बी के झा
नई दिल्ली, 20 अप्रैल
भारतीय न्यायपालिका के भीतर नैतिकता, जवाबदेही और संस्थागत विश्वास को लेकर एक महत्वपूर्ण और तीखा संदेश सामने आया है। B. V. Nagarathna ने न्यायिक आचरण पर बोलते हुए कहा कि जो जज लालच का शिकार हो जाते हैं, उनका न्याय व्यवस्था में कोई स्थान नहीं है और ऐसे लोगों को सिस्टम से बाहर कर दिया जाना चाहिए।उनकी यह टिप्पणी केवल एक नैतिक सलाह नहीं, बल्कि न्यायपालिका की आत्मशुद्धि और संस्थागत साख को लेकर गंभीर चेतावनी के रूप में देखी जा रही है।
जज का पद विशेषाधिकार नहीं, सार्वजनिक विश्वास है
कार्यक्रम में संबोधन के दौरान जस्टिस B. V. Nagarathna ने कहा कि वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद न्यायिक अधिकारियों को बेहतर वेतन, सुविधाएं और सेवा शर्तें उपलब्ध हैं। ऐसे में किसी भी प्रकार का अनैतिक आचरण न केवल अनुचित है, बल्कि न्याय व्यवस्था की आत्मा के विरुद्ध है।उन्होंने स्पष्ट कहा कि एक न्यायाधीश को अपने वैध वेतन में संतुष्ट रहना चाहिए और किसी भी प्रलोभन से दूर रहना चाहिए।यह संदेश उस मूल सिद्धांत को रेखांकित करता है कि न्यायाधीश का पद शक्ति का नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास का पद है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह बयान?
भारत जैसे लोकतंत्र में न्यायपालिका अंतिम आशा का मंच मानी जाती है। जब नागरिक प्रशासन, राजनीति या व्यवस्था से निराश होते हैं, तो वे अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं। ऐसे में यदि न्यायपालिका पर ही संदेह पैदा हो जाए, तो लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर पड़ सकता है।इसी संदर्भ में जस्टिस नागरत्ना का बयान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।“एक गलत फैसला भी भरोसा हिला सकता है”उन्होंने फैसले लेने की प्रक्रिया में लापरवाही के खिलाफ भी चेतावनी दी। उनका कहना था कि एक भी गलत निर्णय जनता के विश्वास को कमजोर कर सकता है।यह टिप्पणी बताती है कि न्याय केवल होना नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। न्यायिक निर्णयों में निष्पक्षता, तैयारी, संवेदनशीलता और विधिक मजबूती आवश्यक है।
जिला न्यायपालिका पर खास जोर
जस्टिस नागरत्ना ने अदालतों के प्रशासनिक कामकाज में पारदर्शिता और निष्पक्षता की आवश्यकता पर भी बल दिया, विशेषकर जिला न्यायपालिका में।भारत की बड़ी आबादी के लिए जिला अदालतें ही न्याय का पहला और सबसे महत्वपूर्ण मंच हैं। ऐसे में यदि निचले स्तर पर व्यवस्था मजबूत, पारदर्शी और दक्ष होगी, तो पूरे न्याय तंत्र की विश्वसनीयता बढ़ेगी।उन्होंने उच्च न्यायालयों से भी आग्रह किया कि वे अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों के लिए सहयोगी और सकारात्मक वातावरण तैयार करें।
वरिष्ठ शिक्षाविदों ने उठाए गंभीर सवाल
कुछ वरिष्ठ शिक्षाविदों ने जस्टिस B. V. Nagarathna की टिप्पणी का समर्थन करते हुए कहा कि निचली अदालतों को लेकर समय-समय पर ऐसी शिकायतें सामने आती रही हैं, जिनमें धनबल, क्षेत्रवाद, जातिगत पूर्वाग्रह या स्थानीय प्रभाव के कारण पक्षपातपूर्ण फैसलों की आशंका व्यक्त की जाती है। उनका मत है कि यदि न्यायपालिका स्वयं ऐसे मुद्दों पर कठोर आत्ममंथन करे और सुधारात्मक कदम उठाए, तो यह भविष्य में न्याय व्यवस्था के लिए वरदान साबित होगा। उन्होंने कहा कि निष्पक्ष न्याय केवल संवैधानिक आदर्श नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सांस है।
AI पर भी चेतावनी: नकली कानूनों का खतरा
अपने संबोधन में जस्टिस B. V. Nagarathna ने न्यायपालिका में बढ़ते आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उपयोग पर भी चिंता जताई।उन्होंने कहा कि ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां वकीलों ने अदालत में AI टूल्स से तैयार किए गए ऐसे कानूनों या निर्णयों का हवाला दिया, जो वास्तविकता में अस्तित्व ही नहीं रखते थे।यह बेहद गंभीर मुद्दा है, क्योंकि अदालत में प्रस्तुत हर तथ्य और मिसाल का सत्य होना अनिवार्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिन निर्णयों या कानूनों का हवाला दिया जाए, उनकी सत्यता की जिम्मेदारी वकीलों की ही है।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनविदों का कहना है कि यह बयान न्यायपालिका के भीतर जवाबदेही की मांग को मजबूत करता है।उनके अनुसार:
न्यायिक स्वतंत्रता का अर्थ निरंकुशता नहीं है।
आंतरिक अनुशासन और नैतिकता उतनी ही जरूरी है जितनी बाहरी स्वतंत्रता।
शिकायत निवारण और आचार संहिता तंत्र को और मजबूत किया जाना चाहिए।
तकनीक का उपयोग हो, लेकिन सत्यापन के साथ।
निष्कर्ष
जस्टिस B. V. Nagarathna की टिप्पणी केवल “लालची जजों” पर प्रहार नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की आत्मा की रक्षा का आह्वान है।न्यायपालिका की ताकत उसकी इमारतों, पदों या परंपराओं में नहीं, बल्कि जनता के भरोसे में निहित है।
और यह भरोसा तभी कायम रहेगा, जब ईमानदारी, पारदर्शिता और सत्य सर्वोच्च रहेंगे।
NSK

