बी के झा
NSK

नई दिल्ली , 23 अप्रैल
पूर्वी लद्दाख की बर्फीली ऊंचाइयों पर जून 2020 में जो कुछ हुआ, वह केवल एक सैन्य झड़प नहीं थी—वह भारत-चीन संबंधों, सैन्य रणनीति और राजनीतिक संवाद की कसौटी भी था। अब, उस संवेदनशील अध्याय पर देश के पूर्व सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे का स्पष्ट और संतुलित बयान सामने आया है, जिसने उस दौर को लेकर चल रही सियासी व्याख्याओं को नई दिशा दे दी है।
सेना को अकेला नहीं छोड़ा गया”—नरवणे का दो टूक
जनरल नरवणे ने साफ शब्दों में उन दावों को खारिज किया है, जिनमें कहा गया था कि गलवान संकट के दौरान सेना को “उसके हाल पर छोड़ दिया गया” था। उन्होंने कहा कि उन्हें सरकार का पूरा समर्थन प्राप्त था और परिस्थिति की मांग होने पर गोली चलाने तक का अधिकार स्पष्ट रूप से दिया गया था।उनका यह बयान न केवल सैन्य नेतृत्व की स्वायत्तता को रेखांकित करता है, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व और सेना के बीच भरोसे की उस अदृश्य डोर को भी उजागर करता है, जो संकट के समय निर्णायक भूमिका निभाती है।
विवाद की जड़: किताब और संसद का टकराव
यह पूरा विवाद तब गहराया जब राहुल गांधी ने लोकसभा में दावा किया कि नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक “Four Stars of Destiny” में यह संकेत मिलता है कि सरकार ने स्पष्ट निर्देश देने के बजाय निर्णय सेना पर छोड़ दिया था।हालांकि, नरवणे ने इस व्याख्या को खारिज करते हुए कहा कि उनकी पुस्तक में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे गलत अर्थों में लिया जाए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि हर व्यक्ति अपनी समझ और दृष्टिकोण के आधार पर घटनाओं को देखता है—
सैन्य, कूटनीतिक और राजनीतिक दृष्टिकोणस्वाभाविक रूप से अलग-अलग होते हैं।
गलवान की वास्तविकता: निर्णय और जिम्मेदारी का संतुलन
गलवान घाटी की घटना, जिसे गलवान घाटी संघर्ष 2020 के नाम से जाना जाता है, उस समय हुई जब दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने थीं और स्थिति बेहद नाजुक थी। पैंगोंग झील के दक्षिणी किनारे और रेज़ांग ला जैसे रणनीतिक बिंदुओं पर भारतीय सेना की तैनाती ने सामरिक संतुलन बनाए रखा।ऐसे हालात में हर निर्णय के दूरगामी परिणाम हो सकते थे—एक गोली युद्ध का रूप ले सकती थी। ऐसे में सैन्य नेतृत्व को जमीनी हालात के आधार पर निर्णय लेने की छूट देना एक सोची-समझी रणनीति थी, न कि “दिशाहीनता”।
राजनीति बनाम पेशेवर दृष्टिकोण
नरवणे के बयान ने एक अहम सवाल को भी जन्म दिया है—क्या राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीतिक बयानबाजी उचित है?
विश्लेषकों का मानना है कि सेना के पेशेवर निर्णयों को राजनीतिक चश्मे से देखने से भ्रम पैदा होता है। जहां एक ओर विपक्ष सरकार की जवाबदेही तय करने की कोशिश करता है, वहीं सत्तापक्ष इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर “अनावश्यक राजनीति” करार देता है।“
शीर्ष पर अकेलापन, लेकिन समर्थन पूरा”
नरवणे ने एक दिलचस्प और गहरी बात कही—“जो व्यक्ति शीर्ष पर होता है, वह हमेशा अकेला होता है।” लेकिन उन्होंने तुरंत यह भी जोड़ा कि इसका अर्थ यह नहीं कि उसे बीच मझधार में छोड़ दिया गया है।यह कथन नेतृत्व के उस मनोवैज्ञानिक पक्ष को उजागर करता है, जहां अंतिम निर्णय का भार भले ही एक व्यक्ति पर हो, लेकिन उसके पीछे पूरे तंत्र का समर्थन खड़ा रहता है।
निष्कर्ष:
भरोसे की बुनियाद और भविष्य का संदेश
जनरल नरवणे का यह बयान केवल अतीत का स्पष्टीकरण नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक संदेश भी है। यह दर्शाता है कि संकट के समय राजनीतिक नेतृत्व और सैन्य कमान के बीच भरोसा कितना महत्वपूर्ण होता है।गलवान की घटना ने भारत को यह सिखाया कि सीमाओं की सुरक्षा केवल हथियारों से नहीं, बल्कि निर्णय लेने की स्पष्टता, नेतृत्व के आत्मविश्वास और संस्थागत भरोसे से भी सुनिश्चित होती है।
अंततः, यह बहस केवल “किसने क्या कहा” तक सीमित नहीं है—यह उस व्यापक सवाल का हिस्सा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर देश किस तरह संवाद करता है और कैसे एकजुट होकर आगे बढ़ता है।
