बी के झा
NSK

बेंगलुरु / नई दिल्ली, 8 जनवरी
कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार द्वारा कांग्रेस से जुड़े अख़बार ‘नेशनल हेराल्ड’ को दिए गए सरकारी विज्ञापनों का मामला अब एक सामान्य प्रशासनिक निर्णय से आगे निकलकर राजनीतिक नैतिकता, सार्वजनिक धन के उपयोग और सत्ता-मीडिया गठजोड़ पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। सरकारी रिकॉर्ड से सामने आया है कि जिस अख़बार का राज्य में न के बराबर सर्कुलेशन और पाठक संख्या है, उसे कर्नाटक सरकार ने देश के बड़े राष्ट्रीय दैनिकों से भी अधिक विज्ञापन फंड आवंटित किया।यह खुलासा होते ही राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में तीखा सियासी तूफान खड़ा हो गया है
आंकड़े जो सवाल पूछते हैं
सरकारी दस्तावेज़ों के अनुसार—वित्त वर्ष 2023–24 में कर्नाटक सरकार ने नेशनल हेराल्ड को करीब ₹1.90 करोड़ के विज्ञापन दिए वित्त वर्ष 2024–25 में यह राशि ₹99 लाख रही
2024–25 में राष्ट्रीय दैनिकों के लिए कुल विज्ञापन बजट था ₹1.42 करोड़
जिसमें से लगभग 69% हिस्सा अकेले नेशनल हेराल्ड को मिला
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह वितरण बाजार आधारित विज्ञापन नीति के बजाय राजनीतिक प्राथमिकताओं को दर्शाता है।
बीजेपी का आरोप: ‘करदाताओं के पैसे की खुली लूट’
बीजेपी ने इस मामले को कांग्रेस सरकार के खिलाफ सबसे बड़ा नैतिक हथियार बनाते हुए तीखा हमला बोला है।पूर्व उपमुख्यमंत्री और वरिष्ठ बीजेपी नेता डॉ. सी.एन. अश्वथ नारायण ने कहा—“जिस अख़बार का राज्य में न तो पाठक है, न प्रभाव, उसे करोड़ों देना करदाताओं के पैसे की खुली लूट है। यह सरकारी विज्ञापन नहीं, बल्कि पार्टी फंडिंग का दूसरा रास्ता लगता है।”बीजेपी नेताओं का कहना है कि यह मामला सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग,हितों के टकराव (Conflict of Interest)और राज्य की विज्ञापन नीति की पारदर्शिता पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाता है।
कांग्रेस का पलटवार: ‘विचारधारा पर हमला’
कांग्रेस की ओर से इस पूरे विवाद को राजनीतिक बदले की भावना करार दिया गया है।मंत्री प्रियांक खरगे ने बीजेपी पर पलटवार करते हुए कहा—“बीजेपी को नेशनल हेराल्ड की चिंता छोड़कर RSS की पत्रिका ‘ऑर्गनाइज़र’ की फंडिंग पर सवाल उठाने चाहिए।”वहीं, राज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री ईश्वर खंड्रे ने सवाल उठाया—“नेशनल हेराल्ड को विज्ञापन देने में गलत क्या है? यह एक राष्ट्रीय अख़बार है। इस पर सवाल उठाना एक खास मानसिकता को दर्शाता है।”उनके ‘राष्ट्र-विरोधी मानसिकता’ वाले बयान ने विवाद को और भड़का दिया।
कानूनविदों की राय: ‘नीति बनाम नीयत’
संवैधानिक और प्रशासनिक कानून के विशेषज्ञ इस मामले को बेहद गंभीर मानते हैं।एक वरिष्ठ कानूनविद के अनुसार—“सरकार को विज्ञापन देने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार उद्देश्यपरक, पारदर्शी और जनहित आधारित होना चाहिए। यदि विज्ञापन वितरण का आधार पाठक संख्या और प्रभाव नहीं, बल्कि राजनीतिक नजदीकी हो, तो यह न्यायिक जांच के दायरे में आ सकता है।”विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि—सरकारी विज्ञापन पार्टी समर्थक मीडिया को आर्थिक जीवनदान देने का साधन नहीं बन सकतेयह मामला भविष्य में CAG ऑडिट और अदालतों तक जा सकता हैशिक्षाविदों का सवाल: ‘लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका या सत्ता का विस्तार?’
राजनीतिक शास्त्र के शिक्षाविद इसे सत्ता और मीडिया के रिश्तों की खतरनाक मिसाल मानते हैं।उनका कहना है—यदि सरकारें विचारधारा के आधार पर मीडिया को संसाधन देने लगेंतो स्वतंत्र पत्रकारिता का ढांचा कमजोर होगाऔर सरकारी विज्ञापन लोक सूचना नहीं, राजनीतिक प्रचार का माध्यम बन जाएंगे
विपक्ष का व्यापक हमला: ‘नेशनल हेराल्ड मॉडल’अन्य विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए चेतावनी दी है कि यदि यह मॉडल स्वीकार्य हो गया, तो देशभर में राज्य सरकारें अपने-अपने वैचारिक अख़बारों को सरकारी खजाने से पोसने लगेंगी।
निष्कर्ष:
सवाल अख़बार का नहीं, सिस्टम का हैनेशनल हेराल्ड को मिले विज्ञापन केवल एक अख़बार की कहानी नहीं हैं।यह मामला है—लोकतंत्र में सत्ता की जवाबदेही करदाताओं के पैसे के उपयोगऔर राज्य व राजनीतिक दलों के रिश्तों की पारदर्शिता काआज सवाल यह नहीं है कि नेशनल हेराल्ड को विज्ञापन क्यों मिला,बल्कि यह है कि—
क्या सरकारें अपने विचारधारात्मक हितों के लिए जनता के पैसे का इस्तेमाल कर सकती हैं?इसका जवाब आने वाले दिनों मेंराजनीतिक बहस, ऑडिट रिपोर्ट और शायद अदालतें तय करेंगी।
