बी के झा
NSK

कोपेनहेगन / नई दिल्ली, 18 दिसंबर
यूरोप एक बार फिर उस चौराहे पर खड़ा है, जहाँ लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक समावेशन और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन तलाशना आसान नहीं रहा। डेनमार्क सरकार ने स्कूलों और यूनिवर्सिटी परिसरों में बुर्का और नक़ाब जैसे पूरे चेहरे को ढकने वाले इस्लामिक पहनावे पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव रखकर इसी बहस को नए सिरे से हवा दे दी है।यदि यह विधेयक संसद से पारित हो जाता है, तो डेनमार्क यूरोप का उन गिने-चुने देशों में शामिल हो जाएगा, जहाँ शिक्षा संस्थानों के भीतर धार्मिक परिधान पर सख़्त कानूनी रोक लागू होगी।
सरकार का तर्क: शिक्षा में चेहरा, पहचान और संवाद डेनमार्क के प्रवासन और एकीकरण मंत्री रासमस स्टोकलुंड ने प्रस्ताव का बचाव करते हुए दो टूक शब्दों में कहा—बुर्का, नक़ाब या ऐसा कोई भी पहनावा जो चेहरा ढकता है, डेनमार्क की कक्षाओं में उसकी कोई जगह नहीं है।”सरकार का मानना है कि शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं, बल्कि यह संवाद, अभिव्यक्ति और सामाजिक सहभागिता का माध्यम है। ऐसे में शिक्षक और छात्र के बीच चेहरा ढका होना विश्वास और पारदर्शिता के विरुद्ध जाता है।
लिबरल पार्टी (वेंस्ट्रे) के प्रवक्ता हान्स एंडरसन का तर्क और भी स्पष्ट है—यह डेनमार्क की परंपराओं के खिलाफ है कि शिक्षक पढ़ा रहे हों और छात्राओं का चेहरा ही न दिखे। महिलाओं का पूरी तरह ढका होना सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं हो सकता।”पहले से मौजूद प्रतिबंध और उसका विस्तार डेनमार्क ने अगस्त 2018 में सार्वजनिक स्थानों पर पूरे चेहरे को ढकने वाले परिधानों पर प्रतिबंध लगा दिया था। उस क़ानून के तहत बुर्का और नक़ाब पहनने पर जुर्माने का प्रावधान है।
अब सरकार का तर्क है कि—अगर सार्वजनिक जीवन में चेहरा ढकना स्वीकार्य नहीं,तो शिक्षा जैसे सार्वजनिक और संवेदनशील क्षेत्र में यह अपवाद क्यों हो?इसी सोच के तहत स्कूलों, कॉलेजों और यूनिवर्सिटी परिसरों तक प्रतिबंध बढ़ाने की तैयारी है।मानवाधिकार संगठनों का विरोध: ‘यह आज़ादी पर हमला है’सरकार के इस प्रस्ताव ने मानवाधिकार संगठनों और इस्लामिक समूहों को आक्रोशित कर दिया है।
उनका कहना है कि यह क़ानून—धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है महिलाओं की व्यक्तिगत पसंद पर हमला हैऔर अल्पसंख्यकों को और हाशिए पर धकेल सकता है
एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के शब्दों में—राज्य यह तय नहीं कर सकता कि कोई महिला अपनी आस्था को कैसे व्यक्त करे। यह स्वतंत्रता का मूल अधिकार है।”सरकार का जवाब: ‘सम्मान-आधारित दमन के ख़िलाफ़ क़दम’डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक सेन इस आलोचना से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि यह फ़ैसला महिलाओं को दबाने के लिए नहीं, बल्कि महिलाओं को सामाजिक नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए है।
उन्होंने जून में साफ़ कहा था—आपको आस्था रखने का अधिकार है, लेकिन लोकतंत्र को प्राथमिकता मिलेगी। हमने पहले बहुत सीमित प्रतिबंध लगाए, वह हमारी गलती थी।सरकार का दावा है कि कुछ समुदायों में लड़कियों और महिलाओं पर बुर्का या नक़ाब पहनने का सामाजिक दबाव होता है, और यह क़ानून उन्हें उस दबाव से बाहर निकलने का नैतिक व कानूनी सहारा देगा।यूरोप में बढ़ता ट्रेंड डेनमार्क अकेला नहीं है।
ऑस्ट्रिया ने हाल ही में 14 साल से कम उम्र की लड़कियों के लिए स्कूलों में हिजाब पर प्रतिबंध लागू किया है।फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड्स जैसे देश पहले से ही सार्वजनिक स्थानों पर चेहरे को ढकने वाले परिधानों पर रोक लगा चुके हैं।यूरोप में यह स्पष्ट संकेत है कि धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा अब और कठोर होती जा रही है।
बड़ी बहस: लोकतंत्र बनाम धार्मिक स्वतंत्रता डेनमार्क का यह प्रस्ताव केवल एक क़ानून नहीं, बल्कि एक वैचारिक घोषणा है—कि यूरोपीय लोकतंत्र अब सांस्कृतिक समावेशन को धार्मिक प्रतीकों से ऊपर रख रहे हैं।
समर्थकों के लिए यह—
सामाजिक एकीकरण
लैंगिक समानता
और खुले समाज की रक्षातो विरोधियों के लिए—
धार्मिक स्वतंत्रता का क्षरण
अल्पसंख्यकों का अलगाव और राज्य का अत्यधिक हस्तक्षेप
निष्कर्ष
: रास्ता आसान नहीं
डेनमार्क का फ़ैसला आने वाले समय में यूरोप भर में कानूनी और नैतिक बहस को और तेज़ करेगा। सवाल सिर्फ़ बुर्का या नक़ाब का नहीं है, सवाल यह है—क्या आधुनिक लोकतंत्र विविधताओं के साथ जीने को तैयार हैं, या वे एक समान सार्वजनिक संस्कृति थोपने की ओर बढ़ रहे हैं?डेनमार्क ने अपना रास्ता चुन लिया है।अब दुनिया देख रही है कि यह रास्ता समावेशन की ओर जाता है,या नए सामाजिक विभाजन की ओर।
