्रभावी और अविश्वसनीय साबित हो चुका है।”परिवारों की पीड़ा—सिस्टम में न सुनवाई, न पारदर्शिता की परिवारों ने पिछले वर्षों में शिकायत की है कि—डॉक्टरों की गलती के बाद भी जांच महीनों-अथवा सालों तक लटकती रहती हैसमिति के सदस्य अपनी बिरादरी के खिलाफ राय देने से बचते हैंपुलिस को भी कानूनी मार्गदर्शन नहीं मिलता, जिससेया तो अति-उत्साह में FIR हो जाती है या अत्यधिक ढिलाई से केस टल जाता है इस अनिश्चित व्यवस्था मेंमरीजों की उम्मीदें टूटती हैंऔर डॉक्टर भी लगातार तनाव में रहते हैं

संसदीय समिति की चेतावनी—12 साल पहले ही दिया था समाधान याचिका ने संसद की स्थायी समिति (2023 नहीं, 2013) की रिपोर्ट भी अदालत के सामने रखी।समिति ने कहा था:मेडिकल लापरवाही की जांच“सिर्फ डॉक्टरों पर नहीं छोड़ी जा सकती”जांच में शामिल हों:मरीजों के प्रतिनिधि सेवानिवृत्त जजवरिष्ठ सिविल सर्वेंट स्वतंत्र चिकित्सा विशेषज्ञ तभी जांच में विश्वसनीयता और पारदर्शिता आएगी लेकिन 12 साल बाद भी इन सिफारिशों का कोई ठोस पालन नहीं हुआ।अदालत की चिंता—

“नियम न होने से दोनों पक्ष जोखिम में”जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने कहा कि—बिना विधिक ढांचे केमरीज न्याय के लिए भटकते हैंडॉक्टर गलत मुकदमों का सामना करते हैंयह स्थिति किसी भी सभ्य स्वास्थ्य व्यवस्थ‍ा के अनुकूल नहींऔर यह भी पूछा—“क्या सरकार को 20 साल भी कम लगे दिशा-निर्देश बनाने के लिए?”आगे क्या?—केंद्र को नोटिस, सुनवाई जल्दपीठ ने केंद्र सरकार सेविस्तृत जवाब समय-सीमा और मौजूदा स्थिति की पूरी जानकारी मांगी है।

अगली सुनवाई में यह PIL देशभर के करोड़ों मरीजों और चिकित्सकों के भविष्य को सीधे प्रभावित करेगी।

निष्कर्ष—

20 वर्षों से लटका सवाल आज भी वही हैभारत की सबसे बड़ी अदालत आज वही प्रश्न दोहरा रही है, जो उसने 2005 में पूछा था—“मेडिकल लापरवाही पर नियम आखिर कब बनेंगे?”क्योंकि यह केवल कानून का मुद्दा नहीं—यह प्रश्न है:मरीज की सुरक्षा का,डॉक्टर की मर्यादा का,और स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता का।

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