बी के झा
नई दिल्ली ,9 दिसंबर
वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर संसद में चल रही विशेष बहस के बीच जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी के बयान ने एक नए राजनीतिक और वैचारिक भूचाल को जन्म दे दिया है।मदनी ने तीखे शब्दों में कहा—मर जाना मंज़ूर है, लेकिन शिर्क नहीं।मुसलमान न वंदे मातरम् पढ़ सकता है, न गा सकता है।जिएंगे तो इस्लाम पर, मरेंगे तो इस्लाम पर।”उनके इस बयान ने सिर्फ धार्मिक संवेदनाओं ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय बहस के स्वर को भी बदल दिया, जिसके बाद सत्ता पक्ष, विपक्ष, धर्मगुरु, हिंदू संगठनों से लेकर शिक्षाविदों तक ने अपनी-अपनी प्रतिक्रिया तेज़ कर दी।
मदनी का तर्क: इबादत में किसी साझी की जगह नहींमदनी ने कहा कि वंदे मातरम् की कई पंक्तियाँ इस्लामी आस्था के विरुद्ध हैं, क्योंकि गीत में ‘मां’, ‘दुर्गा’ और ‘पूजा’ जैसे शब्द प्रयुक्त हैं।उन्होंने कहा—मुसलमान वतन से मोहब्बत करता है, लेकिन पूजा नहीं कर सकता।संविधान का अनुच्छेद 19 और 25 किसी को मजबूर नहीं करता कि वह अपने धर्म के ख़िलाफ़ कोई गीत गाए।वंदे मातरम् का मूल अर्थ “मां, मैं तेरी पूजा करता हूँ” है, जो इस्लामी सिद्धांतों से विपरीत है।
मदनी ने यह भी कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में मुसलमानों की कुर्बानियां किसी प्रमाणपत्र की मोहताज नहीं हैं।
ओवैसी भी मैदान में आए, कहा—”मुसलमान यह शब्द नहीं बोल सकता”AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मदनी के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि मुसलमान वंदे मातरम् नहीं बोल सकता क्योंकि इसमें देवी की उपासना का उल्लेख है। उनका बयान राजनीतिक हलकों में एक और आग की लकीर के रूप में देखा जा रहा है।मदनी परिवार की बयानबाज़ी पर पुराना विवाद भी फिर उभरा
भोपाल में ‘छोटे मदनी’ यानी मौलाना अरशद मदनी के भतीजे का बयान
वंदे मातरम् गाने वाली कौम मुर्दा है”—
पहले ही विवाद पैदा कर चुका था।अब बड़े मदनी के नए वक्तव्य ने उस विवाद को दोबारा हवा दे दी है।
सत्ता पक्ष का पलटवार—“वंदे मातरम् भारत की आत्मा है”
गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में कहा—वंदे मातरम् कोई सामान्य गीत नहीं, यह भारत की आत्मा है।हर भारतीय इसे सम्मान देगा—और देना ही होगा।
बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा—मौलाना मदनी को भी वंदे मातरम् बोलना पड़ेगा,और इस देश में रहने वाले हर मुसलमान को भी इसका सम्मान करना ही होगा।
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा—मदनी किस दिशा में देश को ले जाना चाहते हैं?क्या वे भारत में वंदे मातरम् की जगह शरिया कानून लागू करना चाहते हैं?
पाकिस्तान-बांग्लादेश में हिंदुओं को कोई अधिकार नहीं,लेकिन भारत में अल्पसंख्यकों को संविधान ने बराबर अधिकार दिए हैं।”
हिंदू संगठन और धर्मगुरुओं की तीखी प्रतिक्रिया
विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और कई अखाड़ों ने कहा—वंदे मातरम् देश का शाश्वत मंत्र हैयह किसी देवी की पूजा नहीं, राष्ट्र के प्रति भावनात्मक श्रद्धांजलि है मदनी का बयान समाज को बांटने वाला और देशविरोधी तत्वों को प्रोत्साहित करने वाला उज्जैन के एक प्रमुख सनातन धर्म गुरु ने टिप्पणी की—
भारत माता की जय और वंदे मातरम् पूजा नहीं,मातृभूमि की कृतज्ञता का भाव है।इसे धार्मिक रंग देना दुर्भाग्यपूर्ण और विभाजनकारी है।”शिक्षाविदों और राजनीतिक विश्लेषकों की चेतावनी
कई वरिष्ठ शिक्षाविदों ने कहा कि इस प्रकार के बयान युवाओं में अविश्वास और विभाजन की मानसिकता बढ़ाते हैं देश में शिक्षा, विकास, नवाचार जैसे मुद्दे पीछे रह जाते हैं धार्मिक व्याख्याओं को राष्ट्रीय प्रतीकों के खिलाफ खड़ा करना समाज के लिए खतरनाक संदेश हैं-
एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने कहा—यह बयान चुनावी और वैचारिक ध्रुवीकरण को हवा देता है।बहस संविधान, राष्ट्रवाद और पहचान के विषय पर जा पहुँची है,जिसका असर अगले चुनावों तक दिखाई देगा।
”विपक्षी दलों की मिश्रित प्रतिक्रिया कांग्रेस ने सावधानी से प्रतिक्रिया देते हुए कहा—धार्मिक भावनाओं का सम्मान होना चाहिए लेकिन वंदे मातरम् राष्ट्र की धरोहर है-किसी भी बयान को ऐसी दिशा न दी जाए कि वह साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ाए
TMC और सपा के नेताओं ने कहा—संविधान सर्वोपरि है नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है लेकिन किसी वक्तव्य से सामाजिक सौहार्द बिगड़ना चिंताजनक है
पृष्ठभूमि
: क्यों बार-बार विवाद का केंद्र बनता है वंदे मातरम्?
बंकिमचंद्र के ‘आनंदमठ’ उपन्यास से लिया गयापहले दो अंतरों को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया गया विभिन्न समुदाय इन्हें अलग-अलग व्याख्याओं के आधार पर देखते हैं संसद में 150वीं वर्षगांठ पर चल रही बहस ने फिर पुराने विवाद को जगा दिया है
निष्कर्ष
: वंदे मातरम् केवल गीत नहीं, राष्ट्रीय विमर्श का आईना मदनी के बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत में “राष्ट्रीय प्रतीक”, “धार्मिक पहचान” और “संवैधानिक कर्तव्य” के बीच खींची गई रेखाएं अक्सर राजनीति, भावनाओं और व्याख्याओं के दबाव में धुंधली हो जाती हैं।सवाल यह है—क्या यह बहस भारत की एकता को मजबूत करेगी या एक नई वैचारिक खाई गहरी करेगी?
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