बी के झा
NSK

पटना , 4 नवंबर
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग से ठीक पहले राज्य की सियासत में नया विवाद खड़ा हो गया है। महागठबंधन की सहयोगी भाकपा (माले) ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि आयोग ने संवेदनशील और अतिसंवेदनशील बूथों के चयन में भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया है।
पार्टी का कहना है कि गरीब, दलित और वंचित तबकों वाले क्षेत्रों के बूथों को जानबूझकर ‘अतिसंवेदनशील’ घोषित किया जा रहा है, ताकि वहां मतदाता दहशत में रहें और मतदान प्रतिशत घटे।“
हमने जो मांगा, आयोग ने उसका उल्टा किया” — CPI(ML)भाकपा-माले के राज्य सचिव कुणाल ने एक बयान जारी कर कहा कि तरारी विधानसभा क्षेत्र में पार्टी ने 47 बूथों को अतिसंवेदनशील घोषित करने की मांग की थी, लेकिन चुनाव पर्यवेक्षक ने उलटा फैसला लेते हुए 149 बूथों को इस श्रेणी में डाल दिया, जिनमें से अधिकांश बूथ दलित और गरीब बस्तियों में आते हैं।
कुणाल ने कहा—इन 149 बूथों पर पिछले चुनावों में कभी भी कोई व्यवधान नहीं हुआ था। बावजूद इसके इन्हें अतिसंवेदनशील बताकर प्रशासन वहां सुरक्षा बलों की तैनाती के नाम पर मतदाताओं में भय पैदा करना चाहता है। यह साफ तौर पर चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास है।
उन्होंने कहा कि पार्टी इस मामले को केंद्रीय चुनाव आयोग तक ले जाएगी, ताकि भेदभावपूर्ण बूथ चयन की समीक्षा हो और निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके।पहले चरण में 121 सीटों पर मतदान, 45,341 बूथों पर वेबकास्टिंगबिहार चुनाव के पहले चरण में 18 जिलों की 121 विधानसभा सीटों पर 6 नवंबर को मतदान होगा।
राज्य में कुल 90,740 मतदान केंद्र बनाए गए हैं।पहले चरण में 45,341 और दूसरे चरण में 45,399 बूथों पर वेबकास्टिंग प्रणाली लागू की जाएगी।
निर्वाचन आयोग ने बताया कि प्रत्येक बूथ पर कैमरे लगाए जाएंगे, जिनकी लाइव फीड राज्य नियंत्रण कक्ष, जिला निर्वाचन कार्यालय और केंद्रीय निगरानी कक्ष तक एक साथ पहुंचेगी। इससे चुनावी निगरानी और निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होगी।
CPI(ML) ने लगाया राजनीतिक दबाव का आरोप भाकपा (माले) ने आरोप लगाया है कि आयोग पर केंद्र सरकार का सीधा दबाव है। पार्टी का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के इशारे पर चुनाव आयोग बिहार में भाजपा-जेडीयू गठबंधन को लाभ पहुंचाने की कोशिश कर रहा है।
कुणाल ने कहा—
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि स्वतंत्र संवैधानिक संस्था होते हुए भी आयोग सत्ता के दबाव में काम कर रहा है।
लोकतंत्र में निष्पक्षता की सबसे बड़ी गारंटी अगर खुद आयोग खो दे, तो मतदाता का विश्वास टूट जाता है।
CPI(ML) इस साजिश का खुलकर विरोध करेगी।”
चुनावी समीकरण और संभावित असर
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह विवाद बिहार चुनाव में ‘निष्पक्षता बनाम प्रशासनिक पक्षपात’ की नई बहस को जन्म दे सकता है।
महागठबंधन पहले से ही जेडीयू-भाजपा पर राजनीतिक दखल के जरिए चुनावी मशीनरी को प्रभावित करने का आरोप लगाता रहा है।
अब माले के आरोपों ने इस मुद्दे को और गर्मा दिया है, खासकर ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में जहां माले का मजबूत जनाधार है।
निष्कर्ष
भरोसे की परीक्षा बन गया चुनावबूथ चयन को लेकर उठे इस विवाद ने बिहार चुनाव को सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि संविधानिक संस्थाओं के भरोसे की परीक्षा बना दिया है।चुनाव आयोग की साख अब इस पर टिकी है कि वह इन आरोपों का किस तरह से जवाब देता है और कितनी पारदर्शिता से मतदान प्रक्रिया को अंजाम देता है।
