बी के झा
NSK

पटना, 28 मार्च
बिहार की राजनीति में एक बार फिर वही पुराना सवाल सिर उठा रहा है—क्या सत्ता जनता के भरोसे चलती है या सत्ता की गणित से?Nitish Kumar का राज्यसभा जाना केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि उस जनादेश की परीक्षा है जिसे बिहार की जनता ने भारी भरोसे के साथ दिया था।2025 के चुनाव में जनता ने एक स्पष्ट संदेश दिया था—“नीतीश के नेतृत्व में स्थिर सरकार।”लेकिन अब, जब वही नेतृत्व बीच रास्ते में दिल्ली की ओर रुख कर रहा है, तो सवाल उठना लाजिमी है
:क्या यह राजनीतिक रणनीति है या जनादेश से सीधा विचलन? राजनीति या प्रयोगशाला?
Anand Mohan का बयान—“BJP को भारी पड़ेगा”—को केवल व्यक्तिगत नाराजगी मान लेना भूल होगी।यह उस व्यापक असंतोष का संकेत है जो सत्ता के गलियारों से निकलकर जनता के बीच आकार ले सकता है।जब जनता एक चेहरे पर वोट देती है और सत्ता किसी और के हाथ में सौंप दी जाती है, तो लोकतंत्र केवल प्रक्रिया बनकर रह जाता है—आत्मा खो देता है।
“चाणक्य नीति” या राजनीतिक जुआ?
बिना नाम लिए Amit Shah पर साधा गया निशाना इस बात की ओर इशारा करता है कि यह निर्णय केवल बिहार का नहीं, बल्कि दिल्ली की रणनीति का हिस्सा है।लेकिन इतिहास गवाह है—दिल्ली में बैठकर बिहार की राजनीति का समीकरण तय करना हमेशा जोखिम भरा रहा है।अगर यह कदम सत्ता संतुलन का “मास्टरस्ट्रोक” है, तो यह भी उतना ही सच है कि हर मास्टरस्ट्रोक, गलत समय पर, आत्मघाती चाल बन जाता है।
निशांत कुमार: उत्तराधिकार या अस्थायी समाधान?
Nishant Kumar को आगे लाने की चर्चा ने एक नई बहस छेड़ दी है—क्या यह लोकतांत्रिक उत्तराधिकार है या परिवारवाद का एक और अध्याय?
आनंद मोहन का यह कहना कि “उपमुख्यमंत्री का मतलब चुप मुख्यमंत्री होता है”सीधे उस राजनीति पर चोट करता है जहाँ असली शक्ति पर्दे के पीछे रहती है।
JDU और BJP: मजबूती का दावा, अंदरूनी असमंजस
Janata Dal United इसे रणनीतिक विस्तार बता रही है।Bharatiya Janata Party इसे “सामान्य प्रक्रिया” कह रही है।लेकिन सच्चाई यह है कि:जेडीयू को नेतृत्व संकट का सामना करना पड़ सकता है
BJP को जन असंतोष का सीधा सामना करना पड़ सकता है क्योंकि जनता के लिए राजनीति “रणनीति” नहीं, विश्वास होती है।
विपक्ष की चुप्पी नहीं, अवसर
Rashtriya Janata Dal और अन्य विपक्षी दलों के लिए यह मुद्दा “सत्ता परिवर्तन” से कहीं बड़ा है—यह उनके लिए जनता के विश्वास की लड़ाई बन सकता है।सबसे बड़ा सवाल: क्या जनता केवल दर्शक है?
लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब:फैसले ऊपर होते हैंऔर असर नीचे झेलना पड़ता है बिहार आज उसी मोड़ पर खड़ा है।
निष्कर्ष:
सत्ता का खेल या भरोसे की परीक्षा?
Nitish Kumar का यह कदम इतिहास में कैसे दर्ज होगा—एक दूरदर्शी रणनीति के रूप में या जनादेश से समझौते के रूप में—
यह आने वाला समय तय करेगा।लेकिन इतना तय है:अगर जनता को लगे कि उसका वोट केवल एक सीढ़ी था, मंजिल नहीं—तो राजनीति की सबसे मजबूत इमारत भी हिल सकती है।
राजनीति में कुर्सी बदलना आसान है,लेकिन भरोसा बदलना नहीं।
अगर यह निर्णय केवल सत्ता के लिए है,तो इसका जवाब भी सत्ता से ही मिलेगा—
लेकिन जनता के जरिए।
