बी के झा
NSK

न ई दिल्ली / पटना, 30 नवंबर
पटना के पावन राजनीतिक भूगोल में लालू प्रसाद यादव का घर सिर्फ एक पता नहीं रहा है—वह एक राजनीतिक दरबार, एक लोक-सुनवाई केंद्र, और जनता के लिए सदैव खुला सत्ता का मंच रहा है।लेकिन नए आवास में शिफ्ट होने के साथ यह परंपरा अब इतिहास का हिस्सा बनती दिख रही है।
RJD प्रमुख लालू यादव आज एक ऐसे घर में रह रहे हैं जहाँ न प्रवेश उतना सरल है, न मिलना उतना सहज। यह बदलाव जितना निजी स्वास्थ्य का मामला है, उतना ही RJD की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत भी।पहले कैसा था लालू यादव का ‘घर’?दरबार सा खुले दरवाज़े, भीड़, हंसी और राजनीति का चहल-पहल**लालू यादव के पहले आवास—1, अणे मार्ग—को लोग मजाक में “जनता दरबार” कहते थे।
24 घंटे खुला गेट…ग्रामीणों की कतारें…पत्रकारों की भीड़…मंत्रियों का बिना अपॉइंटमेंट प्रवेश…और लालू यादव की वह करिश्माई, ठहाकेदार शैली जिसमें राजनीति और जन-भावना एक साथ बहती थी।फिर 10, सर्कुलर रोड, जहां राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी यही खुलापन बना रहा।लालू राजनीति के केंद्र में थे, और उनका घर उस राजनीति की धड़कन।और अब… बंद गेट, कड़ा प्रोटोकॉल, स्वास्थ्य प्राथमिक—लालू युग की राजनीति का धीमा अवसान?*
*नया घर इस शैली के बिल्कुल उलट है।यहाँ—अंदर जाने से पहले सख्त जांच,कार्यकर्ताओं को पहले अनुमति,अनियोजित मुलाक़ातें लगभग बंद,और माहौल में शांति, स्वास्थ्य और मेडिकल मॉनिटरिंग का दबदबा।लालू यादव अब सीमित समय के लिए ही राजनीतिक चर्चा करते हैं।तेजस्वी यादव अब लगभग सभी बैठकों और पार्टी रणनीतियों का संचालन कर रहे हैं।यह बदलाव RJD में पीढ़ी परिवर्तन को आधिकारिक रूप से स्थापित करता है।
सीनियर नेताओं का दर्द—”लालू जी का घर सिर्फ घर नहीं था, आंदोलन था”RJD के बुजुर्ग नेताओं में इस बदलाव से भावुकता साफ झलकती है।एक वरिष्ठ नेता (नाम न छापने की शर्त पर) ने कहा—यह पहला घर है जहाँ बिना अनुमति हम अंदर नहीं जा सकते।लालू जी की राजनीति खुले दरवाज़ों की राजनीति थी। यह बदलाव बताता है कि एक दौर अब समाप्ति की ओर है।”राजनीतिक विश्लेषकों की राय:“RJD में सत्ता का हस्तांतरण अब औपचारिक हो गया”
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अजय पांडे कहते हैं—तेजस्वी अब पूर्ण रूप से पार्टी के नियंत्रण में हैं।लालू का नया आवास प्रतीकात्मक रूप से बताता है कि वे सक्रिय राजनीति से धीरे-धीरे पीछे जा रहे हैं।यह बदलाव सिर्फ भौतिक नहीं, वैचारिक भी है।”
वरिष्ठ पत्रकार पंकज आनंद इस पर टिप्पणी करते हैं—जब एक नेता का घर राजनीतिक केंद्र न रहे,तो जान लीजिए कि निर्णय लेने की शक्ति किसी और के पास जा चुकी है।RJD अब लालू मॉडल से तेजस्वी मॉडल की ओर बढ़ रही है।”
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया—“यह RJD में बंद कमरों की राजनीति की शुरुआत”BJP के एक प्रमुख नेता ने तंज कसते हुए कहा—लालू जी का घर कभी भी जनता के लिए बंद नहीं होता था।अब प्रोटोकॉल और सुरक्षा उनकी राजनीति को सीमित कर रहे हैं।वास्तविक नेतृत्व तो अब तेजस्वी के हाथ में है।जदयू के एक प्रवक्ता ने टिप्पणी की—लालू जी से मिलने की संस्कृति बिहार की राजनीति की पहचान थी।अब वह दौर खत्म हो रहा है।
RJD पर अब सिर्फ तेजस्वी का नियंत्रण है— यह सब को समझना चाहिए।”क्या तेजस्वी मॉडल लालू मॉडल को पीछे छोड़ पाएगा?आने वाले वर्षों का सबसे बड़ा सवाल तेजस्वी यादव ने खुद को गंभीर, तकनीकी, और प्रशासन-केन्द्रित नेता के रूप में स्थापित किया है—जो लालू की कैजुअल, लोक-जीवन वाली राजनीति से बिल्कुल अलग है।यही कारण है कि पार्टी के भीतर दो भावनाएँ चल रही हैं—
1. युवाओं और नए नेताओं में उत्साह
2. पुराने नेताओं में भावुकता और असुरक्षा
निष्कर्ष:
लालू का नया घर सिर्फ नया पता नहीं,RJD की राजनीति की नई दिशा है**यह बदलाव बताता है कि—लालू युग धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में जा रहा है तेजस्वी केंद्र में आ रहे हैं
RJD की शैली, स्वर और संरचना बदल रही हैबिहार की राजनीति में एक बड़ा सांस्कृतिक बदलाव आकार ले रहा हैसवाल यह नहीं कि लालू ने घर क्यों बदला।सवाल यह है कि RJD किस दिशा में बदल रही है—
और यह परिवर्तन आने वाले चुनावों में किसे कितना फायदा देगा।
