बी के झा
नई दिल्ली, 10 नवंबर
राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् की रचना को 150 वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में कहा था कि गीत को “पूरा का पूरा” गाया जाना चाहिए — वे अंश भी शामिल किए जाएँ जो पहले विवाद के कारण हटाए गए थे।लेकिन प्रधानमंत्री की यह अपील देश के कई मुस्लिम जन प्रतिनिधियों और उलेमा वर्ग को अखर गई है, जो खुले तौर पर इसके विरोध में सामने आए हैं।पहले भी मोहम्मद आज़म खां, शफीकुर रहमान बर्क और पूर्व केंद्रीय मंत्री रशीद मसूद संसद में वंदे मातरम् के पूर्ण गायन को लेकर आपत्ति जता चुके हैं।
अब यह विवाद फिर सुर्खियों में है क्योंकि दारुल उलूम से जुड़ी मजलिस-ए-शूरा के सदस्य और जमीयत उलमा-ए-हिंद के एक धड़े के पुनर्निर्वाचित अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने इस मुद्दे पर दो टूक बयान दिया है।“दूसरों की देवी-देवताओं की इबादत इस्लाम में मान्य नहीं” —
मदनी यूनिवार्ता से विस्तृत बातचीत में मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि“वंदे मातरम् की कुछ पंक्तियों में मातृभूमि को देवी दुर्गा के रूप में प्रस्तुत किया गया है, और उसकी पूजा-वंदना के शब्द हैं। मुसलमान ईश्वर एक है, इस विश्वास को मानने वाले हैं। इसलिए वे किसी अन्य देवी-देवता की इबादत नहीं कर सकते।
”उनके अनुसार वंदे मातरम् की प्रारंभिक दो पंक्तियों का गायन उनके अनुसार अलग बात है, लेकिन पूरे गीत का सामूहिक पाठ “मजहबी मान्यताओं” के खिलाफ है।संविधान का हवाला: “अनुच्छेद 25 और 19 धार्मिक स्वतंत्रता देते हैं”
मदनी ने स्पष्ट किया कि भारत का संविधान सभी नागरिकों कोअनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रताऔर अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है।उन्होंने कहा,“ऐसी स्थिति में किसी भी समुदाय को पूरे वंदे मातरम् को गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इस संबंध में उच्चतम न्यायालय भी निर्णय दे चुका है।
टैगोर-नेहरू पत्राचार का ऐतिहासिक संदर्भ मौलाना मदनी ने 1937 का उल्लेख करते हुए कहा कि26 अक्टूबर 1937 को रवींद्रनाथ टैगोर ने जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर आग्रह किया था कि वंदे मातरम् की केवल शुरुआती दो पंक्तियों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया जाए।तीन दिन बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने टैगोर की सलाह को मान लिया।मदनी ने कहा कि यही परंपरा अब तक चली आ रही है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी इसका पूर्ण पाठ गाने पर ज़ोर दे रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का पलटवार: “राष्ट्रगीत पर धर्म खोजना खतरनाकप्रधानमंत्री की टिप्पणी पर मदनी की आपत्ति के बाद राजनीतिक विश्लेषकों ने उन पर कड़ा प्रहार किया है।वे कहते हैं कि:“मौलाना महमूद मदनी जिस तरह वंदे मातरम् जैसे राष्ट्रगीत में भी धर्म ढूँढ रहे हैं, वह विभाजनकारी और चिंताजनक है। राष्ट्रगीत किसी एक दल का नहीं, पूरे भारत का है।”
कुछ विश्लेषकों ने यह भी सवाल उठाया कि:“क्या पाकिस्तान या किसी इस्लामी देश में रहने वाले हिंदू हिम्मत करेंगे यह कहने की कि वहां का राष्ट्रगान उनके धर्म के अनुरूप नहीं? भारत जैसा धर्मनिरपेक्ष देश हमेशा सभी के विश्वासों का सम्मान करता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि राष्ट्रीय प्रतीकों पर लगातार आपत्ति जताई जाए।”उनके अनुसार देश अब“सैकुलर राजनीति के नाम पर अनंत सहनशीलता”के मूड में नहीं है।कांग्रेस और सेक्युलर दलों पर भी निशानाकुछ विशेषज्ञों ने आरोप लगाया कि यह स्थिति उसी राजनीति का परिणाम है
जिसमें रोहिंग्या मुसलमानों,बांग्लादेशी घुसपैठियोंको वोट-बैंक के लिए संरक्षण दिया गया।उनके अनुसार,“यह नीति देश को विभाजन की ओर ले जाती है, और वंदे मातरम् पर अनावश्यक विवाद उसी राजनीति का विस्तार है।”विवाद का सार और आगे की दिशावंदे मातरम् पर विवाद नया नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा पूर्ण पाठ के गायन का आग्रह और धार्मिक नेताओं की आपत्तियों ने इसे फिर गर्मा दिया है।एक तरफ सरकार इसे राष्ट्रीय आत्मसम्मान और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ रही है,तो दूसरी तरफ उलेमा इसे धार्मिक स्वतंत्रता और मजहबी सीमा-रेखा के दायरे में तौल रहे हैं।
आने वाले दिनों में यह विवाद संसद—सड़क—सोशल मीडिया तीनों जगह और गहरा असर छोड़ने वाला है।
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