बी के झा
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नई दिल्ली, 9 दिसंबर
दक्षिण एशिया की राजनीतिक जमीन इस समय कई उथल-पुथलों से गुजर रही है—कहीं पुरानी सांस्कृतिक पहचान नए भू-राजनीतिक सवाल उठा रही है, तो कहीं लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की जड़ें संवैधानिक बहसों के बीच झकझोर दी गई हैं। ऐसे माहौल में पड़ोसी मुल्कों की हलचल भारत की राजनीति, कूटनीति और अर्थव्यवस्था पर प्रत्यक्ष या परोक्ष असर डालती है। पेश हैं आज की पांच सबसे महत्वपूर्ण खबरें, जो आने वाले दिनों की दिशा तय कर सकती हैं—
1. कराची में ‘सिंधुदेश’ की मांग से बवाल, राजनाथ सिंह का पुराना बयान फिर सुर्खियों में पाकिस्तान के सिंधी संस्कृति दिवस पर कराची की सड़कें एक बार फिर उबल उठीं।जिये सिंध मुत्तहिदा महाज (JSMM) के नेतृत्व में हजारों लोग ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ और ‘सिंधुदेश आज़ादी’ के नारे लगाते हुए मार्च करने निकले।पुलिस द्वारा रूट बदलने पर भीड़ भड़क उठी—पथराव, तोड़फोड़ जवाब में आंसू गैस5 पुलिसकर्मी घायल 45 प्रदर्शनकारी गिरफ्तार हैरानी की बात यह है कि इस उबाल के बीच भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का पुराना बयान, कि “एक दिन सिंध फिर भारत में शामिल होगा”, एक बार फिर पाकिस्तान के टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बन गया है।
विश्लेषकों का मानना है कि सिंध की अलगाववादी भावनाओं ने पाकिस्तान के संघीय ढांचे की कमजोरी को उजागर कर दिया है,
वहीं भारत को कूटनीतिक स्तर पर और अधिक सतर्क रहने की जरूरत होगी।
2. राहुल गांधी के तीखे सवाल: “क्या प्रधानमंत्री को CJI पर भरोसा नहीं?”लोकसभा में चुनाव सुधारों पर हुई बहस बेहद गरम रही।विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सीधा आरोप लगाया कि—वोट चोरी आज का सबसे बड़ा “राष्ट्र विरोधी अपराध” हैसत्ता पक्ष ने चुनाव आयोग और संवैधानिक संस्थाओं पर “कब्जा” कर लिया है“आइडिया ऑफ इंडिया” को कमजोर किया जा रहा हैउन्होंने सवाल दागा:“अगर प्रधानमंत्री को मुख्य न्यायाधीश पर भरोसा नहीं है, तो देश में लोकतांत्रिक भरोसा कैसे बचेगा?”सत्तापक्ष ने राहुल के आरोपों को “राजनीतिक नाटक” बताया, पर यह साफ है कि 2026 के चुनाव सुधारों पर राजनीतिक टकराव अब और तीखा होने वाला है।
3. अमेरिका की नजर भारतीय चावल पर: ट्रंप ने फिर दिखाई टैरिफ की तलवारअमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से आने वाले चावल पर अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने की धमकी दी है।ट्रंप का तर्क है कि भारत अमेरिकी बाजार में चावल “डंप” कर रहा है।लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है—यह “एहसान” नहीं, बल्कि अमेरिकी चुनावी राजनीति का हिस्सा हैटैरिफ बढ़ने से भारत के निर्यात पर बड़ा असर नहीं पड़ेगाउल्टे अमेरिका में उपभोक्ताओं को महंगा चावल खरीदना पड़ेगा भारतीय चावल (खासकर बासमती) की मांग स्वाद और पसंद से तय होती है, नीति से नहींभारत–अमेरिका व्यापार रिश्ते एक बार फिर राजनीतिक बहस के घेरे में हैं
।4. अवध ओझा ने साफ किया—न BJP, न राजनीति; “जब तक ईश्वर न चाहें, वापस नहीं आऊंगा”मशहूर शिक्षण विशेषज्ञ अवध ओझा, जिन्होंने हाल ही में आम आदमी पार्टी से और राजनीति से दूरी बना ली, ने भाजपा में शामिल होने की अटकलों को भी खारिज कर दिया है।
अपने इंटरव्यू में उन्होंने कहा—राजनीति में आने का मकसद था चुनाव लड़ना लेकिन “प्रैक्टिकल अनुभव की कमी और पार्टी की कार्यशैली” उनकी उम्मीदों के अनुकूल नहीं थी“राजनीति में लौटने का कोई इरादा नहीं… जब तक ईश्वरीय आदेश न हो।”ओझा का यह स्पष्ट बयान आने वाले महीनों में यूपी–बिहार की राजनीतिक चर्चाओं पर असर डाल सकता है, क्योंकि उनकी लोकप्रियता युवाओं में बेहद ज्यादा है।5. भारत की आर्थिक सुरक्षा पर अंतरराष्ट्रीय दबाव: वैश्विक बाज़ारों की नजर दुनिया की निगाहें इस समय भारत पर टिकी हैं—
कभी तेल की कीमतों को लेकर, तो कभी खाद्य सुरक्षा पर।अमेरिका से लेकर यूरोप तक, बड़े देश भारत की कृषि व व्यापार नीतियों को बारीकी से देखते हैं।ट्रंप की धमकी और पाकिस्तान में चल रहे अस्थिर माहौल का असर भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं पर साफ दिख रहा है।भारत का संदेश स्पष्ट है—
स्वदेशी हित सर्वोपरि, और वैश्विक साझेदारी वास्तविक समानता पर आधारित।
निष्कर्ष
कराची की सड़क से लेकर दिल्ली की संसद तक—माहौल लगातार बदल रहा है।पाकिस्तान का आंतरिक संकट, भारत की चुनावी बहस, अमेरिका की व्यापारिक राजनीति और भारतीय युवा आइकॉन का राजनीतिक संन्यास—ये सभी मिलकर दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक कैनवस को एक नए युग की ओर धकेल रहे हैं।इतिहास का पहिया घूम रहा है; आने वाले महीनों में इसके असर दूरगामी होंगे।
