बी के झा
नई दिल्ली / ताइपे, 10 जनवरी
पूर्वी एशिया एक बार फिर इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। ताइवान के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति लाई चिंग-ते के सख्त बयान और एक अमेरिकी थिंक टैंक की चौंकाने वाली रिपोर्ट ने चीन-ताइवान तनाव को वैश्विक बहस के केंद्र में ला दिया है। सवाल यह नहीं है कि तनाव है या नहीं—सवाल यह है कि अगर युद्ध हुआ, तो उसकी कीमत कौन और कितनी चुकाएगा?
राष्ट्रपति लाई का स्पष्ट संदेश: न झुकेंगे, न मिटेंगे
ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने सेना के सर्वोच्च कमांडर के रूप में यह दोटूक घोषणा की है कि चीन की किसी भी प्रकार की सैन्य या राजनीतिक घुसपैठ को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि“ताइवान पर चीन का कोई संप्रभुत्व नहीं है और न ही पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की सत्ता यहां लागू होती है।”यह बयान केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून के आत्मनिर्णय (Right to Self-Determination) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर भी मान्यता देता है।
‘1 लाख चीनी सैनिकों की मौत’—दावा या चेतावनी?
जर्मन मार्शल फंड द्वारा प्रकाशित अमेरिकी थिंक टैंक रिपोर्ट “If China Attacks Taiwan” ने बीजिंग की रणनीतिक गणनाओं पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। रिपोर्ट के अनुसार:पूर्ण पैमाने पर हमले की स्थिति में चीन को लगभग 1 लाख सैनिकों की जान गंवानी पड़ सकती है चीन को आर्थिक प्रतिबंधों, समुद्री नाकेबंदी और कूटनीतिक अलगाव का सामना करना पड़ेगा संभव है कि चीन किनमेन और मत्सू जैसे छोटे द्वीपों पर कब्जा कर ले, लेकिन ताइवान पर पूर्ण नियंत्रण असंभव होगा
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह रिपोर्ट केवल सैन्य आकलन नहीं, बल्कि रणनीतिक मनोवैज्ञानिक दबाव (Strategic Deterrence) का हिस्सा भी है।
सैन्य विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
अंतरराष्ट्रीय रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, ताइवान पर हमला करना चीन के लिए यूक्रेन युद्ध से भी अधिक जटिल होगा, क्योंकि:समुद्री आक्रमण (Amphibious Assault) इतिहास की सबसे कठिन सैन्य कार्रवाइयों में से एक है ताइवान की भौगोलिक स्थिति, पहाड़ी भूभाग और अत्याधुनिक वायु-रक्षा प्रणाली चीन के लिए बड़ी बाधा हैअमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष भूमिका चीन के लिए रणनीतिक दुःस्वप्न बन सकती है अंतरराष्ट्रीय कानून और वैधता का प्रश्न कानूनविदों का कहना है कि चीन का “वन-चाइना” सिद्धांत एक राजनीतिक दावा है, न कि अंतरराष्ट्रीय कानून द्वारा निर्विवाद रूप से स्वीकृत तथ्य। ताइवान:अपनी निर्वाचित सरकार रखता है
स्वतंत्र न्यायपालिका और संविधान है
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, विशेषकर सेमीकंडक्टर उद्योग में केंद्रीय भूमिका निभाता है इस पृष्ठभूमि में किसी भी सैन्य कार्रवाई को आक्रामक युद्ध (War of Aggression) माना जा सकता है।
भारत की दृष्टि: सतर्कता, संतुलन और सिद्धांत
भारत सरकार ने आधिकारिक रूप से भले ही ताइवान पर संयमित भाषा अपनाई हो, लेकिन रणनीतिक हलकों में यह स्पष्ट है कि:भारत यथास्थिति (Status Quo) के पक्ष में है
किसी भी बलपूर्वक परिवर्तन का विरोध करता हैताइवान जलडमरूमध्य की स्थिरता को इंडो-पैसिफिक सुरक्षा के लिए अनिवार्य मानता है भारतीय रणनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि चीन ताइवान में उलझता है, तो इसका सीधा असर लद्दाख, दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर में शक्ति संतुलन पर पड़ेगा।
क्या चीन पीछे हटेगा?
इतिहास गवाह है कि महाशक्तियां तब पीछे हटती हैं, जब लागत लाभ से अधिक हो जाए। एक लाख सैनिकों की संभावित मौत, आर्थिक प्रतिबंध, वैश्विक अलगाव और घरेलू असंतोष—ये सभी कारक चीन को सोचने पर मजबूर कर सकते हैं।
निष्कर्ष
ताइवान केवल एक द्वीप नहीं, बल्कि 21वीं सदी की भू-राजनीतिक परीक्षा है। यह संघर्ष लोकतंत्र बनाम विस्तारवाद, अंतरराष्ट्रीय कानून बनाम शक्ति-राजनीति और स्थिरता बनाम साहसिकता के बीच की रेखा खींचता है।अगर युद्ध हुआ, तो हार-जीत से पहले मानवता हारेगी। और शायद यही वह सच्चाई है, जिसे समझने की उम्मीद राष्ट्रपति लाई ने बीजिंग से की है।
NSK

