काला कोट पहन लेने से कोई वकील नहीं बन जाता” : CJI सूर्यकांत की सख्त टिप्पणी से न्यायिक गलियारों में हड़कंप, फर्जी डिग्रियों पर CBI जांच के संकेत

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 15 मई

देश की सर्वोच्च अदालत से शुक्रवार को ऐसी तल्ख टिप्पणी सामने आई, जिसने न्यायिक व्यवस्था, वकालत की गरिमा और फर्जी डिग्री के कारोबार पर एक साथ बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान तीखी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि “काला कोट पहनकर हजारों फर्जी लोग घूम रहे हैं, जिनकी डिग्रियों पर गंभीर संदेह है। इस मामले में सीबीआई को कुछ करना चाहिए।

”सीजेआई की यह टिप्पणी केवल एक अदालत की नाराजगी नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे न्यायिक व्यवस्था में बढ़ती अव्यवस्था, पेशेवर अनुशासनहीनता और फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के बढ़ते जाल पर सुप्रीम कोर्ट की गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।

दरअसल मामला दिल्ली हाईकोर्ट में “सीनियर एडवोकेट” की नियुक्ति से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों को लागू करने में कथित देरी को लेकर दाखिल अवमानना याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता वकील ने अदालत में दावा किया कि वह तीसरी बार इस मुद्दे को उठा रहे हैं और हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का पालन नहीं कर रहा।

लेकिन सुनवाई के दौरान अदालत का धैर्य टूटता नजर आया। सीजेआई सूर्यकांत ने बेहद सख्त लहजे में कहा, “पूरी दुनिया वरिष्ठ पद के लिए पात्र हो सकती है, लेकिन कम-से-कम आप तो नहीं। अगर हाईकोर्ट आपको सीनियर घोषित करता है, तो आपके व्यवहार को देखते हुए हम उसे रद्द कर देंगे।

”अदालत की टिप्पणी यहीं नहीं रुकी। सीजेआई ने वकील के सोशल मीडिया व्यवहार पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि लोगों को यह जानना चाहिए कि फेसबुक जैसी जगहों पर किस तरह की भाषा इस्तेमाल की जा रही है।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वकालत केवल काला कोट पहन लेने का नाम नहीं, बल्कि अनुशासन, गरिमा और न्यायिक जिम्मेदारी का पेशा है।सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाला बागची ने भी तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा, “क्या ‘सीनियर एडवोकेट’ का टैग केवल स्टेटस सिंबल बनकर रह गया है, जिसे सजाकर रखा जाए, या फिर यह न्याय व्यवस्था में आपकी गंभीर भागीदारी और जिम्मेदारी का प्रतीक है?”

फर्जी डिग्रियों पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता

सुनवाई के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा उस वक्त हुई, जब सीजेआई ने संकेत दिया कि वह ऐसे किसी उचित मामले का इंतजार कर रहे हैं, जिसमें दिल्ली समेत कई वकीलों की एलएलबी डिग्रियों की जांच के लिए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को आदेश दिया जा सके।कानूनी हलकों में इस टिप्पणी को बेहद गंभीर माना जा रहा है। लंबे समय से यह आरोप लगते रहे हैं कि देश के कुछ निजी संस्थानों और संदिग्ध लॉ कॉलेजों से फर्जी या संदिग्ध डिग्रियों के सहारे लोग वकालत के पेशे में प्रवेश कर रहे हैं।

हालांकि इस पर बड़े स्तर की जांच शायद ही कभी हुई हो।सीजेआई की टिप्पणी के बाद अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या देश में वकालत की पढ़ाई और बार काउंसिल में पंजीकरण की प्रक्रिया को और सख्त बनाए जाने की जरूरत है।

न्यायपालिका पर बढ़ते हमलों पर भी चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान न्यायपालिका की गरिमा पर लगातार हो रहे हमलों पर भी चिंता जताई। सीजेआई ने कहा कि कुछ “परजीवी तत्व” न्यायपालिका को निशाना बना रहे हैं और वकीलों को ऐसे लोगों के साथ खड़ा नहीं होना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह टिप्पणी केवल एक व्यक्ति विशेष के लिए नहीं थी, बल्कि उस बढ़ती प्रवृत्ति पर प्रहार थी जिसमें अदालतों और न्यायाधीशों को सोशल मीडिया ट्रायल, राजनीतिक बयानबाजी और व्यक्तिगत हमलों का निशाना बनाया जा रहा है।

कानूनी विशेषज्ञों की राय

वरिष्ठ कानूनविदों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह सख्ती जरूरी थी। उनके अनुसार, वकालत केवल रोजगार नहीं बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी वाला पेशा है। यदि फर्जी डिग्रियों या अनुशासनहीन व्यवहार वाले लोग अदालतों तक पहुंचते हैं तो इससे न्यायपालिका की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।कुछ कानूनी विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि देशभर के लॉ कॉलेजों, बार काउंसिल पंजीकरण और डिग्री सत्यापन की व्यापक समीक्षा का समय आ चुका है। उनका मानना है कि तकनीकी सत्यापन और केंद्रीकृत डिजिटल रिकॉर्ड सिस्टम लागू कर फर्जीवाड़े पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती है।

वकील ने मांगी माफी, अदालत ने नरमी दिखाई

सख्त टिप्पणियों के बाद याचिकाकर्ता वकील ने अदालत से माफी मांग ली। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपने कुछ कठोर आदेश वापस ले लिए। वकील ने अदालत को बताया कि वह अपने पेशे को लेकर गंभीर हैं और उनके कई मामले उसी दिन सूचीबद्ध हैं।

हालांकि अदालत की टिप्पणियां अब देशभर में चर्चा का विषय बन चुकी हैं। न्यायिक गलियारों में इसे “बार और बेंच दोनों के लिए चेतावनी” माना जा रहा है।

बड़ा सवाल :

क्या अब होगी सफाई?

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने एक बार फिर उस बड़े सवाल को सामने ला दिया है कि क्या न्याय व्यवस्था में प्रवेश की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और विश्वसनीय है?

क्या केवल डिग्री हासिल कर लेना पर्याप्त है या फिर पेशेवर नैतिकता और अनुशासन भी उतना ही जरूरी है?

स्पष्ट है कि सुप्रीम Court का संदेश बेहद साफ है—वकालत सम्मान का पेशा है, प्रदर्शन का नहीं।

और यदि काले कोट की आड़ में फर्जीवाड़ा या अनुशासनहीनता पनपेगी, तो देश की सर्वोच्च अदालत अब उसे नजरअंदाज करने के मूड में नहीं दिख रही।

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