बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 25 मई
देश में लगातार बढ़ती महंगाई के बीच पेट्रोल-डीजल की कीमतों में चौथी बार हुई बढ़ोतरी ने आम आदमी की चिंता और गहरा दी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बावजूद देश में ईंधन महंगा होने से राजनीतिक घमासान भी तेज हो गया है। विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर “जनता की जेब काटने” का आरोप लगाया है, जबकि अर्थशास्त्री इसे वैश्विक आर्थिक दबाव और टैक्स संरचना से जोड़कर देख रहे हैं।
राजधानी नई दिल्ली में पेट्रोल अब ₹102.12 प्रति लीटर और डीजल ₹95.20 प्रति लीटर पहुंच गया है। वहीं कोलकाता, मुंबई और चेन्नई जैसे महानगरों में भी कीमतों ने आम लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।कुछ ही दिनों में कई बार बढ़े दाम15 मई को ₹3 प्रति लीटर की बड़ी बढ़ोतरी के बाद 19 मई, 23 मई और अब फिर कीमतों में इजाफा हुआ है। यानी कुछ ही दिनों में पेट्रोल-डीजल कई रुपये महंगे हो चुके हैं।अब सवाल यह उठ रहा है कि जब ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ चुका है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें गिर रही हैं, तब भारत में जनता को राहत क्यों नहीं मिल रही?
विपक्ष का हमला: “जनता टैक्स मशीन बन गई”
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि सरकार तेल कंपनियों और टैक्स के जरिए जनता से वसूली कर रही है। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि“जब वैश्विक बाजार में तेल सस्ता हो रहा है, तब देश में पेट्रोल-डीजल महंगा करना जनता के साथ आर्थिक अन्याय है।
”वहीं समाजवादी पार्टी ने कहा कि बढ़ती ईंधन कीमतों ने किसानों, ट्रांसपोर्टरों और मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी है। पार्टी नेताओं ने आरोप लगाया कि“सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन आम आदमी की जेब लगातार खाली होती जा रही है।”तृणमूल कांग्रेस ने भी इसे “महंगाई की सुनामी” करार देते हुए कहा कि केंद्र सरकार को एक्साइज ड्यूटी कम करनी चाहिए।वामपंथी दलों ने आरोप लगाया कि तेल कंपनियों के घाटे का बोझ सीधे जनता पर डाला जा रहा है, जबकि कॉरपोरेट कंपनियों को राहत दी जा रही है।
सरकार समर्थकों का तर्क
सरकार समर्थक आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक अस्थिरता, डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी और तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे के कारण कीमतें बढ़ाना मजबूरी बन गया है।क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार तेल कंपनियों को पेट्रोल पर लगभग ₹10 और डीजल पर ₹13 प्रति लीटर तक का नुकसान हो रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कीमतें नहीं बढ़ाई जातीं, तो सरकारी तेल कंपनियों पर वित्तीय दबाव और बढ़ सकता था।
आम जनता में नाराजगी
ईंधन महंगा होने का असर अब हर वर्ग पर दिखाई देने लगा है। ऑटो चालकों, टैक्सी ड्राइवरों और छोटे व्यापारियों का कहना है कि बढ़ते ईंधन खर्च ने उनकी कमाई का संतुलन बिगाड़ दिया है।एक टैक्सी चालक ने कहा,“मीटर से जितनी कमाई होती है, उसका बड़ा हिस्सा अब पेट्रोल में चला जाता है।
वहीं ”गृहिणियों का कहना है कि परिवहन महंगा होने से सब्जियों और रोजमर्रा की चीजों के दाम भी बढ़ने लगे हैं।
शिक्षाविदों और अर्थशास्त्रियों की चिंता
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि लगातार बढ़ती ईंधन कीमतें केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक चुनौती भी बनती जा रही हैं।विशेषज्ञों के अनुसार,“ईंधन की कीमतें बढ़ने का असर हर क्षेत्र पर पड़ता है—खाद्य पदार्थ, ट्रांसपोर्ट, शिक्षा, उद्योग और रोजगार तक। इसका सबसे ज्यादा दबाव निम्न और मध्यम वर्ग पर पड़ता है।
”CNG भी महंगी, राहत खत्म
इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड ने सीएनजी की कीमतों में भी बढ़ोतरी कर दी है। दिल्ली में CNG अब ₹81 प्रति किलो के पार पहुंच गई है। पिछले दस दिनों में यह तीसरी बढ़ोतरी है।इससे उन लोगों की चिंता भी बढ़ गई है, जिन्होंने पेट्रोल-डीजल से बचने के लिए CNG वाहनों का सहारा लिया था।
तेल कंपनियों की सफाई
इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने कहा है कि देश में ईंधन की कोई कमी नहीं है और कुछ जगहों पर आई दिक्कतें अस्थायी हैं। कंपनी के अनुसार मई में पेट्रोल और डीजल की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में लोगों से ईंधन बचाने और ऊर्जा संरक्षण अपनाने की अपील की थी।
सबसे बड़ा सवाल
देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें अब सिर्फ आर्थिक आंकड़े नहीं रह गई हैं। यह आम आदमी की रसोई, जेब और भविष्य से जुड़ा सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनती जा रही हैं।जब वैश्विक बाजार में कच्चा तेल सस्ता हो रहा हो और फिर भी जनता को राहत न मिले, तो सवाल सिर्फ महंगाई का नहीं, बल्कि उस आर्थिक नीति का भी उठता है जिसमें बोझ हमेशा आम नागरिक के हिस्से आता है।
