समाज में जहाँ सीता हैं, वहाँ शूर्पणखा भी”— ‘प्रॉमिस टू मैरी’ रेप मामलों पर पूर्व CJI यूयू ललित की दोटूक बात

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 18 नवंबर

देश की न्याय व्यवस्था, विशेषकर यौन अपराधों और ‘शादी का झांसा देकर दुष्कर्म’ जैसे संवेदनशील मामलों पर पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से बढ़ती बहस के बीच, पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस यूयू ललित ने समाज और सिस्टम दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। ‘

एकम न्याय सम्मेलन’ में बोलते हुए उन्होंने कहा कि न्याय केवल दोषियों को सज़ा देने का नाम नहीं, बल्कि निर्दोषों को बेदाग़ बचाने का भी समान दायित्व है।जांच एजेंसियों की हालत पर सीधी चोट

जस्टिस ललित ने कहा कि देश में जांच अधिकारियों को न उचित प्रशिक्षण मिलता है, न आधुनिक उपकरण। नतीजा यह कि साक्ष्य जुटाने की शुरुआती प्रक्रिया ही कमजोर पड़ जाती है।

उन्होंने प्रकाश सिंह केस का उदाहरण देते हुए दोहराया कि जांच इकाई को कानून-व्यवस्था की शाखा से पूरी तरह अलग करना अब और भी आवश्यक हो गया है।उन्होंने चिंता जताई:देश में दोषसिद्धि दर कभी 20% के ऊपर नहीं गई 5 में से 4 विचाराधीन कैदी बरी हो जाते हैंऔर तब तक वे वर्षों जेल में अनचाही सज़ा भुगत चुके होते हैं

उन्होंने पूछा—“क्या हम निर्दोषों की ज़िंदगी बर्बाद नहीं कर रहे?

क्या समाज और न्याय प्रणाली का कर्तव्य केवल आरोप सुनकर गिरफ्तार करना है, या फिर सत्य तक पहुँचना भी उतना ही महत्वपूर्ण है?”“

समाज में सीता के साथ शूर्पणखा भी” — एक गहरी सामाजिक चेतावनी

सम्मेलन के आयोजकों और विशेष वक्ता दीपिका नारायण भारद्वाज के दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए जस्टिस ललित ने बेहद महत्वपूर्ण बात कही—

समाज में सीता मैया भी हैं और शूर्पणखा भी।

इसलिए जांच तंत्र इतना मजबूत होना चाहिए कि न किसी पीड़िता को न्याय से वंचित होना पड़े, न किसी निर्दोष पुरुष को झूठे आरोपों में घसीटा जाए।”

उन्होंने स्पष्ट किया कि बलात्कार मामलों में पीड़िता के बयान का सर्वोच्च महत्व बिल्कुल सही है लेकिन यदि आरोप झूठा साबित होता है तो ट्रायल कोर्ट को स्वयं ही झूठी शिकायतकर्ता के खिलाफ दंड दर्ज करने की शक्ति मिलनी चाहिए हर झूठी शिकायत के लिए अलग मुकदमा चलवाना न्यायिक बोझ बढ़ाता है और आरोपी को अनावश्यक परेशानी

‘प्रॉमिस टू मैरी’ रेप मामलों पर बढ़ती चिंताएँ

आज न्यायालयों में सबसे पेचीदा मामलों में से एक वे होते हैं जहाँ युवा प्रेम संबंध में होते हैं, संबंध टूटने के बाद वर्षों पुराने रिश्ते पर ‘शादी का झांसा देकर दुष्कर्म’ का आरोप लगाया जाता है।

इस पर जस्टिस ललित ने कहा:अक्सर युवक-युवती परिपक्व सहमति से संबंध बनाते हैं। बाद में विवाद होने पर शिकायत आती है कि शादी का वादा किया गया था।यह एक ग्रे एरिया है। ऐसे मामलों में बिना विचार किए गिरफ्तारी करना न कानून संगत है न न्याय संगतता।”

उन्होंने ज़ोर दिया कि पुलिस को ऐसे मामलों में बेहद संवेदनशील, सटीक और निष्पक्ष जांच की ज़रूरत है ताकि न किसी की आज़ादी छीनी जाए, न न्याय में विलंब हो।

शिक्षाविदों का समर्थन — “कुछ महिलाओं के कृत्यों ने समाज में अविश्वास पैदा किया”

एक वरिष्ठ शिक्षाविद् ने पूर्व CJI के विचारों का समर्थन करते हुए कहा—

भारत जैसे देश में जहाँ महिलाओं को शक्ति, सम्मान और मातृत्व का प्रतीक माना गया वहीं कुछ महिलाओं द्वारा किए गए झूठे आरोपों ने पूरे स्त्री समाज के प्रति अविश्वास का वातावरण बनाया है इसलिए समय आ गया है कि महिला संगठन स्वयं ऐसे दुरुपयोग करने वाली महिलाओं पर निगरानी रखें, ताकि वास्तविक पीड़िताओं का सम्मान और विश्वसनीयता दोनों सुरक्षित रहें

उन्होंने कहा—कानून अपना काम करता है, लेकिन लंबी प्रक्रिया के कारण कई निर्दोष व्यक्तियों को भारी मानसिक, सामाजिक और आर्थिक कष्ट झेलने पड़ते हैं। इसे बदलना ही होगा।

”सम्मेलन के संदेश—संतुलित न्याय ही वास्तविक न्याय

जस्टिस ललित ने ‘एकम न्याय सम्मेलन’ को समाज की आधुनिक जरूरत बताते हुए कहा कि यह मंच न्याय व्यवस्था में हो रहे वास्तविक मंथन को सामने लाता है।उन्होंने आयोजकों विशेषकर दीपिका नारायण भारद्वाज को सराहते हुए कहा कि ऐसे प्रयास समाज में संतुलित, संवेदनशील और जवाबदेह न्याय व्यवस्था की नींव रखते हैं।

निष्कर्ष

पूर्व मुख्य न्यायाधीश का यह वक्तव्य केवल महिलाओं, पुरुषों या पुलिस की बात नहीं करता—

यह पूरे समाज को एक ईमानदार आईना दिखाता है।

जहाँ न्याय का अर्थ है—दोषी को दंड और निर्दोष को सुरक्षा और दोनों में से किसी एक की उपेक्षा भी समाज के ताने-बाने को कमजोर कर देती है।

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