बी के झा
NSK



नई दिल्ली , 8 दिसंबर
सदन के भीतर “वंदे मातरम्” के 150 वर्ष पूरे होने पर ऐतिहासिक बहस चली, लेकिन संसद के बाहर पूरा राजनीतिक परिदृश्य एक अलग ही तापमान पर था। एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस, जवाहरलाल नेहरू और मुस्लिम लीग पर तीखे तेवर दिखाए, वहीं विपक्षी दलों ने इस बहस को “जन मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास” करार दिया।इस पूरे घटनाक्रम ने भारतीय राजनीति में एक गहरा प्रश्न खड़ा कर दिया—क्या वंदे मातरम् पर विमर्श आज की जनता की पीड़ा का समाधान है, या लोकतंत्र में प्रतीकों की नई लड़ाई का आगाज़?
महबूबा मुफ्ती का तंज: “सदन में गीत की बहस, देश में जनता फँसी है”जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और PDP अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने केंद्र पर तीखा हमला किया।उनके बयान ने राजनीतिक हलकों में तीखी हलचल पैदा कर दी।उन्होंने लिखा:“संसद 150 साल पुराने गीत पर बहस में व्यस्त है और देश की सबसे बड़ी एयरलाइन हजारों यात्रियों को फंसा रही है। यह राजनीतिक नाटक बेरोजगारी, महंगाई या भारतीयों की वास्तविक समस्याओं को कैसे हल करेगा?”विश्लेषकों का कहना है कि मुफ्ती का बयान सिर्फ एक ट्वीट नहीं, बल्कि यह संदेश है कि प्रतीकवाद की राजनीति अब आम जनता की सांसों पर भारी पड़ रही है।
अखिलेश यादव का वार: “भाजपा राष्ट्रवादी नहीं, राष्ट्र-विवादी है”लोकसभा में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए कहा:वंदे मातरम् केवल गाने की चीज़ नहीं, निभाने की चीज़ है। पर आज ये लोग इसी के नाम पर समाज को तोड़ना चाहते हैं।उन्होंने तंज किया कि—“जिनके राजनीतिक पूर्वज आज़ादी की लड़ाई में थे ही नहीं, वे वंदे मातरम् की भावना क्या समझेंगे?”अखिलेश ने प्राथमिक विद्यालयों के एकीकरण और UP में स्कूल बंद होने का मुद्दा उठाया और कहा कि राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी परीक्षा बच्चों की शिक्षा है, न कि राजनीतिक नारे।
कांग्रेस का पलटवार: “मोदी जी जितनी कोशिश कर लें, नेहरू पर दाग नहीं लगा पाएंगे”कांग्रेस के उपनेता गौरव गोगोई ने संसद में जिस आक्रामक अंदाज में जवाब दिया, वह विपक्ष के भीतर नई ऊर्जा का संकेत माना जा रहा है।गोगोई ने कहा:“PM मोदी हर विषय में नेहरू का नाम जोड़ देते हैं। 1937 की बात करते हैं, लेकिन 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान उनके राजनीतिक पूर्वज कहाँ थे?”उन्होंने यह भी याद दिलाया:मौलाना आज़ाद ने वंदे मातरम् का समर्थन किया था मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा दोनों ने इसका विरोध किया था कांग्रेस ने अपने अधिवेशन में वंदे मातरम् गाने का निर्णय लिया था कांग्रेस का स्पष्ट संदेश—“इतिहास को तोड़-मरोड़कर वोटों की राजनीति नहीं हो सकती।
पीएम मोदी का प्रहार: “कांग्रेस ने वंदे मातरम् के टुकड़े किए”प्रधानमंत्री मोदी ने सदन में सारगर्भित और आक्रामक भाषण देते हुए कहा:“वंदे मातरम् केवल राजनीतिक मंत्र नहीं, यह मातृभूमि की मुक्ति का पवित्र युद्धघोष था।”“मुस्लिम लीग के दबाव में कांग्रेस ने इसके टुकड़े किए।”“नेहरू ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए वंदे मातरम् की समीक्षा शुरू कर दी थी।”“कांग्रेस वंदे मातरम् पर झुकी, इसलिए एक दिन भारत के बंटवारे पर भी झुक गई।”
PM मोदी ने 1975 के आपातकाल का भी उल्लेख किया और कहा कि—“जब गीत के 100 साल पूरे हुए, लोकतंत्र पर ताला लगा था।”सत्तापक्ष के सूत्रों का दावा है कि सरकार वंदे मातरम् को पूर्ण रूप से लागू करने पर विचार कर रही है, और विश्वस्त सूत्रों ने संकेत दिया कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी इसके पक्ष में हैं।
हिन्दू संगठनों का समर्थन और चेतावनी VHP, RSS से जुड़े कई संगठनों ने कहा:वंदे मातरम् भारतीय अस्मिता की आत्मा है। इसकी पूर्ण बहाली राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रश्न है।कुछ धारा यह भी कह रही है कि जो दल वंदे मातरम् का विरोध करते हैं,“वे वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठ ही नहीं पाए।”
राजनीतिक विश्लेषकों की राय: प्रतीक बनाम यथार्थ का संघर्ष राजनीतिक विश्लेषकों की तीन प्रमुख राय उभरी है:
1. भाजपा अपने कोर नैरेटिव को मजबूत कर रही है राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक गौरव और ऐतिहासिक अस्मिता—ये तीन मुद्दे सरकार के केंद्रीय स्तंभ हैं।
2. विपक्ष वास्तविक मुद्दों को बहस में लाना चाहता हैमहंगाई, बेरोजगारी, एयरलाइन संकट—ये जनता के तात्कालिक मुद्दे हैं।
3. वंदे मातरम् पर बहस आने वाले चुनावों का टोन सेट करेगी विशेषज्ञों के अनुसार 2026 की राजनीतिक हवा में यह प्रतीकात्मक राजनीति प्रमुख भूमिका निभाएगी
निष्कर्ष:
वंदे मातरम् की लड़ाई—सिर्फ गीत नहीं, राजनीति के भविष्य का संकेत आज का भारत एक दोराहे पर खड़ा है—एक ओर सांस्कृतिक अस्मिता का पुनरुद्धार, दूसरी ओर सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का पहाड़।वंदे मातरम् पर बहस एक गीत का सम्मान मात्र नहीं,बल्कि यह देश की राजनीति में प्रतीकों की शक्ति को समझने का नया अध्याय है।लेकिन अंतिम सवाल वही है—
क्या यह बहस जनता की रोज़मर्रा की तकलीफें खत्म करेगी?
या भारत का लोकतंत्र आने वाले वर्षों तक प्रतीकों और इतिहास की लड़ाई में ही उलझा रहेगा?
