“धर्म, पटाखे और पर्यावरण: पूर्व जस्टिस अभय ओका का सटीक सवाल — क्या प्रदूषण भी अब पूजा का हिस्सा बन गया है?”

बी.के. झा

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नई दिल्ली, 30 अक्टूबर

भारत में त्योहारों का मतलब हमेशा से रहा है — रोशनी, उल्लास और सामाजिक मेलजोल।लेकिन अब त्योहारों का दूसरा चेहरा भी दिखने लगा है —

धुआं, शोर और प्रदूषण।इसी पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति अभय एस. ओका ने बुधवार को एक गूंजता हुआ सवाल उठाया क्या पटाखे फोड़ना किसी धर्म का अनिवार्य हिस्सा है?”

दिल्ली की हवा में घुलते ज़हर और आसमान में छा चुके धुएं के बीच, जस्टिस ओका का यह सवाल सिर्फ एक कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि समाज के विवेक को झकझोरने वाला संदेश है।

“त्योहारों में पटाखे, शादियों में बम —

यह परंपरा नहीं, प्रदूषण है”‘स्वच्छ वायु, जलवायु न्याय और हम – एक सतत भविष्य के लिए एक साथ’ विषय पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) की व्याख्यान श्रृंखला में बोलते हुए,

पूर्व जस्टिस ओका ने कहा —पटाखे फोड़ना सिर्फ दिवाली तक सीमित नहीं है।मैंने देखा है कि ईसाई नववर्ष और कई धर्मों की शादियों में भी पटाखे जलाए जाते हैं।लेकिन क्या कोई यह कह सकता है कि यह किसी धर्म का अनिवार्य हिस्सा है?”

उन्होंने तीखा सवाल किया —जो काम वृद्धों, अशक्तों और पशुओं को पीड़ा दे, क्या वह धार्मिक आनंद कहलाएगा?”

ओका ने कहा कि “धर्म के नाम पर प्रदूषण फैलाना आस्था नहीं, अंधविश्वास है।”

हम एयर प्यूरीफायर खरीद सकते हैं, लेकिन गरीबों की हवा कौन साफ करेगा?”दिल्ली की जहरीली हवा पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस ओका ने कहा —

हम सब एयर प्यूरीफायर का खर्च उठा सकते हैं, लेकिन दिल्ली की आधी आबादी नहीं।”उन्होंने नेताओं की चुप्पी पर भी सवाल उठाया

किसी भी राजनीतिक नेता ने जनता से अपील नहीं की कि त्योहार मनाते समय पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाएं। यह हमारी सामूहिक असफलता है।”

“लाउडस्पीकर से धर्म नहीं, ध्वनि प्रदूषण फैलता है”जस्टिस ओका ने साफ कहा कि “धर्म में लाउडस्पीकर की कोई जगह नहीं है।”उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि “अजान के लिए लाउडस्पीकर कोई आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है।

उन्होंने पूछा

क्या किसी धर्म में यह लिखा है कि भगवान तभी सुनेंगे जब डेसिबल मीटर फट जाए?धार्मिक आयोजनों में बजते तेज संगीत और रातभर चलने वाले डीजे कल्चर पर भी उन्होंने करारा व्यंग्य किया —

कई बार संगीत इतना तेज होता है कि इमारतें और गाड़ियां तक कांपने लगती हैं। क्या यही अध्यात्म है?”

खुशी की परिभाषा कब से दूसरों की तकलीफ पर टिकी?”पूर्व न्यायाधीश ने कहा —

पटाखे फोड़कर या तेज संगीत बजाकर खुशी पाने की यह प्रवृत्ति दूसरों के कष्ट को न समझने की आदत बन गई है।”

उन्होंने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं कि दूसरों के स्वास्थ्य और पर्यावरण की कीमत पर अपनी खुशी मनाई जाए।

समाज और सिस्टम दोनों जिम्मेदारजस्टिस ओका ने साफ कहा कि प्रदूषण सिर्फ एक तकनीकी या वैज्ञानिक समस्या नहीं है —

यह सामाजिक और नैतिक प्रश्न है।जब तक हम व्यक्तिगत स्तर पर अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक कोई कानून हमें स्वच्छ हवा नहीं दे सकता।”

उन्होंने यह भी कहा कि अगर समाज खुद जागरूक नहीं होगा तो न्यायपालिका के आदेश भी सिर्फ “कागज़ी राहत” बनकर रह जाएंगे।

निष्कर्ष:

“धर्म अगर जीवन से जुड़ा है, तो जीवन बचाना भी धर्म है”जस्टिस अभय ओका के सवाल ने देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है —

क्या धर्म का मतलब अब शोर, धुआं और भीड़ रह गया है?या फिर धर्म का असली उद्देश्य शांति, करुणा और सद्भाव है?पटाखों और लाउडस्पीकर की बहस अब केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक चुनौती बन चुकी है।

क्योंकि अगर हम दूसरों के दर्द में भी आनंद ढूंढने लगें,तो फिर धर्म का अर्थ ही खो जाएगा।

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