बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 31 जनवरी
भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने देश की लोकतांत्रिक और चुनावी व्यवस्था पर एक गंभीर और असहज करने वाला आत्ममंथन प्रस्तुत किया है। अपनी नई पुस्तक ‘Arguably Contentious: Thoughts on a Divided World’ में अंसारी न केवल भारतीय लोकतंत्र की सीमाओं को रेखांकित करते हैं, बल्कि यह भी संकेत देते हैं कि सात दशकों के संवैधानिक सफर के बावजूद देश अब भी स्वतंत्र, निष्पक्ष और नैतिक चुनावी व्यवस्था स्थापित करने में असफल रहा है।
उनका यह कथन कि “हम अभी तक चुनावी गड़बड़ियों को खत्म करने में सफल नहीं हुए हैं” केवल एक आलोचना नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी आत्मा पर उठाया गया प्रश्न है।
पैसे की सत्ता बनाम मतदाता की संप्रभुता
अंसारी का तर्क है कि भारत की चुनावी राजनीति में धनबल निर्णायक शक्ति बन चुका है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि—“हमने पैसे की ताकत को उसके सभी रूपों में चुनावी नतीजों को बिगाड़ने की इजाजत दी है और चुनावों को स्वतंत्र व निष्पक्ष बनाने में नाकाम रहे हैं।”यह टिप्पणी उस व्यापक चिंता को सामने लाती है, जहां चुनाव एक वैचारिक प्रतिस्पर्धा न रहकर संसाधनों की होड़ बनते जा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह स्थिति मतदाता की संप्रभुता को कमजोर करती है और लोकतंत्र को केवल एक मशीनी प्रक्रिया में बदल देती है।
लोकतंत्र का आधा भरा गिलासपूर्व
उपराष्ट्रपति लोकतंत्र को लेकर किसी आत्ममुग्ध आशावाद में नहीं हैं। वे यथार्थवादी लहजे में स्वीकार करते हैं—“आज हमें यह मानना होगा कि लोकतंत्र का गिलास आधा भरा हुआ है।”उनका कहना है कि भारत ने चुनावी लोकतंत्र तो अपनाया, लेकिन उसे पूरी तरह प्रतिनिधिक बनाने में चूक गया। सत्ता तक पहुंच तो संभव हुई, पर समाज के अनेक वर्ग निर्णय प्रक्रिया से हाशिए पर ही बने रहे।
वैचारिक पतन और संवैधानिक नैतिकता का संकट
अंसारी की पुस्तक का सबसे तीखा पक्ष राजनीतिक संस्कृति पर उनकी टिप्पणी है। उनके अनुसार—“हमारी राजनीतिक प्रक्रिया वैचारिक पतन और संवैधानिक नैतिकता के पालन में गिरावट को दिखाती है।”यह कथन केवल दलों या नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे सार्वजनिक विमर्श की गुणवत्ता पर सवाल उठाता है। उनके अनुसार, समाज में नैतिक व्यवस्था और सार्वजनिक विवेक के प्रति बढ़ती उपेक्षा लोकतंत्र को खोखला कर रही है।
इतिहास का राजनीतिकरण और बहुसंख्यकवाद
अंसारी बहुसंख्यकवाद की बढ़ती प्रवृत्तियों को लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा मानते हैं। उनका कहना है कि—इतिहास को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है नागरिकों के खास वर्गों को लक्षित किया जा रहा है इससे सामाजिक विभाजन और अविश्वास गहराता जा रहा हैवे इस संदर्भ में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति पर हुए अध्ययनों का उल्लेख करते हैं, जिनके अनुसार भारत की लगभग 20 प्रतिशत आबादी वाले अल्पसंख्यक समुदायों के साथ होने वाला भेदभाव उन धारणाओं से जुड़ा है, जिनकी जड़ें 1947 के विभाजन की सोच में मिलती हैं।
हिंसा, राष्ट्र-निर्माण और असहज सच्चाइयाँ
अंसारी एक संवेदनशील लेकिन विवादास्पद तर्क भी रखते हैं। वे लिखते हैं कि—“हिंसा केवल आकस्मिक नहीं थी, बल्कि राष्ट्र की नींव का एक अभिन्न अंग थी।”उनके अनुसार, स्वतंत्रता के समय भाईचारे की आवश्यकता उतनी ही अनिवार्य थी, जितनी व्यवस्था बहाल करने की। बाद के ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के आधार पर वे मानते हैं कि समाज के कुछ हिस्सों में सामाजिक एकता के लिए इस तर्क की वैधता को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।
भारतीय सेक्युलरिज्म: सिद्धांत और विरोधाभास
पूर्व उपराष्ट्रपति भारतीय सेक्युलरिज्म की व्याख्या पर भी सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं कि एक सेक्युलर राज्य की तीन मूल शर्तें—धर्म का पालन करने की स्वतंत्रतासभी धर्मों के प्रति राज्य की समानताराज्य और धर्म के बीच तटस्थता—का उल्लेख तो बार-बार हुआ है, लेकिन व्यवहार में इनका असंगत और विरोधाभासी प्रयोग किया गया है, जिससे बड़ी संवैधानिक और सामाजिक विसंगतियां पैदा हुई हैं।
निष्कर्ष:
आत्ममंथन का आह्वान
हामिद अंसारी की यह पुस्तक किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में लिखा गया दस्तावेज़ नहीं, बल्कि भारतीय गणराज्य के लिए एक आत्ममंथन का निमंत्रण है। यह याद दिलाती है कि लोकतंत्र केवल चुनाव कराने से नहीं चलता, बल्कि—नैतिक राजनीति समावेशी प्रतिनिधित्व संवैधानिक मूल्यों के प्रति निष्ठाऔर सामाजिक सौहार्द से ही जीवित रहता है।
प्रश्न यह नहीं है कि हम कहां पहुंचे हैं,प्रश्न यह है कि क्या हम अब भी उसी दिशा में चल रहे हैं, जिसके लिए संविधान लिखा गया था?
