बी के झा
नई दिल्ली, 9 जनवरी
रेलवे में कथित “जमीन के बदले नौकरी” घोटाले में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और उसके सर्वोच्च परिवार के लिए शुक्रवार का दिन ऐतिहासिक भी रहा और निर्णायक भी। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने इस बहुचर्चित मामले में लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव, मीसा भारती और हेमा यादव समेत 46 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय कर दिए। अदालत ने साथ ही 52 आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया।सीबीआई के इस मामले में अब औपचारिक ट्रायल शुरू होगा—और यही वह बिंदु है जहां यह केस केवल कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक भविष्य तय करने वाला मुकदमा बन जाता है।
कोर्ट का संदेश: आरोप गंभीर, मुकदमा जरूरी
सीबीआई के विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने चार्ज फ्रेम करते हुए स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया आरोपों में दम है और मुकदमा चलाना न्यायसंगत है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (पीसी एक्ट) के तहत आरोप तय होना इस बात का संकेत है कि अदालत ने इसे केवल प्रशासनिक अनियमितता नहीं, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग से जुड़ा संगठित अपराध माना है।कानूनविदों के अनुसार, चार्ज फ्रेम होना दोष सिद्धि नहीं है, लेकिन यह भी नहीं कि मामला कमजोर है। वरिष्ठ अधिवक्ता मानते हैं कि “चार्ज तय होना अभियोजन की पहली बड़ी जीत होती है, जहां अदालत कहती है—यह मामला सुनवाई के योग्य है।
”2004–2009: सत्ता, रेलवे और गरीब अभ्यर्थी यह मामला उस दौर का है जब लालू प्रसाद यादव यूपीए सरकार में रेल मंत्री थे। आरोप है कि रेलवे में ग्रुप-डी की नौकरियों के लिए बिना विज्ञापन और पारदर्शी प्रक्रिया के नियुक्तियां की गईं। बदले में चयनित अभ्यर्थियों या उनके परिजनों से लालू परिवार और उनसे जुड़े लोगों के नाम पर जमीनें लिखवाई गईं—या तो गिफ्ट डीड के रूप में या बेहद कम कीमत पर।
सीबीआई ने अदालत को बताया कि जिन लोगों को नौकरी दी गई, वे अत्यंत गरीब पृष्ठभूमि से थे, कई के दस्तावेज फर्जी स्कूलों से जारी थे और चयन योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि “लेन-देन” के आधार पर हुआ।52 बरी, 46 पर ट्रायल—क्या संकेत?
इस केस में कुल 103 आरोपी बनाए गए थे, जिनमें से 5 की मृत्यु हो चुकी है। 52 आरोपियों को बरी किया जाना यह दिखाता है कि अदालत ने “थोक में आरोप” के बजाय साक्ष्य आधारित चयन किया।शिक्षाविद और न्यायिक प्रक्रिया के जानकार मानते हैं कि इससे मुकदमे की विश्वसनीयता बढ़ती है। “जब अदालत बड़ी संख्या में लोगों को बरी करती है, तो यह संदेश जाता है कि मामला राजनीतिक नहीं, बल्कि कानूनी कसौटी पर परखा गया है।”
तेजस्वी पर सबसे बड़ा राजनीतिक दबाव
इस फैसले का सबसे गहरा राजनीतिक असर बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव पर पड़ता है। अब वे सिर्फ ‘लालू के बेटे’ नहीं, बल्कि स्वयं एक चार्जशीटेड नेता के रूप में चुनावी राजनीति में उतरेंगे।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा और एनडीए इस मुद्दे को आने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में केंद्रीय हथियार बनाएगी। “नौकरी दो, जमीन लो”—यह नारा पहले ही विपक्ष के पोस्टरों और भाषणों में गूंजने लगा है।
विपक्ष का हमला: ‘परिवारवाद + भ्रष्टाचार
’भाजपा, जदयू और अन्य एनडीए घटक दलों ने अदालत के फैसले को “कानून की जीत” बताया। उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि “यह वही राजद है जो गरीबों के नाम पर राजनीति करता है और गरीबों की जमीन लेकर अपने परिवार का साम्राज्य खड़ा करता है।”भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि यह केस राजद के ‘समाजिक न्याय’ के दावे की नैतिक जमीन को खत्म करता है।
राजद की दलील: राजनीतिक प्रतिशोध
वहीं, राजद ने इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि चार्ज फ्रेम होना दोष सिद्ध नहीं है और अंतिम फैसला अदालत का ही होगा। तेजस्वी यादव पहले ही कह चुके हैं कि “हम न्यायपालिका पर भरोसा रखते हैं और सच्चाई सामने आएगी।”हालांकि, पार्टी के भीतर यह चिंता भी है कि लंबा ट्रायल राजद की चुनावी रणनीति को कमजोर कर सकता है।
ईडी का मामला: अगली चुनौती सीबीआई के साथ-साथ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) मनी लॉन्ड्रिंग के पहलू की जांच कर रहा है। कानूनविदों का मानना है कि यदि ईडी मामले में भी आरोप मजबूत होते हैं, तो लालू परिवार की मुश्किलें कई गुना बढ़ सकती हैं।
कानून, राजनीति और विरासत—तीनों का इम्तिहान लैंड फॉर जॉब केस अब केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं रहा। यह केस लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक विरासत, तेजस्वी यादव के नेतृत्व दावे और राजद की नैतिक विश्वसनीयता—तीनों की परीक्षा है।
अदालत ने फिलहाल इतना कहा है कि मामला सुना जाएगा।अब यह सुनवाई सिर्फ न्याय की नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति की दिशा तय करने वाली प्रक्रिया बन चुकी है।
NSK


