बिहार में इंफ्रास्ट्रक्चर की नई इबारत या राजनीतिक संदेश? कोइलवर में सोन नदी पर देश का दूसरा फोरलेन रेल पुल—विकास बनाम वादों की राजनीति

बी के झा

NSK News

पटना, 2 अप्रैल

बिहार के बुनियादी ढांचे को नई ऊंचाई देने की दिशा में एक महत्वाकांक्षी पहल सामने आई है। कोइलवर के पास सोन नदी पर देश का दूसरा चार लेन (फोरलेन) रेल पुल बनाने की योजना ने न केवल तकनीकी बल्कि राजनीतिक हलकों में भी हलचल तेज कर दी है। पूर्व मध्य रेलवे द्वारा इस प्रस्ताव को रेलवे बोर्ड के पास भेजा गया है और अनुमान है कि इस परियोजना पर लगभग 3500 से 4000 करोड़ रुपये की लागत आएगी।यह पुल मौजूदा ऐतिहासिक कोइलवर रेल पुल के समानांतर बनाया जाएगा। योजना के अनुसार, नए और पुराने पुल को मिलाकर एक साथ तीन-तीन ट्रेनों का आवागमन संभव हो सकेगा। अभी की स्थिति में, दो लाइन होने के कारण एक समय में केवल एक-एक ट्रेन अप और डाउन दिशा में चल पाती है, जिससे हावड़ा-पटना-डीडीयू रेलखंड पर भारी दबाव बना रहता है।

तकनीकी जरूरत या चुनावी रणनीति?

रेलवे का तर्क साफ है—देश में सेमी हाई-स्पीड ट्रेनों के संचालन के लिए मौजूदा ट्रैक और पुल अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। हाल ही में डीडीयू (पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन) से गया होते हुए प्रधानखांटा तक 180 किमी/घंटा की रफ्तार से सफल ट्रायल इस दिशा में संकेत देता है कि रेलवे अब गति और क्षमता दोनों बढ़ाना चाहता है।इसके साथ ही डीडीयू से झाझा तक तीसरी और चौथी लाइन के निर्माण की योजना (लगभग 17 हजार करोड़ रुपये) भी इसी व्यापक विस्तार रणनीति का हिस्सा है। फतुहा से किऊल तक 3600 करोड़ रुपये की परियोजना को मंजूरी मिल चुकी है, जबकि अन्य खंड अभी स्वीकृति के इंतजार में हैं।

विपक्ष का हमला: “घोषणाओं का पुल, हकीकत दूर”

जहां सत्तापक्ष इसे बिहार के विकास की बड़ी छलांग बता रहा है, वहीं विपक्ष ने इसे चुनावी साल में “बड़ी घोषणा, छोटी तैयारी” करार दिया है।राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेताओं का कहना है कि—“बिहार में वर्षों से अधूरी पड़ी रेलवे परियोजनाओं की लंबी सूची है। हर चुनाव से पहले नई घोषणाएं कर दी जाती हैं, लेकिन जमीन पर काम की रफ्तार बेहद धीमी रहती है।”वहीं कांग्रेस ने भी सवाल उठाया कि—“जब तीसरी और चौथी लाइन की परियोजनाएं अब तक स्वीकृति के लिए लंबित हैं, तो नए फोरलेन पुल की घोषणा कितनी व्यावहारिक है?

क्या यह केवल राजनीतिक संदेश देने का प्रयास नहीं?

”वाम दलों ने इसे “इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर केंद्र की प्राथमिकता राजनीति” बताया और मांग की कि पहले लंबित परियोजनाओं को पूरा किया जाए।

सत्तापक्ष का जवाब: “विजन 2040 की नींव”

जदयू और भाजपा नेताओं का कहना है कि यह परियोजना बिहार को राष्ट्रीय रेल नेटवर्क में एक मजबूत केंद्र बनाएगी। उनके अनुसार—इससे माल ढुलाई और यात्री ट्रेनों दोनों की गति बढ़ेगी समय पालन (punctuality) में सुधार होगाऔद्योगिक निवेश को बढ़ावा मिलेगा सत्तापक्ष इसे “विजन 2040” का हिस्सा बता रहा है, जहां बिहार को लॉजिस्टिक्स हब के रूप में विकसित करने की योजना है।

स्थानीय जनता की उम्मीदें और सवाल

कोइलवर और आसपास के क्षेत्रों में इस योजना को लेकर उत्साह जरूर है, लेकिन लोगों के मन में कुछ व्यावहारिक सवाल भी हैं—

क्या भूमि अधिग्रहण समय पर होगा?

क्या परियोजना तय समय में पूरी हो पाएगी?

क्या स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ेंगे?

निष्कर्ष:

विकास की राह पर राजनीति की परछाईं

कोइलवर में सोन नदी पर प्रस्तावित फोरलेन रेल पुल निश्चित रूप से बिहार के इंफ्रास्ट्रक्चर में ऐतिहासिक बदलाव ला सकता है। लेकिन भारत की राजनीति में हर बड़ी परियोजना की तरह, यह भी विकास और राजनीति के संगम का उदाहरण बनती दिख रही है।अब नजर रेलवे बोर्ड और केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी पर टिकी है। यदि यह परियोजना समय पर धरातल पर उतरती है, तो यह न केवल रेल यातायात की तस्वीर बदलेगी, बल्कि बिहार की आर्थिक दिशा भी तय कर सकती है।लेकिन यदि यह भी अन्य योजनाओं की तरह फाइलों में उलझ गई, तो विपक्ष के आरोप और मजबूत होंगे।

आखिरकार, पुल सिर्फ नदियों को नहीं जोड़ते—वे वादों और विश्वास के बीच की दूरी भी तय करते हैं।

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