बी के झा
NSK




आबू धाबी/ न ई दिल्ली, 15 मई
वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने एक बार फिर अपनी सक्रिय और प्रभावशाली कूटनीति का परिचय दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को संयुक्त अरब अमीरात यानी संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी पहुंचे, जहां उनका ऐसा भव्य स्वागत हुआ जिसने भारत-यूएई संबंधों की गहराई को पूरी दुनिया के सामने प्रदर्शित कर दिया।जैसे ही प्रधानमंत्री मोदी का विशेष विमान यूएई के हवाई क्षेत्र में दाखिल हुआ, यूएई वायुसेना के अत्याधुनिक F-16 लड़ाकू विमानों ने उसे सुरक्षा और सम्मान के तौर पर एस्कॉर्ट किया।
यह दृश्य केवल औपचारिक सैन्य सम्मान नहीं था, बल्कि भारत और यूएई के बीच बढ़ते रणनीतिक विश्वास और मजबूत साझेदारी का प्रतीक माना जा रहा है।अबू धाबी एयरपोर्ट पर यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान स्वयं प्रधानमंत्री मोदी की अगवानी के लिए मौजूद रहे। दोनों नेताओं के बीच गर्मजोशी साफ झलक रही थी।
पीएम मोदी को “गार्ड ऑफ ऑनर” भी दिया गया, जिसने इस यात्रा के महत्व को और बढ़ा दिया।यह यात्रा प्रधानमंत्री मोदी के पांच देशों के महत्वपूर्ण विदेश दौरे का पहला चरण है। 15 से 20 मई तक चलने वाले इस दौरे में वह यूएई के अलावा नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली का भी दौरा करेंगे। माना जा रहा है कि यह यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत की रणनीतिक भूमिका को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है।
ऊर्जा सुरक्षा बना सबसे बड़ा एजेंडा
इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ऊर्जा सुरक्षा को माना जा रहा है। पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान तनाव और “स्ट्रेट ऑफ होर्मुज” पर बढ़ते खतरे ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत पेट्रोलियम सप्लाई इसी समुद्री मार्ग से गुजरती है।भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर काफी हद तक निर्भर है। ऐसे में कच्चे तेल और गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना भारत की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल हो गया है।
सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति बिन जायद के बीच हुई वार्ता में एलपीजी सप्लाई, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार और ऊर्जा सहयोग को लेकर कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई।भारत और यूएई के बीच दो अहम समझौतों को अंतिम रूप दिए जाने की भी संभावना जताई जा रही है। इनमें तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) आपूर्ति और रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व में सहयोग बढ़ाने पर विशेष जोर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया संकट और गहराता है तो ऐसे समझौते भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद अहम साबित होंगे।
IMEC और AI पर भी नजर
ऊर्जा के अलावा इस उच्चस्तरीय वार्ता का फोकस टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे यानी IMEC परियोजना पर भी रहा। IMEC को चीन की बेल्ट एंड रोड पहल के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।भारत और यूएई दोनों इस परियोजना को व्यापार, कनेक्टिविटी और वैश्विक सप्लाई चेन के लिहाज से गेमचेंजर मान रहे हैं।
जानकारों के अनुसार, यदि यह कॉरिडोर पूरी तरह विकसित होता है तो भारत को यूरोप और पश्चिम एशिया के बाजारों तक तेज और रणनीतिक पहुंच मिल सकती है।
बदलते वैश्विक संकट में भारत की भूमिका प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब पश्चिम एशिया युद्ध, ऊर्जा संकट और वैश्विक सप्लाई चेन में अस्थिरता का केंद्र बन चुका है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेल की कीमतों को अस्थिर कर दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत अब केवल एक उपभोक्ता देश की भूमिका में नहीं रहना चाहता, बल्कि वह वैश्विक ऊर्जा और रणनीतिक स्थिरता में निर्णायक भागीदारी निभाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यही वजह है कि भारत खाड़ी देशों, यूरोप और पश्चिमी शक्तियों—सभी के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
दुनिया को भारत का संदेश
विशेषज्ञों के अनुसार, अबू धाबी में प्रधानमंत्री मोदी का जिस तरह स्वागत हुआ, वह केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती ताकत और विश्वसनीयता का संकेत है।यूएई के राष्ट्रपति का खुद एयरपोर्ट पहुंचना, F-16 फाइटर जेट्स का एस्कॉर्ट और रणनीतिक समझौतों पर गहन चर्चा—इन सभी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत और यूएई के रिश्ते अब पारंपरिक व्यापारिक संबंधों से आगे बढ़कर सामरिक साझेदारी के नए दौर में प्रवेश कर चुके हैं।
स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री मोदी की यह विदेश यात्रा केवल एक राजनयिक दौरा नहीं, बल्कि वैश्विक संकटों के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक हितों और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को मजबूत करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
