बी के झा
NSK


गोपालगंज / पटना, 2 मई
बिहार में अपराध और राजनीति का पुराना रिश्ता एक बार फिर सुर्खियों में है। ताजा मामला थावे का है, जहां शुक्रवार को दिनदहाड़े हुई गोलीबारी ने इलाके में दहशत फैला दी। गोपालगंज जिले के नारायणपुर हाई स्कूल के पास करीब 20-25 लोगों के बीच हुए आपसी विवाद ने अचानक हिंसक रूप ले लिया और चली गोली ने एक युवक को घायल कर दिया। घायल की पहचान जाहिर खान के रूप में हुई है, जिसका इलाज जारी है।घटना के बाद मौके पर पहुंची पुलिस ने जांच शुरू कर दी है और घटनास्थल से पीतल की गोली भी बरामद की गई है। लेकिन इस घटना ने सिर्फ एक आपराधिक वारदात से कहीं ज्यादा, बिहार की कानून-व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।
अपराध बनाम ‘कानून का राज’ — सियासी संग्राम तेज
गोपालगंज की इस घटना के बीच बिहार की राजनीति भी गर्म हो गई है। रामकृपाल यादव ने विपक्ष के आरोपों पर पलटवार करते हुए तेजस्वी यादव को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि “लालू-राबड़ी शासनकाल में अपराधी ‘सम्राट’ हुआ करते थे, लेकिन आज के दौर में अपराधियों को छिपने पर मजबूर होना पड़ रहा है।”रामकृपाल यादव ने यह भी दावा किया कि वर्तमान सरकार ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति पर काम कर रही है और बिहार में अब अमन-चैन कायम है।लेकिन विपक्ष इस दावे को सिरे से खारिज करता है। तेजस्वी यादव और अन्य नेताओं का आरोप है कि हालिया एनकाउंटर और बढ़ती घटनाएं दर्शाती हैं कि राज्य में अपराधियों का मनोबल बढ़ा है, और सरकार इसे जातीय रंग देकर असल मुद्दों से ध्यान भटका रही है।
शिक्षाविद और समाज का नजरिया
स्थानीय स्तर पर भी इस घटना ने चिंता बढ़ा दी है। एक वरिष्ठ शिक्षाविद नाम नहीं उजागर करने के शर्तों पर उनका (नाम गोपनीय) कहना है कि “बिहार में कानून-व्यवस्था की स्थिति लगातार कमजोर होती दिख रही है। सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए बार-बार अतीत का हवाला देती है, लेकिन वर्तमान की चुनौतियों का ठोस समाधान नहीं दे पा रही।”उन्होंने आगे चेतावनी दी कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है और जनता का विश्वास कमजोर हो सकता है।
कानूनविदों की राय
कानून के जानकारों का मानना है कि ऐसी घटनाएं केवल पुलिसिंग की विफलता नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का भी सवाल हैं। उनका कहना है कि यदि खुलेआम भीड़ के बीच गोली चलती है, तो यह ‘लॉ एंड ऑर्डर’ की गंभीर चुनौती है, जिसमें त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई अनिवार्य है।
आम जनता में बढ़ती चिंता
स्थानीय लोगों का कहना है कि दिनदहाड़े हुई इस वारदात ने सुरक्षा के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। “अगर स्कूल के पास ऐसी घटना हो सकती है, तो आम आदमी खुद को कहां सुरक्षित समझे?” —
यह सवाल अब हर जुबान पर है।
निष्कर्ष:
घटना छोटी, संकेत बड़े
गोपालगंज की यह घटना भले ही एक स्थानीय विवाद का परिणाम हो, लेकिन इसके राजनीतिक और सामाजिक मायने कहीं बड़े हैं। एक तरफ सरकार ‘सुधरी कानून-व्यवस्था’ का दावा कर रही है, तो दूसरी ओर जमीनी हकीकत बार-बार उन दावों को चुनौती देती नजर आ रही है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है —क्या बिहार में सचमुच ‘कानून का राज’ स्थापित हो चुका है, या यह केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित है?आने वाले दिनों में पुलिस की कार्रवाई और सरकार की प्रतिक्रिया तय करेगी कि यह घटना एक और आंकड़ा बनकर रह जाएगी, या फिर राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर मंथन की शुरुआत बनेगी।
