विभागों की अदला-बदली में छिपा सत्ता संतुलन का बड़ा संदेश, सम्राट सरकार ने नए चेहरों से बदला प्रशासनिक चेहरा

बी के झा

पटना, 8 मई

बिहार की नई एनडीए सरकार का मंत्रिमंडल विस्तार केवल विभागों के बंटवारे का प्रशासनिक अभ्यास नहीं, बल्कि सत्ता संतुलन, राजनीतिक विश्वास और भविष्य की रणनीति का बेहद सोच-समझकर तैयार किया गया खाका माना जा रहा है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने विभागों के वितरण में ऐसा संतुलन साधने की कोशिश की है, जिसमें सहयोगी दलों की नाराजगी भी न बढ़े और भाजपा-जदयू के बीच शक्ति संतुलन भी कायम रहे।

नई सरकार में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत

भाजपा और जनता दल यूनाइटेड के बीच चार बड़े विभागों की अदला-बदली को लेकर सामने आया है। शिक्षा और उच्च शिक्षा जैसे प्रभावशाली विभाग जदयू से लेकर भाजपा को सौंप दिए गए, जबकि स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन विभाग भाजपा से लेकर जदयू के खाते में चले गए।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह बदलाव महज प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि “सत्ता के भीतर विश्वास और नियंत्रण” का संकेत है।

शिक्षा भाजपा के पास, स्वास्थ्य जदयू के हवाले

नई व्यवस्था में शिक्षा और उच्च शिक्षा विभाग भाजपा के नियंत्रण में चले गए हैं। बिहार जैसे राज्य में शिक्षा विभाग को राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसका सीधा असर युवाओं, नियुक्तियों और सामाजिक संदेश पर पड़ता है।वहीं स्वास्थ्य विभाग अब जदयू के हिस्से में आया है और इसकी जिम्मेदारी निशांत कुमार को दी गई है। यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि स्वास्थ्य विभाग सीधे जनता से जुड़ा हुआ मंत्रालय है और इसकी सफलता या विफलता सरकार की छवि तय करती है।आपदा प्रबंधन विभाग भी भाजपा से जदयू के पास चला गया है। बिहार में हर वर्ष बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं की चुनौती को देखते हुए यह विभाग राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है।

सम्राट चौधरी का संतुलन मॉडल

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने विभागों के वितरण में तीन स्तरों पर संतुलन साधने की कोशिश की है—

भाजपा और जदयू के बीच शक्ति संतुलन पुराने और नए चेहरों के बीच संतुलन अनुभव और युवा नेतृत्व का मिश्रणयही कारण है कि 29 विभागों में नए मंत्री नियुक्त किए गए हैं, जबकि केवल 19 विभागों में पुराने मंत्रियों को दोबारा वही जिम्मेदारी मिली है।यह स्पष्ट संकेत है कि सरकार प्रशासनिक शैली में बदलाव का संदेश देना चाहती है। हालांकि पूरी तरह प्रयोग करने के बजाय कुछ अनुभवी चेहरों को भी बरकरार रखा गया है ताकि सत्ता संचालन में स्थिरता बनी रहे।

सहयोगी दलों को “सम्मानजनक स्थिरता

”एनडीए के सहयोगी दलों के साथ सरकार ने “छेड़छाड़ से बचने” की रणनीति अपनाई है।राष्ट्रीय लोक मोर्चा के पास पहले की तरह पंचायती राज विभाग बना हुआ है।हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के हिस्से में लघु जल संसाधन विभाग ही रहा।जबकि लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को गन्ना उद्योग और लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग यथावत मिला है।इन दलों के मंत्रियों को भी नहीं बदला गया।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा और जदयू नहीं चाहते थे कि छोटे सहयोगी दलों में असंतोष पैदा हो, क्योंकि बिहार की राजनीति में छोटी नाराजगी भी बड़े समीकरण बिगाड़ सकती है।

22 वर्षों का रिकॉर्ड टूटा, बिजेंद्र यादव की जगह बुलो मंडल

इस मंत्रिमंडल विस्तार का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक बदलाव ऊर्जा विभाग में देखने को मिला।बिजेंद्र प्रसाद यादव ने लगभग 22 वर्षों तक ऊर्जा विभाग संभालकर एक रिकॉर्ड बनाया था। लालू प्रसाद सरकार में 1991 से 1995 तक ऊर्जा राज्यमंत्री रहने के बाद 2005 में बनी पहली एनडीए सरकार से लेकर लंबे समय तक वे ऊर्जा विभाग के सबसे प्रभावशाली चेहरे बने रहे।हालांकि इस बार ऊर्जा विभाग उनसे लेकर शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल को सौंप दिया गया।राजनीतिक गलियारों में इसे केवल विभागीय बदलाव नहीं, बल्कि “नई पीढ़ी और नई प्रशासनिक शैली” की ओर संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

नए चेहरों को मौका, लेकिन अनुभव का सहारा भी सरकार में सात मंत्रियों को पहली बार जिम्मेदारी दी गई है। वहीं कई पुराने मंत्रियों के विभाग बदलकर यह संदेश दिया गया है कि प्रदर्शन और राजनीतिक उपयोगिता के आधार पर सत्ता संरचना पुनर्गठित की जा रही है।मंत्रिमंडल में श्रेयसी सिंह, दीपक प्रकाश और निशांत कुमार जैसे अपेक्षाकृत नए चेहरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देकर भाजपा-जदयू गठबंधन ने भविष्य की राजनीति का संकेत देने की कोशिश की है।

शपथ ग्रहण का राजनीतिक संदेश

पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह केवल संवैधानिक औपचारिकता नहीं था।सबसे पहले श्रवण कुमार ने शपथ ली, जबकि सबसे आखिर में दीपक प्रकाश ने शपथ ग्रहण किया। राजनीतिक हलकों में इसे भी प्रतीकात्मक दृष्टि से देखा जा रहा है।समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की मौजूदगी ने इस विस्तार को राष्ट्रीय राजनीतिक महत्व दे दिया।

विपक्ष का हमला: “यह संतुलन नहीं, सत्ता प्रबंधन

”राष्ट्रीय जनता दल ने मंत्रिमंडल विस्तार को “सत्ता प्रबंधन का प्रयोग” बताया है। विपक्ष का आरोप है कि विभागों की अदला-बदली जनता के हित में नहीं, बल्कि गठबंधन के अंदरूनी समीकरण साधने के लिए की गई है।वहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सवाल उठाया कि यदि सरकार सचमुच प्रशासनिक सुधार चाहती है तो बार-बार विभाग बदलने से नीतियों की निरंतरता कैसे बनी रहेगी।

आने वाले समय की असली चुनौती

सम्राट चौधरी सरकार ने विभागों के वितरण में राजनीतिक संतुलन का संदेश जरूर दिया है, लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती प्रदर्शन की होगी।शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, रोजगार और आपदा प्रबंधन जैसे विभाग सीधे जनता के जीवन से जुड़े हैं। ऐसे में केवल चेहरे बदलने से नहीं, बल्कि जमीन पर परिणाम दिखाने से ही सरकार की विश्वसनीयता तय होगी।

फिलहाल इतना तय है कि बिहार की नई सत्ता संरचना में विभागों का यह फेरबदल आने वाले महीनों में राजनीति और प्रशासन दोनों की दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है।

NSK

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