होर्मुज में गोलियां, खाड़ी में तनाव, फिर भी निकल गया ‘देश गरिमा’; भारतीय जहाजों पर मंडराता खतरा, विदेश नीति पर सियासी संग्राम तेज

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/मस्कट/तेहरान, 19 अप्रैल

दुनिया की ऊर्जा धुरी माने जाने वाले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव अपने चरम पर है। ईरान की ओर से जलमार्ग दोबारा बंद किए जाने और भारतीय ध्वज वाले जहाजों पर फायरिंग की घटनाओं के बीच एक भारतीय तेल टैंकर ‘देश गरिमा’ ने सफलतापूर्वक यह खतरनाक मार्ग पार कर लिया। लेकिन दूसरी ओर कई भारतीय जहाजों को रास्ता बदलना पड़ा और फारस की खाड़ी में भारतीय जहाजों की बढ़ती संख्या ने नई दिल्ली की चिंता बढ़ा दी है।

यह केवल समुद्री सुरक्षा का मामला नहीं रह गया है, बल्कि अब यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा, विदेश नीति, वैश्विक व्यापार और घरेलू राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है।

‘देश गरिमा’ ने पार किया संकट का दरवाजा

जहाज निगरानी आंकड़ों के अनुसार, भारतीय नौवाहन निगम (SCI) का तेल टैंकर ‘देश गरिमा’ शनिवार को होर्मुज जलडमरूमध्य पार कर ओमान की खाड़ी की ओर बढ़ गया। मार्च की शुरुआत से यह इस मार्ग को पार करने वाला भारतीय ध्वज वाला दसवां जहाज बताया जा रहा है।जहां एक ओर यह भारत के लिए राहत की खबर है, वहीं दूसरी ओर ‘सनमार हेराल्ड’, ‘देश वैभव’, ‘देश विभोर’ और मालवाहक पोत ‘जग अर्नव’ को फायरिंग और खतरे के संकेतों के बाद अपना रास्ता बदलना पड़ा।

खाड़ी में फंसे 14 भारतीय जहाज

रिपोर्टों के मुताबिक फारस की खाड़ी में इस समय 14 भारतीय ध्वज वाले जहाज मौजूद हैं। इनमें सरकारी और निजी दोनों कंपनियों के पोत शामिल हैं। यह संख्या इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि क्षेत्र में किसी भी सैन्य तनाव, नाकेबंदी या टकराव का सीधा असर भारत की आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है।ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह संकट लंबा खिंचता है तो भारत को तेल आयात लागत, बीमा प्रीमियम और माल भाड़े में भारी बढ़ोतरी झेलनी पड़ सकती है।

भारत ने जताई कड़ी आपत्ति

भारतीय जहाजों पर फायरिंग के बाद भारत सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए ईरानी राजदूत को तलब किया। विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने स्पष्ट कहा कि व्यापारिक जहाजों और भारतीय नाविकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।विदेश मंत्रालय ने यह भी याद दिलाया कि अतीत में ईरान ने भारत आने वाले जहाजों को सुरक्षित मार्ग दिया है, ऐसे में मौजूदा घटनाएं चिंताजनक हैं। भारत ने मांग की है कि होर्मुज से भारतीय जहाजों के सुरक्षित आवागमन की प्रक्रिया तुरंत बहाल की जाए।

रक्षा विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह हमला केवल जहाजों पर फायरिंग नहीं, बल्कि समुद्री शक्ति प्रदर्शन है।पूर्व नौसैनिक अधिकारियों का मानना है कि ईरान अमेरिका और पश्चिमी दबाव के जवाब में होर्मुज को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है।समुद्री सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि वाणिज्यिक जहाज आसान लक्ष्य होते हैं, इसलिए उन पर दबाव बनाकर वैश्विक संदेश दिया जाता है।विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को अरब सागर और ओमान की खाड़ी में नौसेना की उपस्थिति बढ़ानी चाहिए।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह संकट मोदी सरकार की विदेश नीति की अग्निपरीक्षा है।

भारत को एक साथ अमेरिका, ईरान, खाड़ी देशों और रूस जैसे साझेदारों के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा।विश्लेषकों का मानना है कि भारत की ताकत उसकी रणनीतिक स्वायत्तता रही है। यदि नई दिल्ली किसी एक धड़े के बहुत करीब दिखती है, तो क्षेत्रीय समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।

शिक्षाविदों का दृष्टिकोण

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के शिक्षाविदों का कहना है कि यह घटना बताती है कि 21वीं सदी में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि समुद्री मार्गों, व्यापारिक गलियारों और ऊर्जा आपूर्ति पर भी लड़े जाते हैं।उन्होंने कहा कि भारत को दीर्घकालिक नीति के तहत:

ऊर्जा स्रोतों का विविधी करण

सामरिक तेल भंडार बढ़ाना

समुद्री अध्ययन और नौवहन अनुसंधान को मजबूत करना

हिंद महासागर क्षेत्र में साझेदारी बढ़ाना जैसे कदम उठाने होंगे।

कानूनविदों की प्रतिक्रिया

अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों ने कहा कि व्यापारिक जहाजों पर फायरिंग समुद्री कानून और मुक्त नौवहन सिद्धांत के विरुद्ध मानी जा सकती है। यदि जहाज अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में थे, तो यह मामला संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठनों में उठाया जा सकता है।कानूनविदों का कहना है कि भारत चाहे तो:

अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) में शिकायत दर्ज करा सकता है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मुद्दा उठा सकता है।

प्रभावित कंपनियों के लिए क्षतिपूर्ति की मांग कर सकता है।

विपक्ष का तीखा हमला

घटना के बाद विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि भारत की पारंपरिक संतुलित कूटनीति कमजोर हुई है और अमेरिका के साथ अत्यधिक निकटता के कारण कई पुराने साझेदार देशों से दूरी बढ़ी है।

विपक्षी नेताओं ने कहा:

सरकार बताए कि भारतीय जहाजों को पर्याप्त सुरक्षा क्यों नहीं मिली?

क्या भारत क्षेत्रीय संकट को पहले भांपने में विफल रहा?

संसद में इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा कराई जाए।

सरकार के सामने विकल्प

भारत के सामने अब कई विकल्प हैं:

ईरान से औपचारिक सुरक्षा आश्वासन लेना

भारतीय नौसेना की एस्कॉर्ट व्यवस्था लागू करना

वैकल्पिक तेल मार्ग सक्रिय करना

रणनीतिक भंडार से आपूर्ति संतुलित करना

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दबाव बनाना

आम जनता पर क्या असर?

यदि होर्मुज संकट लंबा चला तो इसका असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है। पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, हवाई किराया, परिवहन लागत और महंगाई बढ़ने की आशंका है।

निष्कर्ष‘

देश गरिमा’ का सुरक्षित निकलना राहत है, लेकिन खाड़ी में फंसे भारतीय जहाज चेतावनी हैं कि संकट अभी टला नहीं है। गोलियों की आवाज और कूटनीति की भाषा के बीच भारत को अब निर्णायक, संतुलित और दूरदर्शी नीति अपनानी होगी।

आने वाले दिन तय करेंगे कि यह सिर्फ समुद्री तनाव था या वैश्विक शक्ति संघर्ष का नया अध्याय।

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