क्या खत्म होने जा रहा है कॉलेजियम सिस्टम? CJI सूर्यकांत के संकेत से कानून जगत में हलचल, केंद्र सरकार सतर्क

बी के झा

NSK

नई दिल्ली , 27 नवंबर

भारत के नए प्रधान न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत ने शपथ लिए अभी मुश्किल से कुछ दिन ही बीते हैं कि उन्होंने देश की न्यायिक नियुक्ति प्रणाली पर ऐसी टिप्पणी कर दी है जिसने राजनीतिक गलियारों से लेकर न्यायपालिका, लॉ कॉलेजों, संवैधानिक विशेषज्ञों और सरकार तक सबको चौकन्ना कर दिया है।वकील मैथ्यूज़ नेदुमपारा की याचिका पर उन्होंने कहा—“हम एनजेएसी पर विचार करेंगे।”

यही एक वाक्य, वर्षों से बहस के केंद्र रहे कॉलेजियम बनाम एनजेएसी विवाद को फिर से जीवित करने के लिए पर्याप्त था।क्या वाकई कॉलेजियम सिस्टम खत्म होने की दिशा में कदम? देश की उच्च अदालतों में जजों की नियुक्ति आज भी उसी व्यवस्था से होती है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने “सुधार की जरूरत वाला लेकिन संविधान‌ सम्मत” कहा था।2015 में पांच-न्यायाधीशीय संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से एनजेएसी को असंवैधानिक ठहराते हुए कॉलेजियम प्रणाली को बहाल कर दिया था।लेकिन कोर्ट ने वहीँ यह भी स्वीकार किया था कि—कॉलेजियम सिस्टम पूर्णत: पारदर्शी नहीं है और इसे सुधारने की जरूरत है।”

सालों से यह विवाद चल रहा है कि क्या जज स्वयं जजों की नियुक्ति करें या लोकतंत्र में सरकार और जनता की भूमिका भी होनी चाहिए।

सीजेआई सूर्यकांत का संकेत—कई परतों में छिपा संदेश सुनवाई के दौरान जब वकील ने कहा कि पिछली बेंचों ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया, तो सीजेआई सूर्यकांत मुस्कराकर हिंदी में बोले—“

हम हिंदी में बात करेंगे…जानबूझकर कर रहे हो तुम…हम हिंदी में जवाब देंगे।”यह एक हल्की हँसी-मजाक भरी टिप्पणी थी, लेकिन उनके अगले वाक्य “हम याचिका पर विचार करेंगे” ने पूरे देश में चर्चा छेड़ दी।

कानून विशेषज्ञ मानते हैं कि यह केवल एक “रूटीन ऑब्जर्वेशन” नहीं, बल्कि एक नई सोच की झलक भी हो सकता है।

केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया—‘सावधानी से आगे बढ़ेंगे’केंद्र सरकार ने आधिकारिक बयान न देते हुए भी संकेत दिया है कि—एनजेएसी सरकार का संसदीय रूप से पारित मॉडल थासुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक कहा था, लेकिन“यदि सर्वोच्च न्यायालय स्वयं पुनर्विचार की ओर बढ़ रहा है, तो यह स्वागत योग्य है”सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने

पृष्ठभूमि

बातचीत में कहा:लोकतंत्र में पारदर्शिता सर्वोपरि है। यदि सीजेआई स्वयं यह विषय खोल रहे हैं, तो नए समाधान निकल सकते हैं।कानून विशेषज्ञों की राय—‘भारत की न्यायिक संरचना एक निर्णायक मोड़ पर’विशेषज्ञ यह मानते हैं कि यह दो-तीन बातों का संकेत है

: न्यायपालिका खुद अपने सिस्टम पर पुनर्विचार को तैयारसालों से कॉलेजियम को “opaque”, “exclusive” और “accountability-less” कहकर आलोचना की जाती रही है।

एक नया हाइब्रिड मॉडल संभवकुछ विशेषज्ञ “ज्यूडिशियल-एग्जीक्यूटिव कॉम्बाइन” की बात कर रहे हैं—एक ऐसा मॉडल जिसमेंजजसरकारसिविल सोसाइटी के प्रतिनिधिसभी शामिल हों।

संविधान दिवस पर यह टिप्पणी—संदेश का वज़न बढ़ाता है यह बयान सामान्य दिन में आता तो कम हलचल होती,लेकिन 76वें संविधान दिवस पर आया—इसलिए इसकी राजनीतिक-संवैधानिक अर्थवत्ता बढ़ गई।जजों की प्रतिक्रिया—‘सिस्टम में सुधार आवश्यक’कई वरिष्ठ जजों ने निजी तौर पर कहा है कि—कॉलेजियम में दूरदर्शिता व अनुभव है,लेकिन पारदर्शिता की कमी ने इस सिस्टम की जनता में छवि कमजोर की है।एक पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज का बयान खास है:

“न्यायपालिका को जनता के प्रति जवाबदेह रहना होगा। नियुक्ति प्रणाली को आधुनिक समय के अनुरूप बनाना अब अनिवार्य है।”क्या सचमुच कॉलेजियम सिस्टम खत्म होने वाला है?या ये केवल ‘एक शुरुआती संकेत’ है?**सही तस्वीर अभी अस्पष्ट है, क्योंकि:कोर्ट ने औपचारिक रूप से पुनर्विचार की प्रक्रिया शुरू नहीं कीसरकार किसी टकराव की मुद्रा में नहीं है

विशेषज्ञ भी कहते हैं कि “पूरा बदलाव एक दिन में नहीं आएगा”लेकिन इतना तय है कि— भारत की न्यायिक नियुक्ति प्रणाली अब ठहरे हुए पानी की तरह नहीं है।इसमें हलचल शुरू हो चुकी है—and शायद एक बड़े बदलाव से पहले की हलचल।निष्कर्ष: न्यायपालिका का नया अध्याय लिखने की तैयारी?सीजेआई सूर्यकांत का कार्यकाल भले लंबा न हो,लेकिन उनकी यह टिप्पणी भारतीय न्याय व्यवस्था में नए विमर्श और संभावित संरचनात्मक बदलाव की जमीन तैयार कर गई है।अब पूरी निगाहें इस पर होंगी कि—क्या कोर्ट एनजेएसी पर औपचारिक सुनवाई शुरू करता है

क्या सरकार एक संशोधित मॉडल लाती हैया कॉलेजियम सिस्टम में “गहन सुधार” ही समाधान बनता हैलेकिन यह निश्चित है कि भारतीय लोकतंत्र एक निर्णायक बहस की ओर बढ़ चुका है।

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