मोहम्मद यूनुस अकेले नहीं: कट्टरता के इको-सिस्टम में उभरते पांच चेहरे और बांग्लादेश का बदलता राजनीतिक चेहरा

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/ढाका, 22 दिसंबर

शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ उसकी लोकतांत्रिक पहचान, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता—तीनों पर सवाल उठने लगे हैं। अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस पर जहां कट्टर तत्वों को शह देने के आरोप लग रहे हैं, वहीं विश्लेषकों का कहना है कि यह बदलाव किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। इसके इर्द-गिर्द एक ऐसा राजनीतिक–

वैचारिक इको-सिस्टम उभर रहा है, जिसमें कई चेहरे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस्लामी कट्टरवाद और भारत-विरोधी नैरेटिव को हवा दे रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, 2024 की कथित छात्र क्रांति के बाद बने सत्ता-संतुलन में कट्टर राजनीति को वैधता मिली है—जिसका असर सड़कों से संसद और मदरसों से चुनावी मंचों तक दिखने लगा है।

विश्लेषण:

एंटी-इंडिया नैरेटिव क्यों बन रहा है सत्ता की सीढ़ी?

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शेख हसीना को कठघरे में खड़ा करने और नई सत्ता को स्थिर करने के लिए एंटी-इंडिया और एंटी-हिंदू विमर्श एक आसान औज़ार बन गया है।

एक क्षेत्रीय मामलों के विशेषज्ञ कहते हैं,“जब शीर्ष स्तर पर सख्त बयानबाज़ी को मौन स्वीकृति मिलती है, तो नीचे कट्टर समूहों का उभार स्वाभाविक हो जाता है। यही इको-सिस्टम आज बांग्लादेश में आकार ले रहा है।”कट्टरता को खाद देने वाले पांच चेहरे:

आरोप, भूमिकाएँ और असर

1 * मोहम्मद नाहिद इस्लाम 27 वर्षीय नाहिद इस्लाम 2024 के छात्र आंदोलन स्टूडेंट्स अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन के प्रमुख समन्वयक रहे। अंतरिम सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय संभालने के बाद फरवरी 2025 में इस्तीफा देकर उन्होंने नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) की शुरुआत की।आलोचकों के अनुसार, नाहिद की पार्टी के कुछ धड़े जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों के करीब माने जाते हैं। उनकी युवा अपील के जरिए कट्टर विचार छात्रों तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।

भारत पर बयानबाज़ी को लेकर वे कहते हैं कि नई ढाका सरकार की संप्रभुता का सम्मान होना चाहिए—

लेकिन विश्लेषकों के अनुसार यही भाषा टकराव की राजनीति को बढ़ावा दे रही है।

2• हसनत अब्दुल्लाहछात्र आंदोलन के प्रमुख आयोजकों में शामिल हसनत अब्दुल्लाह, 2025 में NCP के दक्षिणी क्षेत्र के मुख्य आयोजक बने। उनके भारत-विरोधी बयान—

खासकर ‘सेवन सिस्टर्स’ को लेकर—राजनयिक हलकों में गंभीर चिंता का विषय बने।एक पूर्व राजनयिक के मुताबिक,“ऐसी बयानबाज़ी द्विपक्षीय रिश्तों को सीधे नुकसान पहुंचाती है और कट्टर समूहों को अंतरराष्ट्रीय वैधता का भ्रम देती है।”

3 •आसिफ महमूदछात्र आंदोलन से उभरे आसिफ महमूद पर आरोप है कि वे कट्टरपंथी छात्र संगठनों को संरक्षण दे रहे हैं। युवा एवं खेल मंत्रालय संभाल चुके आसिफ पर भारत-विरोधी भावनाओं को चुनावी लाभ के लिए हवा देने के आरोप लगे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि खेल–शिक्षा जैसे क्षेत्रों में वैचारिक ध्रुवीकरण भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है।

4• डॉ. शफीकुर्रहमान जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर्र हमान खुले तौर पर इस्लामी राजनीतिक एजेंडे की बात करते हैं। 1971 के युद्ध अपराधों से जुड़े आरोपों की ऐतिहासिक छाया के बीच जमात की बढ़ती सक्रियता ने अल्पसंख्यकों में डर पैदा किया है। चुनाव में धर्म को केंद्रीय मुद्दा बनाने की तैयारी, विशेषज्ञों के अनुसार, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को और तेज कर सकती है।

5• ममुनुल हकहिफाजत-ए-इस्लाम के संयुक्त महासचिव ममुनुल हक सबसे विवादास्पद चेहरा माने जाते हैं। 2021 में पीएम मोदी के दौरे के विरोध में हिंसक प्रदर्शनों से लेकर महिला सुधारों के विरोध तक—उनके बयानों पर लगातार सवाल उठे हैं। जेल से रिहाई के बाद अंतरिम नेतृत्व से उनकी मुलाकात को लेकर भी आलोचनाएँ हुईं।

सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, मदरसों से जुड़े कुछ युवाओं का अल्पसंख्यक हमलों में नाम आना गंभीर चेतावनी है।भारत सरकार का रुख: अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर चिंता भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और कट्टर बयानबाज़ी पर चिंता जताई है।

कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, नई दिल्ली ढाका से यह अपेक्षा रखती है कि वह हिंसा पर सख्ती करे,भड़काऊ भाषणों पर लगाम लगाए,और द्विपक्षीय संबंधों को घरेलू राजनीति का औज़ार न बनाए।

हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया: ‘

सुरक्षा और सम्मान दोनों चाहिए’भारत और बांग्लादेश में सक्रिय हिंदू संगठनों ने कहा है कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों की खबरें गंभीर चिंता का विषय हैं।एक संगठन के प्रवक्ता ने कहा,“यह केवल आस्था का नहीं, नागरिक अधिकारों और जीवन की सुरक्षा का प्रश्न है।”

कानूनी नजरिया:

अभिव्यक्ति बनाम भड़काऊ भाषण

वरिष्ठ कानूनविदों का मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में हिंसा के लिए उकसावे को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

एक संवैधानिक विशेषज्ञ के अनुसार,“राज्य का दायित्व है कि वह भाषण और अपराध के बीच स्पष्ट रेखा खींचे। न करने पर अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही तय हो सकती है।”भारत–बांग्लादेश संबंधों पर असर: भरोसे की कसौटी

विश्लेषकों का निष्कर्ष है कि यदि एंटी-इंडिया नैरेटिव और कट्टर राजनीति को शीर्ष स्तर पर चुनौती नहीं दी गई, तो—व्यापार,सुरक्षा सहयोग,और क्षेत्रीय स्थिरता तीनों को प्रभावित होंगे।

एक वरिष्ठ रणनीतिक विश्लेषक कहते हैं,“ढाका–दिल्ली संबंध भावनाओं नहीं, स्थिर संस्थानों से चलते हैं। कट्टरता को जगह देना दोनों देशों के हित में नहीं।”

निष्कर्ष:

मोड़ पर खड़ा बांग्लादेश

बांग्लादेश की वर्तमान दिशा किसी एक नेता की कहानी नहीं, बल्कि एक उभरते इको-सिस्टम की तस्वीर है। सवाल यह है कि क्या अंतरिम नेतृत्व कट्टर तत्वों पर लगाम लगाकर समावेशी राजनीति की ओर लौटेगा—

या फिर अल्पकालिक सियासी लाभ के लिए क्षेत्रीय स्थिरता को दांव पर लगाएगा।आने वाले महीनों में यही तय होगा कि बांग्लादेश लोकतांत्रिक संतुलन की ओर लौटता है या कट्टर ध्रुवीकरण की राह पर और आगे बढ़ता है।

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