बी के झा
NSK

नई दिल्ली/मुम्बई, 7 नवंबर
भारत का राष्ट्रगीत वंदे मातरम्—जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में लाखों भारतीयों को जोश से भर दिया, आज़ादी की जंग में जिसे मंत्र की तरह गाया गया—वही गीत आज राजनीति का सबसे चुभता हुआ तीर बन चुका है। महाराष्ट्र की भाजपा सरकार द्वारा स्कूलों में पूरा गीत गवाने के फैसले के बाद यह मुद्दा राष्ट्रव्यापी विवाद में बदल गया है। इसमें इतिहास भी है, राजनीति भी और कई दशकों पुरानी संवेदनशील बहस भी।यह विवाद केवल एक गीत का नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक संवेदनशीलता और राजनीतिक ध्रुवीकरण का आईना बन गया है।
सवाल उठ रहा है—क्या पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राजनीतिक कारणों से गीत के हिस्से हटवा दिए थे? और आज क्यों यह मुद्दा फिर चुनावी मौसम में अंगारों की तरह भड़क रहा है?
गीत की जड़ें:
संस्कृत, मातृभूमि और आनंदमठ की विरासत
वंदे मातरम् की रचना 1875 में बंगाल के महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। छह अनुच्छेद वाली यह कविता उनके क्रांतिकारी उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुई।गीत का शुरुआती हिस्सा—
जो आज गाया जाता है—
मातृभूमि की सौम्य छवि को दर्शाता है, जहाँ किसी देवी का उल्लेख नहीं है।लेकिन बाद के हिस्सों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे हिंदू देवी-रूपों का वर्णन है। यही वह बिंदु था जहाँ से धार्मिक स्वीकार्यता का विवाद शुरू हुआ। फिर भी, स्वतंत्रता संग्राम में वंदे मातरम् ऐसा हथियार बना कि अंग्रेजों तक को डर लगने लगा। यह नारा था, प्रेरणा था, प्रतिरोध का आग था।
1937: नेहरू-कांग्रेस का निर्णय—
विवाद की जड़साल 1937, कांग्रेस अधिवेशन—
नेतृत्व में थे पंडित नेहरू। मुस्लिम लीग सहित कई मुस्लिम संगठनों ने शिकायत दी कि गीत के अंतिम अंश धार्मिक उपासना जैसे हैं, जिसे इस्लामी मान्यताएँ स्वीकार नहीं करतीं।माहौल नाज़ुक था—हिंदू–मुस्लिम तनाव, धार्मिक पहचान की राजनीति और ब्रिटिश शासन की “फूट डालो” नीति पहले ही आग में घी डाल रही थी।इसी पृष्ठभूमि में कांग्रेस ने फ़ैसला किया:किसी भी राष्ट्रीय कार्यक्रम में केवल पहले दो पद ही गाए जाएंगे।
नेहरू के पास तर्क साफ़ था—गीत के अंतिम हिस्से प्रतीकात्मक रूप से भी धार्मिक उपासना का रूप लेते हैं, जिससे मुस्लिम समुदाय असहज हो सकता है।”यही फैसला आगे चलकर स्वतंत्र भारत में भी लागू रहा। आज़ादी के बाद भी राष्ट्रगीत के रूप में केवल दो पैरा ही अपनाए गए।
150 वर्ष का कार्यक्रम और नयी राजनीति गीत के 150 वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री ने बीजेपी कार्यक्रम में शामिल हुए और पूरा वंदे मातरम् पढ़ा। इसके बाद भाजपा ने कांग्रेस पर आरोपों की झड़ी लगा दी—
नेहरू ने गीत काट दिया कांग्रेस तुष्टिकरण की राजनीति करती रही इतिहास को कांग्रेस ने ही “खंड-खंड” किया भाजपा ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लिखे नेहरू के पुराने पत्र को भी सामने रखा, जिसमें नेहरू ने लिखा था कि “मुसलमान वंदे मातरम् से असहज महसूस कर सकते हैं।”
इस पर कांग्रेस का जवाब उतना ही तीखा—
खरगे ने कहा:जिस BJP–RSS ने आज़ादी के समय वंदे मातरम् तक नहीं गाया, वे आज राष्ट्रवाद के ठेकेदार बने फिरते हैं।
”विवाद की आग और भड़क उठी—अबू आज़मी के बयान सेऔर इसी बीच महाराष्ट्र से SP विधायक अबू आसिम आज़मी ने तेल में चिंगारी डाल दी।उन्होंने कहा:एक धार्मिक मुसलमान वंदे मातरम् नहीं गा सकता—
कोई मुझे मजबूर नहीं कर सकता।”साथ ही भाजपा को “भारत जलाओ पार्टी” कहकर माहौल और तीखा कर दिया।उनके बयान ने विवाद को केवल राजनीतिक नहीं, धार्मिक और सामाजिक बना दिया। भाजपा ने इसे “राष्ट्रगीत का अपमान” बताया, जबकि विपक्ष ने कहा कि व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता संविधान का अधिकार है।इतिहास के साथ राजनीति का खेल? साफ़ है कि वंदे मातरम् पर विवाद इतिहास से ज़्यादा राजनीति में जड़ें जमाए हुए है।एक तरफ BJP इसे राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक सम्मान का विषय बनाती है।दूसरी ओर कांग्रेस कहती है कि उसने गीत को “राजनीतिक हथियार” नहीं, बल्कि “समावेशी राष्ट्रवाद” के लिए संपादित किया था।समाजवादी धारा इसे धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा मानती है।
आज जब चुनावी माहौल हो, जब पड़ोसी मुल्कों के साथ तनाव हो, और जब देश में सांप्रदायिक मुद्दे सबसे जल्दी भड़कते हों—ऐसे में वंदे मातरम् विवाद राजनीति की प्रयोगशाला में सबसे आसान मसाला बन जाता है।
निष्कर्ष:
वंदे मातरम् सिर्फ गीत नहीं, भारत की आत्मा हैभले ही इतिहास में कितना ही काट-छाँट, विवाद या राजनीतिक तकरार हो—यह गीत आज भी“मां भारती का स्वर” है।यह वही रचना है जिसने अंग्रेजी साम्राज्य को चकनाचूर कर दिया, जिसने भगत सिंह, सावरकर, नेताजी, अशफ़ाक़ उल्ला खां और countless सेनानियों को मौत के मुँह में भी मुस्कुराने की ताकत दी।लेकिन जब यह गीत देशभक्ति से ज़्यादा राजनीति का हथियार बन जाए, तो यह चिंता का विषय है।वंदे मातरम् भारत की आत्मा है—इसे सम्मान चाहिए, शोर-शराबा नहीं।इसे साझेदारी चाहिए, सियासी विभाजन नहीं।और सबसे बढ़कर—इसका आदर भावों से होना चाहिए, ज़बरदस्ती से नहीं।
