होर्मुज संकट के बीच भारत का उभरता समुद्री सितारा: विजिनजम पोर्ट पर दुनिया की नजर, शशि थरूर ने की खुलकर सराहना, ऊर्जा तनाव से जूझती दुनिया को मिला नया लॉजिस्टिक विकल्प, केरल का बंदरगाह बना रणनीतिक केंद्र

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम, 20 अप्रैल

पश्चिम एशिया में Strait of Hormuz को लेकर गहराते तनाव ने वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को असमंजस में डाल दिया है। दुनिया का बड़ा हिस्सा जिस समुद्री मार्ग पर निर्भर है, वहां संकट बढ़ते ही जहाजरानी कंपनियां वैकल्पिक मार्ग और सुरक्षित बंदरगाहों की तलाश में जुट गई हैं। इसी बीच भारत का निर्माणाधीन लेकिन तेजी से उभरता Vizhinjam International Seaport अचानक वैश्विक चर्चा के केंद्र में आ गया है।केरल से सांसद Shashi Tharoor ने इस बंदरगाह की उपलब्धियों की सराहना करते हुए कहा कि होर्मुज संकट के बीच दुनिया की नजर अब तिरुवनंतपुरम के विजिनजम पोर्ट पर टिक गई है। उनके अनुसार बड़ी संख्या में जहाज यहां पहुंच रहे हैं और कई पोत प्रवेश की प्रतीक्षा में कतारबद्ध हैं।

संकट में अवसर: भारत को मिला समुद्री लाभ

जहां एक ओर होर्मुज तनाव ने तेल बाजार, बीमा दरों और शिपिंग लागत को बढ़ाने की आशंका पैदा की है, वहीं दूसरी ओर भारत के लिए यह रणनीतिक अवसर बनकर उभरा है।विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक भारत अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट के लिए विदेशी बंदरगाहों—विशेषकर Port of Colombo और Port of Singapore—पर निर्भर रहा। अब विजिनजम इस निर्भरता को कम करने की क्षमता रखता है।

क्या है विजिनजम पोर्ट की खासियत?

Vizhinjam International Seaport भारत का पहला आधुनिक डीप-वॉटर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट माना जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां बड़े अंतरराष्ट्रीय कंटेनर जहाज सीधे आ सकते हैं, जिन्हें अतिरिक्त ड्रेजिंग या छोटे जहाजों पर निर्भरता की जरूरत कम पड़ती है।यह परियोजना वर्षों तक कागजों में अटकी रही, लेकिन 2015 के बाद इसके निर्माण ने गति पकड़ी। संचालन में Adani Group की भूमिका है, जबकि परियोजना में केरल सरकार की भी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है।

ट्रांसशिपमेंट पोर्ट क्यों जरूरी है?

ट्रांसशिपमेंट वह प्रक्रिया है जिसमें कंटेनरों को एक जहाज से दूसरे जहाज में स्थानांतरित कर अंतिम गंतव्य तक भेजा जाता है।इसका लाभ:

शिपिंग लागत में कमी

समय की बचत

बड़े जहाजों की बेहतर हैंडलिंग

निर्यात-आयात में दक्षता क्षेत्रीय व्यापार केंद्र के रूप में विकास भारत अब तक इस सुविधा के लिए विदेशी बंदरगाहों पर काफी निर्भर रहा है।विजिनजम उस व्यवस्था को बदलने की दिशा में कदम है।

शशि थरूर की खुली प्रशंसा

Shashi Tharoor ने कहा कि यह बंदरगाह अब केवल क्षेत्रीय परियोजना नहीं, बल्कि वैश्विक आवश्यकता बन चुका है। उन्होंने इसके कंटेनर हैंडलिंग प्रदर्शन, विस्तार कार्य और बढ़ती जहाज आवाजाही को भारत की समुद्री क्षमता का संकेत बताया।उनकी टिप्पणी ने राजनीतिक हलकों में भी चर्चा छेड़ दी, क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति में अक्सर केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखी बहस होती रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजिनजम पोर्ट केवल आर्थिक परियोजना नहीं, बल्कि “राष्ट्रीय क्षमता बनाम राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता” का उदाहरण बन गया है।वे कहते हैं:जब कोई परियोजना राष्ट्रीय हित से जुड़ती है, तो दलगत सीमाएं कमजोर पड़ जाती हैं।शशि थरूर की सराहना यह संकेत देती है कि विकास परियोजनाओं पर विपक्ष के भीतर भी अलग-अलग स्वर हैं।समुद्री अवसंरचना आने वाले दशक की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों तय करेगी।कुछ विश्लेषकों के अनुसार, भारत की वैश्विक भूमिका अब केवल कूटनीति से नहीं, बल्कि बंदरगाहों, सप्लाई चेन और समुद्री नेटवर्क से भी तय होगी।

शिक्षाविदों का दृष्टिकोण

अर्थशास्त्र और सार्वजनिक नीति से जुड़े शिक्षाविदों ने कहा कि विजिनजम जैसे बंदरगाह भारत के लिए “इंफ्रास्ट्रक्चर मल्टीप्लायर” साबित हो सकते हैं।

उनके अनुसार:इससे रोजगार बढ़ेगा

लॉजिस्टिक लागत घटेगी

निर्यात प्रतिस्पर्धा मजबूत होगी

तटीय क्षेत्रों का विकास होगा

समुद्री शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण को बढ़ावा मिलेगा

कुछ शिक्षाविदों ने यह भी कहा कि भारत को अब बंदरगाह-आधारित औद्योगिक कॉरिडोर और समुद्री विश्वविद्यालयों पर ध्यान देना चाहिए।

कानूनविदों की राय

कानून विशेषज्ञों का कहना है कि इतने बड़े बंदरगाहों के संचालन में केवल व्यापार नहीं, बल्कि कई कानूनी आयाम भी जुड़े होते हैं:

समुद्री सुरक्षा कानून

पर्यावरण स्वीकृति

तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) नियम

श्रम कानूनअंतरराष्ट्रीय शिपिंग

अनुबंधसीमा शुल्क और व्यापार अनुपालन

उनका कहना है कि यदि नियामक ढांचा पारदर्शी और स्थिर रहा, तो भारत वैश्विक निवेश आकर्षित कर सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों का विश्लेषण

रक्षा विशेषज्ञ विजिनजम को केवल व्यापारिक बंदरगाह नहीं, बल्कि सामरिक संपत्ति मानते हैं।उनके अनुसार:हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की उपस्थिति मजबूत होगी।समुद्री निगरानी और आपूर्ति क्षमता बढ़ेगी।संकट के समय वैकल्पिक लॉजिस्टिक केंद्र उपलब्ध होगा।क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में भारत की भूमिका मजबूत होगी।विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य के संघर्ष केवल सीमाओं पर नहीं, समुद्री मार्गों और व्यापार गलियारों पर भी तय होंगे।

राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया , सत्तापक्ष का रुख

सत्तारूढ़ पक्ष ने इसे भारत की दीर्घकालिक समुद्री दृष्टि, अवसंरचना निवेश और वैश्विक नेतृत्व क्षमता का परिणाम बताया।

विपक्ष की प्रतिक्रिया

विपक्ष के भीतर मिश्रित स्वर देखने को मिले। कुछ नेताओं ने परियोजना का स्वागत किया, जबकि कुछ ने लागत, स्थानीय प्रभाव और पर्यावरणीय चिंताओं पर सवाल उठाए।क्षेत्रीय दलों की मांग दक्षिण भारत के कई क्षेत्रीय नेताओं ने कहा कि तटीय राज्यों को राष्ट्रीय समुद्री रणनीति में अधिक भागीदारी और संसाधन मिलने चाहिए।

कांग्रेस के भीतर संदेश?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि जब राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र की विदेश और आर्थिक नीतियों पर आलोचना होती है, उसी समय Shashi Tharoor जैसे वरिष्ठ नेता कुछ परियोजनाओं की खुली प्रशंसा करते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि विकास और रणनीतिक मुद्दों पर विपक्ष के भीतर भी विचारों की विविधता मौजूद है।

निष्कर्ष

होर्मुज संकट ने दुनिया को याद दिलाया है कि वैश्विक व्यापार कुछ समुद्री गलियारों पर कितना निर्भर है। लेकिन इसी संकट ने भारत को अवसर भी दिया है। विजिनजम पोर्ट उस अवसर का प्रतीक बनकर उभरा है—जहां भू-राजनीति, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय रणनीति एक साथ मिलती हैं।यदि गति, नीति और प्रबंधन सही रहे, तो विजिनजम केवल एक बंदरगाह नहीं रहेगा—

वह भारत की समुद्री शक्ति का नया घोष बनेगा।

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